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चुनिंदा सुधारों के मामले में समान हैं राजग और संप्रग

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  April 16, 2017

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राजग सरकार और मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संप्रग की पिछली सरकार कुछ आर्थिक नीतियों पर इस कदर समान नजर आती हैं कि इसकी अनदेखी करनी मुश्किल है। मई 2014 में मोदी सरकार के आगमन के समय उम्मीद थी कि नई सरकार सुधार और सरकारी ढांचे के पुनर्गठन में अधिक आक्रामक रुख अपनाएगी। यह भी माना जा रहा था कि उसके तौर तरीके संप्रग से अलग होंगे। कारोबारी और बाजार अनुमान लगा रहे थे कि जल्दी ही सरकार की भूमिका और उसका आकार छोटे होंगे। बाजार के अनुकूल नीतियां बनेंगी और अक्षम सरकारी कंपनियों का निजीकरण किया जाएगा या उनको बंद किया जाएगा।

 
मोदी के नेतृत्व में राजग के कार्यकाल के तीन वर्ष अगले महीने पूरे हो रहे हैं। इस दौरान यह स्पष्ट होता जा रहा है कि भले ही सामाजिक क्षेत्र की नीतियों में राजग और संप्रग में कई अंतर हैं लेकिन जहां तक तीन प्रमुख आर्थिक नीतियों की बात है, कोई खास अंतर देखने को नहीं मिल रहा है। कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि राजग सरकार सुधारों के मोर्चों पर धीमी रही है लेकिन कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां राजग सरकार सुधार पर धीमी रही है। निश्चित तौर पर कई क्षेत्रों में उसने काफी तेज सुधार भी हासिल किए हैं।
 
वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) ऐसा ही एक कदम है। उसके अलावा दिवालिया संहिता, रक्षा, बीमा और रेलवे समेत कई क्षेत्रों के लिए विदेशी निवेश मानकों में शिथिलता, नया संस्थागत मौद्रिक नीति ढांचा जिसमें मुद्रास्फीति से निपटने की व्यवस्था है, कोयला नीलामी का नया ढांचा, संकटग्रस्त बिजली कंपनियों के लिए नया प्रोत्साहन पैकेज, अधिकाधिक पेट्रोलियम उत्पाद मूल्य को बाजार से जोडऩा। इसके अलावा सड़क निर्माण की गति तेज करना, योजनागत और गैर योजनागत व्यय का अंतर समाप्त करना, क्षेत्रीय हवाई सेवाओं को गत देना और रेलवे नियामक का गठन ऐसे ही कदम हैं। 
 
मोदी सरकार को जहां उपरोक्त शुरुआत के लिए बधाई दी जानी चाहिए, वहीं यह सवाल बरकरार रहेगा कि आखिर क्यों सरकार के आकार, उत्पादन कारक बाजार सुधार और सरकारी उद्यमों के भविष्य के मामलों में उसका रुख काफी हद तक पिछली संप्रग सरकार के समान ही है। ऐसा नहीं है कि राजग सरकार इन तीनों क्षेत्रों में सुधार के लिए अपने सारे प्रयास झोंक दिए हों। अगर उसने ऐसा किया होता तो जमीनी मोर्चे पर हुई कमियां उजागर हो सकती थीं। लेकिन ऐसा कुछ नहीं है और यह मामला एक राजनीतिक पहेली बन चुका है। 
 
उदाहरण के लिए राजग सरकार लगातार यह संकेत करती रही है कि उसके न्यूनतम सरकार अधिकतम प्रशासन के वादे को एक खास संदर्भ में समझा जाना आवश्यक है। सरकार का कहना है कि वह निर्णय प्रक्रिया में शामिल कई स्तरों को कम करके ऐसा करना चाहती है। यानी किसी निर्णय पर पहुंचने में जो समय लगता है उसकी अवधि कम करना उसका प्रयास है। परंतु निश्चित तौर पर जब राजग ने यह वादा किया था तब यह उम्मीद नहीं की गई थी। उम्मीद थी कि केंद्र के तमाम मंत्रालयों की संख्या कम की जाएगी लेकिन बीते तीन सालों के दौरान मोदी सरकार ने ऐसा कुछ भी नहीं किया है। बल्कि इसके बजाय उसने नए मंत्रालय तक गठित कर दिए हैं। 
 
भूमि और श्रम सुधार के मोर्चे पर मोदी सरकार ने बहुत धीमी प्रगति की है। पहले वर्ष में सरकार ने भूमि अधिग्रहण और पुनस्र्थापन में अनुकूल सुधार कराने पर खूब ऊर्जा खर्च की। लेकिन एक बार जब इसका तीखा राजनीतिक प्रतिरोध शुरू हुआ और जब सरकार को लगा कि विपक्षी राजनीतिक दल राज्य सभा में उसे कामयाब नहीं होने देंगे तो इस पूरे विचार को ही ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। अब मोदी सरकार में कोई व्यक्ति संप्रग सरकार द्वारा पारित भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्वास कानून में संशोधन के बारे में बात नहीं कर रहा है। इच्छुक राज्य जरूर इसमें संशोधन का प्रयास कर सकते हैं। देश के आधे से अधिक राज्यों में भाजपा का शासन है लेकिन एक भी राज्य ने इस दिशा में कोई पहल नहीं की। इस प्रकार श्रम सुधारों की प्रक्रिया भी काफी धीमी रही है। जबकि आए दिन यह बात सुनने में आती रहती है कि केंद्र सरकार जल्दी ही एक व्यापक दायरे वाले श्रम सुधार के साथ सामने आएगी। कुछ राज्यों ने अपने श्रम कानूनों में  सुधार का साहसिक कदम उठाया भी लेकिन ज्यादातर ने इस मामले में कुछ नहीं किया। उत्पादन कारक बाजार सुधार की संभावना बहुत मंद नजर आ रही है और मोदी सरकार भी इसे आगे बढ़ाने में कोई खास रुचि नहीं दिखा रही। 
 
निजीकरण की बात करें तो मोदी सरकार अभी भी कुछ सरकारी उद्यमों को बेचने का खाका ही तैयार कर रही है। इस दिशा में अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। यह तो कोई ऐसा निर्णय भी नहीं है जिसके लिए विधायी मंजूरी की आवश्यकता होगी। इस वर्ष के केंद्रीय बजट में आईडीबीआई के निजीकरण की बात कही गई है लेकिन ऐसा लगता है कि इस प्रस्ताव पर भी कुछ खास काम नहीं हो सका है। एयर इंडिया की वित्तीय स्थिति लगातार खस्ता बनी हुई है। उसकी स्थिति सुधारने के लिए काफी निवेश किया गया। बीते दो सालों के दौरान केंद्रीय बजट में यह संकेत दिया गया कि सरकार कुछ सरकारी उद्यमों का निजीकरण करने का काम पूरा करेगी। लेकिन अब तक ऐसा कुछ भी नहीं हो सका है। इन तीनों मोर्चों पर संप्रग और राजग के बीच की समानता देखते ही बनती है। यह समानता एक और वजह से उल्लेखनीय है। यह समानता हमें बताती है कि ऐसे सुधारों को लेकर देश के राजनीतिक दलों में सहमति का किस दर अभाव है।
Keyword: narendra modi, GOVT, manmohan singh,,
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