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एफआरबीएम 2.0

संपादकीय /  April 16, 2017

राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम (एफआरबीएम) की समीक्षा के लिए गठित एक समिति ने केंद्र एवं राज्य सरकारों के लिए राजकोष के मामले में ईमानदारी बरतने के कड़े लक्ष्य सुझाए हैं। एक प्रमुख सिफारिश यह है कि राजकोषीय प्रदर्शन मापने के लिए चर घटक के रूप में सार्वजनिक ऋण और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात का प्रयोग किया जाए। कई परीक्षण करने और वैश्विक नियमों की पड़ताल करने के उपरांत समिति ने 2022-23 तक जीडीपी की तुलना में ऋण का अनुपात घटाकर 60 फीसदी पर लाने का सुझाव दिया है। अभी भारत में यह अनुपात लगभग 60 फीसदी है, जिसके कारण भारत की गिनती उभरती हुई उन अर्थव्यवस्थाओं में होती है, जिन पर ऋण का सबसे अधिक बोझ है। एफआरबीएम की वर्तमान प्रणाली में राजकोषीय एवं राजस्व घाटे पर ही ध्यान रहता है। ऋण-जीडीपी अनुपात को मध्यम अवधि का लक्ष्य बनाना तर्कसंगत दिख रहा है। समिति ने यह सुझाव भी दिया है कि ऋण का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए राजकोषीय एवं राजस्व घाटों को परिचालन लक्ष्य मानकर काम किया जाए। 2022-23 तक राजकोषीय घाटा जीडीपी का 2.5 फीसदी और राजस्व घाटा 0.8 फीसदी होना चाहिए।

 
लेकिन लक्ष्य मनमाने ही दिख रहे हैं। उदाहरण के लिए राजस्व घाटे को वर्तमान प्राप्तियों एवं उपभोग व्यय के बीच का अंतर भर मान लेना समझदारी नहीं होगी। भारत को स्वास्थ्य एवं शिक्षा पर भारी खर्च करना है क्योंकि ये दोनों मानव संसाधन के लिए महत्वपूर्ण निवेश हैं और इनके बगैर कोई भी अर्थव्यवस्था उभरते हुए ज्ञान के वर्चस्व वाले विश्व में ठीक से प्रतिस्पद्र्घा नहीं कर सकती। यदि शिक्षा एवं स्वास्थ्य में व्यय बढ़ाना है तो राजस्व घाटे से बचा ही नहीं जा सकता। इसके अलावा सरकारी ऋण को घटाकर 60 फीसदी पर लाने के लक्ष्य का अर्थ है नए ऋण पर प्रतिबंध ही लगा देना। इसलिए समिति की सिफारिशें अव्यावहारिक लगती हैं। मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) और समिति के सदस्य अरविंद सुब्रमण्यन ने अप्रसन्नता जताते हुए ऋण तथा राजकोषीय एवं राजस्व घाटे के मनमाने लक्ष्य निर्धारित किए जाने का विरोध किया है। उन्होंने कहा है कि सरकार को प्राथमिक घाटा (राजकोषीय घाटे में से ब्याज भुगतान घटाने पर बचा आंकड़ा) समाप्त करने का लक्ष्य रखना चाहिए और देखना चाहिए कि सरकार सरकार अपने वार्षिक परिचालन खर्च के लिए पर्याप्त राजस्व जुटा पा रही है या नहीं। सीईए ने कहा कि 2007 और 2016 के बीच सामान्य सरकारी (केंद्र और राज्य दोनों का) प्राथमिक घाटा कम करने के बावजूद भारत में वैश्विक प्रतिद्वंद्वियों की अपेक्षा इस घाटे का स्तर बहुत ऊंचा है। इससे भी बुरी बात यह है कि वैश्विक मानकों के अनुसार भारत की बहुत तेज वृद्घि के बावजूद घाटे का स्तर अब भी ऊंचा है।
 
सुब्रमण्यन ने सुझाव दिया कि प्राथमिक घाटे को तभी घटा लें, जब भारत की वृद्घि दर ब्याज दर की तुलना में बहुत अधिक है। ऐसा इसलिए भी कहा गया है क्योंकि ब्याज भुगतान तो काफी हद तक पहले से तय होता है, लेकिन प्राथमिक शेष सरकार के नियंत्रण के दायरे में होता है। सीईए के तर्क से सरकार को राहत मिल सकती है क्योंकि केंद्र का प्राथमिक घाटा पहले ही शून्य के आसपास है। इस हिसाब से अधिक राजकोषीय सख्ती की आवश्यकता नहीं है। लेकिन प्राथमिक घाटे को समाप्त करने का तरीका विकसित अर्थव्यवस्थाओं में अधिक कारगर साबित होता है, जहां कर से मिलने वाला राजस्व अधिक है और सरकार से पूंजीगत व्यय के लिए मांग काफी कम हैं। प्राथमिक घाटा शून्य होता है तो पूंजीगत अथवा बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए ऋण लेना तब तक असंभव रहेगा, जब तक अच्छा खासा राजस्व अधिशेष नहीं हो जाता है। भारत जैसे देश के लिए केवल व्यय की मात्रा नहीं बल्कि उसकी गुणवत्ता का भी ध्यान रखना ही राजकोषीय दूरदर्शिता है।
Keyword: FRBM, एफआरबीएम, राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम,
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