Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Thursday, August 17, 2017 01:04 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

मध्य प्रदेश की स्थानीय राजनीति का नया मोहरा बना मद्य निषेध

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  April 17, 2017

इन दिनों मध्य प्रदेश सुर्खियों में है। दरअसल प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घोषणा की है कि वह चरणबद्ध तरीके से प्रदेश में पूर्ण शराबबंदी के हिमायती हैं। उनके यह ऐलान करते ही चौतरफा विवाद छिड़ गया। राज्य की वित्तीय स्थिति पर नजर रखने वाले टीकाकार कहते हैं कि मध्य प्रदेश के राजकोष को इससे बड़ा नुकसान होगा और प्रदेश इस स्थिति का सामना करने के लिए तैयार नहीं है। उनकी दलील है कि सरकार का यह कदम पर्यटन को भी करारा झटका देगा। लेकिन अधिकांश लोगों का कहना है कि यह कुछ और नहीं बल्कि वर्ष 2018 के आखिर में होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारी भर है। चौहान की मुखालफत करने वाले नेता तत्काल सामने आए। भारतीय जनता पार्टी के  महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि मुख्यमंत्री ने जो कहा, दरअसल उनका वह तात्पर्य था ही नहीं।

 
इससे ठीक पहले भी राज्य का एक विवाद सुर्खियों में था। वर्ष 1994 बैच की आईएएस अधिकारी दीपाली रस्तोगी फिलहाल राज्य सरकार के आदिम जाति कल्याण विभाग में आयुक्त के पद पर हैं। उन्हें पिछले दिनों कारण बताओ नोटिस जारी किया गया क्योंकि उन्होंने सार्वजनिक रूप से लेख लिखकर खुले में शौच मुक्त अभियान पर चंद सवाल उठाए थे। रस्तोगी ने अपने आलेख में लिखा था कि क्या हमें शौचालयों का इस्तेमाल इसलिए करना चाहिए क्योंकि गोरे लोग ऐसा कहते हैं? क्या हमें उनका अंधानुकरण करना चाहिए और सोचना चाहिए कि कुछ ही महीनों में सदियों का आचरण बदल जाएगा?
 
उन्होंने इस बात पर भी संदेह प्रकट किया कि क्या इस अभियान के तहत बनने वाले शौचालयों के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध है? खासतौर पर उन इलाकों में जहां पीने तक के लिए लोग मीलों दूर से पानी ढोकर लाते हैं। उन्होंने सरकार द्वारा इस योजना के प्रचार-प्रसार के तरीकों में भी खामियां निकालीं और अपने निष्कर्ष में कहा, 'मुझे गलत मत समझिए। मैं शौचालयों के पक्ष में हूं। आखिरकार मैं शहर से ताल्लुक रखती हूं। लेकिन मुझे शौचालयों के प्रचार-प्रसार के तौरतरीकों से आपत्ति है।' राज्य का आईएएस समुदाय इस विषय पर बंटा हुआ है। कई को लगता है कि रस्तोगी को यह सब नहीं कहना चाहिए था। जबकि अन्य लोग मानते हैं कि उनको अपनी बात कहने का हक है। रोचक बात यह है कि भाजपा नेता और सांसद प्रह्लाद पटेल ने भोपाल में संवाददाताओं से बातचीत करते हुए कहा कि रस्तोगी ने जो सवाल उठाए हैं उनमें से कई व्यावहारिक हैं और सरकार को इस समस्या से निपटना चाहिए।
 
ये सारी बातें अप्रत्यक्ष तौर पर यही इशारा करती हैं कि मध्य प्रदेश सरकार और सत्ताधारी दल में गड़बडिय़ां हैं। माना जा रहा है कि चौहान 2018 के चुनाव में चौथी बार प्रदेश की कमान संभालने के सबसे बड़े दावेदार हैं। स्पष्ट कहा जाए तो है तो वह साढ़े तीन कार्यकाल पूरे कर चुके हैं। उन्होंने 2005 में बाबूलाल गौर को हटाए जाने के बाद कार्यकाल के बीच में ही कमान संभाली थी और तब से अब तक वही राज्य का नेतृत्व कर रहे हैं। राज्य में भाजपा पिछले 15 साल से सत्ता में है। गत वर्ष जून में गौर (जो सरकार की लगातार आलोचना करके उनके गले की फांस बने थे) को मंत्रिमंडल से हटा दिया गया क्योंकि वह 75 वर्ष से अधिक उम्र के हो चुके थे। प्रदेश में कांग्रेस भले ही अपनी समस्याओं में घिरी हुई है लेकिन यह भी सच है कि चौहान के सामने कई चुनौतियां हैं। 
 
राज्य के प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की निष्क्रियता से जो निर्वात पैदा हुआ उसे भरने का काम खुद चौहान की पार्टी के लोगों ने किया है। विजयवर्गीय और गौर तो महज दो उदाहरण हैं। कांग्रेस की हालत बेहद खराब है। हालिया अटेर विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस महज 800 वोटों से चुनाव जीतने में कामयाब रही। जबकि इससे पहले कांग्रेस इसी सीट पर 11,000 से अधिक मतों से जीतकर आई थी। वहीं बांधवगढ़ उपचुनाव में भाजपा 25,476 मतों से जीतने में कामयाब रही। रोचक बात यह है कि अटेर सीट पर जीत जहां ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए सम्मान का विषय थी, वहीं बांधवगढ़ की जिम्मेदारी कांग्रेस सांसद कमलनाथ को सौंपी गई थी। उपचुनाव के नतीजे बताते हैं कि कांग्रेस सिंधिया की वोट जुटाने की क्षमता को पहचानेगी और और उनको राज्य के आगामी चुनाव का प्रभार सौंपेगी। यह बात एकदम स्पष्टï है कि कम से कम एक व्यक्ति है जो ऐसा सोचता है। अटेर विधानसभा उपचुनाव के दौरान चौहान ने सिंधिया परिवार को घेरे में लिया और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान परिवार की भूमिका को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने सिंधिया परिवार को अंग्रेजों का साथ देने वाला बताया। शायद वह यह भूल गए कि ज्योतिरादित्य सिंधिया की दो बहनें वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे भाजपा में ही हैं। यशोधरा तो उनके मंत्रिमंडल की सदस्य भी हैं।
 
इन तमाम बातों के बीच ये अफवाहें खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही हैं कि चौहान को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है। कहा जा रहा है कि नरेंद्र सिंह तोमर प्रदेश में उनकी जिम्मेदारी संभाल सकते हैं। हालांकि चौहान ने सार्वजनिक रूप से इस अटकल पर कभी कुछ नहीं कहा है लेकिन इसका तात्पर्य उनको नुकसान पहुंचाने से ही है। ऐसे में निर्णायक दिखने के लिए शराबबंदी का सहारा लिया जा रहा है। दरअसल चौहान नए क्षेत्रों में जीत हासिल करने से पहले अपनी मौजूदा जमीन को बचाना चाहते हैं। 
Keyword: madhya pradesh, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
Advertisements 
Cover from Natural Calamities. Buy Home Insurance
Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
  आपका मत
 क्या दवाओं पर मार्जिन तय होने से सस्ती होंगी दवाएं?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.