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सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग की मुश्किल, कामगारों की नहीं

मिहिर शर्मा /  April 16, 2017

अमेरिका में नई सेवा शर्तों के बीच भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के कर्मचारी बिना उन कंपनियों के भी अच्छा प्रदर्शन करने की काबिलियत रखते हैं जिन्होंने उन्हें नियुक्त कर रखा था। बता रहे हैं मिहिर शर्मा

 
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को संदेह का लाभ देते हुए मान लेते हैं कि उन्हें वाकई लगता है कि उन्हें अमेरिकी कामगारों की रक्षा के लिए चुना गया है। उन्होंने प्रचार अभियान के दौरान यह वादा किया था वह श्रम विभाग को निर्देश देंगे कि वीजा कार्यक्रमों के दुरुपयोग के ऐसे हर मामले की जांच की जाए जिससे अमेरिकी कामगार प्रभावित हो रहे हैं। परंतु अगर उनकी सरकार ने हाल में वर्क वीजा को लेकर जो परिवर्तन किए हैं उनके पीछे यही लक्ष्य था तो भी इसका असर अमेरिकी कंपनियों के लिए ही मददगार होगा।
 
अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा (यूएससीआईएस) ने एच-1बी वीजा व्यवस्था में तीन बड़े बदलाव किए। उसने कहा कि वह उन कंपनियों तक लक्षित ढंग से पहुंचेगी जो एच-1बी वीजा के आधार पर कर्मचारियों को काम पर रखती हैं। यह ऐसे मामलों पर ध्यान केंद्रित करेगा जहां कंपनियों में  एच-1बी वीजा धारियों का अनुपात अधिक हो, ऐसी जगहें जहां एच-1बी वीजा किसी और स्थान पर मौजूद कंपनी या संस्थान के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस बीच अमेरिकी न्याय विभाग ने एच-1बी वीजा चाहने वाली कंपनियों को चेतावनी जारी कर कहा कि वे अमेरिकी कर्मियों के साथ भेदभाव न करें। उसने कहा कि अगर एच-1बी वीजा चाहने वाली कंपनियों में अमेरिकी कर्मचारियों के साथ भेदभाव या उनको नुकसान की बात सही साबित होती है तो इसकी जांच होगी और तगड़ी कार्रवाई भी की जाएगी। एक अन्य अमेरिकी सरकारी एजेंसी यानी अमेरिकी श्रम विभाग के प्रमुख ने कहा कि एच-1बी वीजा मामलों में किसी भी तरह की छंटनी की जांच की जाएगी।
 
संभव है कि ये सारी बातें ट्रंप की निजी भावनाएं नहीं हों। मिसाल के तौर पर ट्रंप ने न्याय विभाग के प्रमुख पद के लिए अटॉर्नी जनरल जेफ सेसंस को चुना है जिनका वर्क वीजा पर हमले करने का लंबा इतिहास रहा है। लेकिन ट्रंप प्रशासन ने अब तक जो भी कदम उठाए हैं वे काफी संकीर्ण नजर आते हैं। वे अमेरिकी कामगारों की रक्षा के बजाय अमेरिकी कंपनियों का बचाव करते नजर आ रहे हैं। यूएससीआईएस के प्रयासों का तीसरा हिस्सा जो छापेमारी से संबंधित है वह पूरी तरह स्पष्टï है। यह खासतौर पर आउटसोर्सिंग कंपनियों को निशाना बनाता है। इनमें से कई भारतीय मूल की हैं। सिलिकन वैली खासतौर पर आव्रजन को लेकर परेशान हो सकती है क्योंकि नवाचार काफी हद तक उस पर निर्भर है। लेकिन वह मोटे तौर पर इन कदमों को लेकर चिंतित नहीं होगी क्योंकि इनकी बदौलत भारतीय कंपनियों के साथ उनकी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। भारतीय आईटी कंपनियों को वर्ष 2015 में कुल एच-1बी वीजा का दोतिहाई मिला। वर्ष 2016 में एच-1बी वीजा के 10 सबसे बड़े उत्तरदायियों (स्पॉन्सर) में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, इन्फोसिस, विप्रो और टाटा स्टील शामिल थे। ताजा नियमन के बाद उनकी मुश्किल बढ़ेगी जबकि अमेरिकी कंपनियों को राहत मिलेगी।
 
ध्यान देने वाली बात यह है कि अमेरिका स्थित कंपनियां अक्सर बेहतर वेतनभोगी आव्रजकों की तलाश में रहती हैं। अमेरिका ने हाल ही में एच-1बी वीजा से निपटने वाले केंद्रों से कहा कि वे कम कौशल वाले कंप्यूटर प्रोग्रामरों की अनदेखी करें। इसमें भी यह संकेत है कि अमेरिकी कंपनियों को नई व्यवस्था में लाभ मिलेगा जबकि भारतीयों को नुकसान। लेकिन आवश्यक नहीं कि यह भारतीय टेक कर्मियों के लिए बुरी खबर ही हो। अमेरिकी कंपनियां बेहतर नियोक्ता हैं और वीजा के मामले में भी वे भारतीय कंपनियों से आगे हैं। उनका काम का माहौल भी बेहतर होता है और तरक्की की संभावना भी। अहम बात यह है कि वहां रहते हुए ग्रीन कार्ड हासिल किया जा सकता है जो भारतीय कंपनियों में कम ही मुनासिब है।
 
