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देरी के लिए बीमा कंपनी जिम्मेदार

अदालत से
एम जे एंटनी /  April 16, 2017

उच्चतम न्यायालय ने नैशनल इंश्योरेंस कंपनी की दो अपील खारिज कर दी हैं जिनमें बाढ़ और आग के चलते हुए नुकसान की भरपाई करने के आदेश को चुनौती दी गई थी। बीमा कंपनी का कहना था कि हिंदुस्तान सेफ्टी ग्लास वक्र्स लिमिटेड और कनोरिया केमिकल्स ऐंड इंडस्ट्रीज ने नुकसान की भरपाई का दावा करने में देर की थी लिहाजा उन्हें भुगतान नहीं किया जा सकता है। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने उसकी दलील को खारिज करते हुए कहा है कि देरी तो खुद बीमा कंपनी की तरफ से की गई थी। हिंदुस्तान सेफ्टी वाले मामले में बाढ़ से हुए नुकसान की भरपाई के लिए 53 लाख रुपये का दावा किया गया था लेकिन सर्वेक्षक ने केवल 24 लाख रुपये ही हर्जाने के काबिल माना। सर्वेक्षक की रिपोर्ट से असंतुष्ट बीमा कंपनी ने राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में याचिका दायर करते हुए सीमा का मुद्दा उठाया। लेकिन आयोग ने उसकी याचिका को खारिज कर दिया जिसके बाद उच्चतम न्यायालय में अपील की गई। वहां पर न्यायालय ने बीमा कंपनी को ही भुगतान के दावे में देरी के लिए जिम्मेदार ठहराया है। पीडि़त कंपनी ने तो नुकसान के अगले ही दिन क्षतिपूर्ति का दावा कर दिया था लेकिन बीमा सर्वेक्षक ने अपनी रिपोर्ट देने में दो साल से भी अधिक वक्त लगा दिया था। इसी तरह कनोरिया केस में भी आग से हुए नुकसान की भरपाई के लिए 1993 में किए गए दावे को बीमा कंपनी ने 1999 में खारिज कर दिया था। इन मामलों में उपभोक्ताओं के हितों का विशेष ध्यान रखने का अदालतों को निर्देश देते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि वास्तविक अर्थों में सेवा या वस्तुओं के मामले में उपभोक्ता ही अलाभकारी स्थिति में होता है।

 
कोयला खदान हादसे में कारावास से मिली राहत
 
धनबाद की एक कोयला खदान में 20 साल पहले हुए हादसे में जानलेवा लापरवाही बरतने के आरोप में दोषी ठहराए गए खदान मैनेजर की अधिक उम्र को देखते हुए उच्चतम न्यायालय ने उसकी कठोर सजा को कम कर दिया है। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि हादसे के इतने वर्षों बाद खदान मैनेजर की उम्र अब 75 साल हो चुकी है और उस हादसे में उसने एक हद तक ही लापरवाही बरती थी। ऐसे में कारावास की सजा हटाकर उसे केवल जुर्माना भरने को ही कहा जा रहा है। बिनय कुमार बनाम झारखंड मामला धनबाद में एक खदान की छत धंसने से हुई चार मजदूरों की मौत से जुड़ा हुआ है। आरोप है कि खदान के अधिकारियों ने चेतावनी को नजरअंदाज करते हुए मजदूरों को काम जारी रखने को कहा था। इस हादसे में धनबाद की अदालत ने चार अधिकारियों समेत सात लोगों को दोषी ठहराया था और कठोर कारावास एवं जुर्माने की सजी सुनाई थी। उस फैसले के खिलाफ झारखंड उच्च न्यायालय में दाखिल याचिका को निरस्त कर दिया गया। दो दोषियों ने उच्चतम न्यायालय में अपील की लेकिन उन्हें दोषी ठहराने के फैसले को बरकरार रखा गया है। इतना जरूर है कि उनकी कारावास की सजा खत्म कर दी गई है और अब केवल जुर्माना ही भरना होगा।
 
