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बिगड़ते हालात

संपादकीय /  April 18, 2017

सेना प्रमुख ने सप्ताहांत पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को जम्मू कश्मीर चुनाव में हुई हिंसा के बारे में जानकारी दी। इससे यही संकेत मिलता है कि सरकार भी वहां की कानून व्यवस्था की हालत को लेकर चिंतित है। प्रदेश की सरकार में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भी शामिल है। लेकिन यह भी सोचने की बात है कि सरकार ने जुलाई 2016 से प्रदेश में चल रहे हिंसा के चक्र से निपटने में कोई उचित कदम उठाया है या नहीं। जुलाई 2016 में हिजबुल मुजाहिदीन का उग्रवादी और उसके प्रचारतंत्र से जुड़ा बुरहान वानी सुरक्षा बलों के हाथों मारा गया था। श्रीनगर संसदीय उपचुनाव में हुआ 7 फीसदी मतदान बीते तीन दशक का सबसे कम मत प्रतिशत वाला चुनाव था। इस पर नीति निर्माताओं को सोचना चाहिए। अगर नागरिक लोकतंत्र में अपने मूल अधिकार का इस्तेमाल करने को लेकर इतने घबराए हुए हैं या उनका इस कदर मोहभंग हो चुका है तो जाहिर है यह इस जटिल समस्या को लेकर एक नया रुख अपनाने का वक्त है। 

 
यह बात तो स्वयंसिद्घ है कि शांति बंदूक की नली से नहीं निकलती है और युवाओं और सुरक्षा बलों के बीच होने वाले झगड़ों ने ऐसी हिंसा भड़काने में मदद की है जिससे किसी को मदद नहीं मिली। कश्मीर में सेना और अन्य सुरक्षा बलों के स्थायी बंदोबस्त ने स्थानीय लोगों के मन में एक किस्म का शत्रुताबोध भर दिया है। हाल की घटनाएं इसका उदाहरण हैं। युवा कश्मीरी केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवानों पर हमला कर रहे हैं और उनके भीषण प्रतिरोध में एक मासूम प्रत्यक्षदर्शी आ जाता है। आम कश्मीरी नागरिकों को सुरक्षा बलों के हाथों रोज-रोज अपमानित होना पड़ता है। खासतौर पर युवा पुरुषों और महिलाओं को। सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम की वजह से सुरक्षा बलों को विशिष्टï अधिकार हासिल हैं जिनकी वजह से हालात बद से बदतर हो गए हैं। 
 
इसमें कुछ भी नया नहीं है लेकिन संभव है कि सरकार को तत्काल नए विचारों और नए हलों की जरूरत पड़े क्योंकि हिंसा और दमन, कफ्र्यू और सामान्य जन-जीवन को अस्तव्यस्त कर देने वाले अन्य उपाय लंबे समय से अपनाए जा रहे हैं और वे विफल भी रहे हैं। अधिक टिकाऊ शांति कायम करने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि वर्ष 2010 से 2015 के बीच ऐसा हो चुका है। उस दौर में आतंकवाद से जुड़ी घटनाओं में तेजी से कमी आई थी। उग्रवादी घटनाओं में शिथिलता आई थी। 
 
पर्यटन और स्वागत उद्योग की स्थिति में सुधार हुआ था। ये दोनों ही आम कश्मीरियों की आय के प्रमुख साधन हैं। इससे उम्मीद बढ़ी थी कि इस ऐतिहासिक समस्या का कोई स्थायी समाधान निकल सकता है। लेकिन इस दिशा में कोई उचित एजेंडा आगे बढ़ाने के बजाय केंद्र सरकार लगातार गलती करने और उससे सीखने की प्रक्रिया में ही नजर आ रही है। वानी की मौत से जुड़ी हिंसा के बाद विपक्षी नेताओं के साथ चर्चा में यह बात निकलकर आई थी कि संवाद बढ़ाने की आवश्यकता है। परंतु इस दिशा में भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका। ऐसे में डोभाल ने जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित हिंसा का प्रतिरोध गिलगित-बाल्टिस्तान और बलूचिस्तान में करने की बात कही है जिसे परिपक्व तो कतई नहीं माना जा सकता है। जबकि खाड़ी से प्रायोजित सलाफी संगठन युवाओं को कट्टïरपंथ की ओर धकेल रहे हैं जिसे रोकने के लिए कुछ खास नहीं किया गया। वहीं हिंदुत्व की विचारधारा भी सत्ता की वरिष्ठï साझेदार पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ मेल नहीं खाती है। सच यही है कि कुछ युवा भले ही पाकिस्तान जैसे नाकाम राष्ट्र को भारत से बेहतर मानें लेकिन इससे यही पता चलता है कि जम्मू कश्मीर पर कल्पनाशीलता की कमी के मामले में यह सरकार भी अपवाद नहीं है। 
Keyword: military, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल,
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