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अगर नहीं कोई मजबूरी तो ट्रस्ट में संरक्षक नहीं जरूरी

प्रिया नायर /  April 14, 2017

क्या आपके परिवार के हितों की रखवाली का दायित्व संभालने वाला व्यक्ति अनजाने में परिवार के खिलाफ काम कर सकता है? अगर ट्रस्ट का गठन सावधानी से नहीं किया गया है तो नई पीढ़ी को संपत्ति के बंटवारे के लिए गठित निजी ट्रस्टों में ऐसी स्थिति हो सकती है। हाल में एक ऐसा मामला सामने आया जहां ट्रस्टियों पर लाभार्थियों के हितों के खिलाफ काम करने का आरोप लगा। इस मामले में लाभार्थी एक मां और उसकी संतान थी। उन्होंने ट्रस्ट पर मासिक गुजारे भत्ते के तौर निर्धारित रकम से कम राशि देने का आरोप लगाया। यह रकम उसके दिवंगत पिता ने निर्धारित की थी। ट्रस्ट ने कहा कि उसने अपने प्रोटेक्टर (संरक्षक) के निर्देश पर ऐसा किया था जिसकी नियुक्ति ट्रस्ट बनाने वाले उसके पिता ने ही की थी। न्यायालय ने सभी संबद्ध पक्षों को अपने बीच मामले का सुलटाने का आदेश दिया। 

 
भारत में धीरे-धीरे कॉर्पोरेट ट्रस्टी का चलन बढ़ता जा रहा है क्योंकि धनाढ्य निवेशक (एचएनआई) अपनी संपत्ति के हस्तांतरण के लिए इस तरह की व्यवस्था को तरजीह देते हैं। एक कॉर्पोरेट ट्रस्टी वस्तुनिष्ठ होगा और कम पक्षपाती होता है, लेकिन यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ट्रस्ट का ढांचा बहुत सख्त न हो। संरक्षक या संरक्षक समिति की भूमिका यहीं पर महत्त्वपूर्ण हो जाती है। कुछ समय से भारत में ट्रस्टों के कामकाज पर निगरानी के लिए इनमें संरक्षक भी रखे जाने लगे हैं। हालांकि ट्रस्ट से जुड़े कानूनों के अनुसार यह अनिवार्य नहीं है। 
 
मोतीलाल ओसवाल प्रावइेट वेल्थ मैनेजमेंट में ट्रस्ट  और एस्टेट प्लानिंग प्रमुख नेहा पाठक कहती हैं, 'भारत में प्राइवेट ट्रस्टों से जुड़े कानूनों के अनुसार संरक्षक होना अनिवार्य नहीं है। ट्रस्टी अगर डीड में निर्धारित नियमों के अनुसार काम नहीं करते हैं तो ट्रस्ट बनाने वाला संरक्षक की नियुक्ति करता है। अगर ट्रस्ट में कॉर्पोरेट ट्रस्टी और संरक्षक दोनों ही हों तो इससे ट्रस्ट में सही संतुलन बना रहता है। वारमॉन्ड ट्रस्टीज के मुख्य कार्याधिकारी अनुरुद्ध शाह का कहना है कि ट्रस्ट बनाने वाला अगर चाहे तो ट्रस्टी और संरक्षक के साथ मिलकर ट्रस्ट के नियम और शर्तें तय कर सकता है जिससे कि ट्रस्ट एक निश्चित व्यवस्था के तहत काम करता रहे।
 
इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि ट्रस्ट का ढांचा ऐसा हो जिसमें भविष्य में होने वाले बदलावों अपनाने का लचीलापन हो। मसलन, ट्रस्ट के कोष को लाभार्थियों में वितरित करने के लिए ट्रस्ट बनाने वाले ने जो दिशानिर्देश तय किए हैं, उन पर पर 10-15 साल बाद फिर से विचार किया जा सकता है। यह उस समय की महंगाई और परिवार की स्थिति पर निर्भर करता है। लाभार्थियों और संरक्षक दोनों से मशविरा करने के बाद नई व्यवस्था की जा सकती है। शाह स्पष्टï करते हैं, 'ट्रस्ट बनाने वाले के लिए ये सवाल होते हैं कि उसके बाद कोष का प्रबंधन कौन करेगा और धन कहां से जुटाएगा? अगर लाभार्थी वयस्क नहीं है तो निवेश आदि के बारे में निर्णय कौन लेगा? ऐसी स्थिति में ट्रस्ट बनाने वाला ट्रस्ट के लिए एक निश्चित निवेश तौर तरीका परिभाषित करेगा जिसका पालन ट्रस्ट को करना होगा। एक विकल्प यह है कि अगर परिवार के किसी व्यक्ति को वित्तीय समझ है और वह भरोसेमंद है तो फिर वह भी संरक्षक हो सकता है और फैसला कर सकता है कि निवेश कैसा किया जाएगा।'
 
कौन बन सकता है संरक्षक
 
ऐसा कोई सिद्धांत नहीं है कि कौन ट्रस्टी हो सकता है और कौन नहीं। कोई भी ऐसा शख्स ट्रस्टी हो सकता है, जिसे ट्रस्ट बनाने वाला जानता है और भरोसा करता है। 
वह उसके परिवार का कोई सदस्य या भाई-बहन हो सकता है या कोई पारिवारिक घनिष्ठ मित्र भी हो सकता है। शाह कहते हैं, 'संरक्षक की भूमिका की शुरुआत ट्रस्ट बनाने वाले की मृत्यु के बाद शुरू होती है। लिहाजा, आदर्श स्थिति यह है कि संरक्षक की उम्र कम होनी चाहिए। 
 
संरक्षक की भूमिका और उसके अधिकार वास्तव में ट्रस्ट डीड में होते हैं। कुछ मामलों में संरक्षक की भूमिका सीमित हो सकती है तो दूसरे मामलों में व्यापक हो सकती है। अगर लाभार्थियों और ट्रस्टियों को लगता है कि संरक्षक अपनी भूमिका लांघने की कोशिश कर रहा है तो वे कानून की शरण में जा सकते हैं। पाठक कहती हैं कि संरक्षक को किसी भी रूप में ट्रस्ट से लाभ नहीं कमाना चाहिए। मसलन, एक अनिवार्य नियम यह हो सकता है कि ट्रस्ट को संरक्षक के नियंत्रण या उसकी हिस्सेदारी या हित वाली किसी कंपनी में कोई  निवेश नहीं करना चाहिए।
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