प्रतिस्पद्र्धा आयोग की जांच पर रोक से इनकार
 
अगर भारतीय प्रतिस्पद्र्धा आयोग को प्रथम दृष्टया यह लगता है कि कुछ कंपनियों ने मिलकर एक गिरोह बना लिया है तो आयोग अपने महानिदेशक को आरोप की जांच करने के लिए आदेश दे सकता है और यह एक प्रशासकीय फैसला ही माना जाएगा। दिल्ली उच्च न्यायालय ने प्रीमियर रबर मिल्स और सोमी कन्वेयर बेल्टिंग्स लिमिटेड की अपील निरस्त करते हुए यह फैसला सुनाया। न्यायालय ने यह भी कहा है कि जिन कंपनियों के खिलाफ जांच चल रही है उन्हें बीच में कोई दस्तावेज देखने का भी अधिकार नहीं है। इन दोनों ही मामलों में आयोग ने अपने स्तर पर महानिदेशक को जांच करने का आदेश दिया था। आयोग को ऐसा लगा था कि ये कंपनियां माल ढुलाई में इस्तेमाल होने वाले पट्टïों के कारोबार में गिरोहबंदी कर रही हैं। इन कंपनियों पर बोलियां लगाने के पहले गोपनीय सूचनाएं एक-दूसरे से साझा करने का भी आरोप था। जब आयोग के महानिदेशक ने इनके खिलाफ जांच शुरू की तो उन्होंने उच्च न्यायालय में अपील करते हुए कहा कि उन्हें गोपनीयता के नाम पर संबंधित दस्तावेज देखने की भी इजाजत नहीं दी जा रही है। उनकी दलील थी कि ऐसा होने से अपनी सुरक्षा करने के अधिकार से उन्हें मनमाने तरीके से वंचित किया जा रहा है। न्यायालय ने इन सभी तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि प्रतिस्पद्र्धा आयोग को अपने महानिदेशक से जांच कराने का पूरा अधिकार है।
 
आईटीसी की ट्रेडमार्क अपील पर सुनवाई को तैयार

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने केरल के एक सहकारी बैंक के खिलाफ आईटीसी लिमिटेड की तरफ से दायर ट्रेडमार्क विवाद में सुनवाई के लिए अपना क्षेत्राधिकार बताया है। इस बैंक का नाम इरिंजलाकुदा टाउन कोऑपरेटिव बैंक है जिसे संक्षेप में आईटीसी बैंक के नाम से भी जाना जाता है। आईटीसी कंपनी ने इस बैंक के नाम को ट्रेडमार्क का उल्लंघन बताते हुए कहा था कि बैंक आईटीसी बैंक के नाम से ही चेक जारी कर उसे नुकसान पहुंचा रहा है। इस बैंक की तरफ से जारी एटीएम कार्ड भी देश भर में इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इन आरोपों के जवाब में बैंक की तरफ से यह दलील दी गई कि केरल स्थित बैंक होने के नाते कलकत्ता उच्च न्यायालय का इस मामले की सुनवाई का हक ही नहीं बनता है। लेकिन न्यायालय ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि वह इस मामले की सुनवाई कर सकता है। 
 
बिना सुनवाई के ग्रैच्युटी रोकने का अधिकार नहीं
 
बम्बई उच्च न्यायालय ने वित्तीय अनियमितता के आरोप में 20 साल पहले बर्खास्त किए जा चुके एक बैंक कर्मचारी को ग्रैच्युटी का भुगतान करने का आदेश दिया है। नन्नूभाई देसाई बनाम यूको बैंक मामले में न्यायालय ने कहा है कि बैंक ने बर्खास्तगी के पहले कर्मचारी को कोई कारण बताओ नोटिस जारी नहीं किया था और उसके खिलाफ र्को फौजदारी या दीवानी मामला भी नहीं दर्ज किया गया था। जहां तक ग्रैच्युटी का सवाल है तो ग्रैच्युटी भुगतान अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है और नियोक्ता के पास ग्रैच्युटी रोकने का कोई अधिकार नहीं है। न्यायालय का कहना है कि ग्रैच्युटी राशि जब्त करने के गंभीर नतीजे होते हैं और इस तरह का कोई भी आदेश अद्र्ध-न्यायिक आदेश माना जाएगा। ऐसा कोई भी आदेश जारी करते समय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का ध्यान रखते हुए निष्पक्ष सुनवाई का पर्याप्त मौका देना होगा। 
 
गेल इंडिया की अपील निरस्त
 
दिल्ली उच्च न्यायालय ने प्राकृतिक गैस नियामक बोर्ड अधिनियम के तहत शुल्क दरों, वितरण नेटवर्क और पाइपलाइन बिछाने के बारे में जारी नियमों को चुनौती देने वाली गेल इंडिया लिमिटेड की याचिका खारिज कर दी है। गेल ने इस याचिका में कहा था कि बोर्ड ने पाइपलाइन से लाई जाने वाली गैस की शुल्क दरों को तय कर अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर का काम किया है। उच्च न्यायालय ने इन नियमों को गैरकानूनी घोषित करने की अपील मानने से इनकार कर दिया है। 
Keyword: supreme court, high court,,
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