एक बार नया कानून लागू होने के बाद भारतीय कंपनियों को न सही कर्मचारियों को अवश्य फायदा हो सकता है। नए कानून पारित होने में एक वर्ष या उससे अधिक वक्त लग सकता है लेकिन उनकी रूपरेखा सामने आ चुकी है। कैलिफोर्निया के रिपब्लिकन प्रतिनिधि डैरेल इसा ने जो बिल पेश किया है उसके तहत एच-1बी वीजा धारक का न्यूनतम सालाना वेतन 60,000 डॉलर से बढ़ाकर 100,000 डॉलर करने की बात कही गई है। ऐसा वीजा धारक औसतन साल में 78,000 डॉलर कमाता है। लेकिन नए वीजा धारकों और भारतीय कंपनियों के लोगों को बहुत कम भुगतान होता है। कैलिफोर्निया के डेमोक्रेट प्रतिनिधि जो लॉफग्रेन ने तो 130,000 डॉलर के औसत सालाना वेतन की वकालत की है। इसमें ज्यादा वेतन देने वाली कंपनियों को प्राथमिकता पर पहुंच देने की बात कही गई है। लॉफग्रेन कांग्रेस में सैन हॉसे का प्रतिनिधित्व करती हैं। ऐसे में उनको यहां सिलिकन वैली का प्रतिनिधि माना जा सकता है। 
 
बड़ी अमेरिकी कंपनियां भी आव्रजन के बचाव का दिखावा कर सकती हैं लेकिन उनको ट्रंप प्रशासन के भारतीय आउटसोर्सिंग पर हमला करने से प्रसन्नता ही होगी। आयोवा के रिपब्लिकन सांसद और सीनेट की न्यायिक समिति के अध्यक्ष चक ग्रासली के एक विधेयक की मदद से कई आउटसोर्सिंग कंपनियों के कारोबारी मॉडल को पूरी तरह ध्वस्त किया जा सकता है। इसके तहत एच1-बी धारक कर्मचारी के एक स्थान से दूसरे स्थान या दूसरी कंपनी में जाने पर रोक की बात है। यह विधेयक खासतौर पर वीजा निर्भर कंपनियों को निशाना बनाएगा। ये वे कंपनियां हैं जिनके कम से कम 15 फीसदी कर्मचारी अमेरिका में हैं और एच-1बी वीजा धारक हैं। इनमें ऊपर वर्णित चार कंपनियों के अलावा कॉग्निजेंट, लार्सन ऐंड टुब्रो, सिंटेल और कैपजेमिनाई शामिल हैं। 
 
टीसीएस और इन्फोसिस ने ज्यादा अमेरिकियों को काम पर रखने और कुछ अमेरिकी कंपनियों को खरीदने का वादा किया है ताकि उनकी वीजा निर्भरता कम हो सके। टीसीएस ने कहा है कि वह पहले ही एच-1बी आवेदन कम कर रही है। अन्य कंपनियों ने अब यूरोप पर ध्यान देने की बात कही है। नैसकॉम ने कहा है कि इन कदमों का भारतीय कंपनियों पर खास असर नहीं होगा। 
 
मैं इससे सहमत नहीं हूं। भारतीय आईटी जगत बहुत लंबे समय तक अविकसित कारोबारी मॉडल पर चला। कुछ कंपनियों ने आधे अधूरे ढंग से बदलाव की कोशिश की। इन्फोसिस उनमें से एक है। इन्फोसिस के विशाल सिक्का के मुताबिक न केवल वीजा प्रतिबंधों से खतरा है बल्कि तकनीकी बदलाव भी जोखिम लेकर आए हैं। उनकी चेतावनी है कि अगले 10 वर्ष या उससे कम समय में 60 से 70 फीसदी मौजूदा रोजगार कृत्रिम बुद्धिमता के हवाले हो जाएंगे। उन्होंने आईटी उद्योग की बीते दो दशक की वृद्धि को मैकेनिकल करार देते हुए चेतावनी दी कि इन्फोसिस को पेशेवर कंपनी तो माना जाता है लेकिन नवाचारी नहीं। इसके बावजूद उनके कार्यकाल के तीन वर्षों में यह स्पष्ट नहीं है कि इन्फोसिस का मूल कारोबारी मॉडल बदला या नहीं। अगर इन्फोसिस नहीं बदल सकती तो कोई नहीं बदल सकता। इसके बावजूद जो भारतीय आईटी पेशेवर नवाचार को अपनाना चाहते हैं और आगे बढऩा चाहते हैं वे मौजूदा दौर से बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं। हो सकता है मार्जिन में कमी आए लेकिन वेतन भत्ते बढ़ेंगे। यह कोई बुरी खबर नहीं है। 
Keyword: IT, आईटी ब्रांड, सूचना प्रौद्योगिकी, ई-कॉमर्स,
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