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म्युचुअल फंड में लंबा निवेश बनाए रखना निवेशक के हित में

संजय कुमार सिंह /  April 14, 2017

भारत में म्युचुअल फंड (एमएफ) निवेशकों के बीच सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) खासा लोकप्रिय हो गया है। अब अधिक से अधिक संख्या में लोग शेयरों में सीधे निवेश के बजाय एमएफ का रास्ता अपना रहे हैं। हालांकि भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के ताजा निवेशक सर्वेक्षण के अनुसार निवेशकों के मन में म्युचुअल फंड के बारे में कई भ्रांतियां हैं। इससे धन सृजन करने की एमएफ की क्षमता का पूर्ण इस्तेमाल नहीं हो पाता है। 

 
सबसे पहले इस सर्वेक्षण के सकारात्मक बिंदुओं पर विचार करते हैं। जो लोग पहले से ही शेयर बाजार में निवेश कर रहे हैं, उनके लिए शेयरों में सीधे निवेश (55 प्रतिशत) करने के मुकाबले म्युचुअल फंड (66 प्रतिशत) के जरिये निवेश करना अधिक लोकप्रिय हो गया है। इसका श्रेय एसोसिएशन ऑफ म्युचुअल फंड्स इन इंडिया (एम्फी) के प्रयासों को जाता है। म्युचुअल फंड निवेशकों में 60 प्रतिशत एसआईपी के माध्यम से निवेश करते हैं।
 
नकारात्मक पक्ष की बात करें तो सर्वेक्षण में रेखांकित किया गया है कि शहरों में भी म्युचुअल फंडों के बारे में केवल 28.4 प्रतिशत लोग जानते हैं और उनके इस्तेमाल से महज 9.7 प्रतिशत लोग वाकिफ हैं। बैंक जमा, जीवन बीमा, डाकघर बचत, रियल एस्टेट, कीमती धातुओं आदि की तुलना में एमएफ के बारे में जानकारी वाकई बहुत कम है। फाइनैंशियल प्लानिंग स्टैंडड्र्स बोर्ड ऑफ इंडिया के वाइस चेयरमैन एवं मुख्य कार्याधिकारी रंजीत एस मुधोलकर कहते हैं, 'जो कुछ लोग एमएफ के बारे में जागरूक हैं, केवल वे इी इनमें निवेश करते हैं। यह आंकड़ा बढ़ाने के लिए सलाहकारों में विश्वास बढ़ाने की जरूरत है।'
 
जो परिवार एमएफ में निवेश नहीं करते हैं, उन्होंने निवेश से जुड़ी सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता बताई थी। मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट एडवाइजर इंडिया के निदेशक (मैनेजर रिसर्च) कौस्तुभ बेलापुरकर कहते हैं, 'जोखिम कम करने के लिए निवेशकों को यह जानना होगा कि उन्हें जोखिम लेने की क्षमता और निवेश अवधि के हिसाब से किस फंड में निवेश करना चाहिए। अगर जोखिम लेने की क्षमता अधिक है और 5 से 7 साल के लिए निवेश किया जा सकता है तो उन्हें इक्विटी फंडों में निवेश करना चाहिए। नहीं तो उन्हें डेट म्युचुअल फंडों में निवेश करना चाहिए।'
 
इसके अलावा पोर्टफोलियो में विविधता लाकर भी निवेशक जोखिम कम कर सकते हैं। मुधोलकर कहते हैं, 'शुरुआती निवेशकों को शेयर बाजार के जोखिम अधिक लेने से परहेज करना चाहिए। उन्हें अपना निवेश इक्विटी, फिक्स्ड इनकम और लिक्विड फंडों में समान रूप से फैला देना चाहिए।' सर्वेक्षण में निवेशकों की एक अनूठी मानसिकता का भी पता चला है। इसके मुताबिक निवेशक मानते हैं किसी भी फंड का प्रदर्शन भविष्य में भी वैसा ही रहेगा, जैसा उसने अतीत में किया था, चाहे सफलता हो या असफलता। लेकिन जानकार चाहते हैं कि निवेशकों को 'लॉ ऑफ  मीन रिवर्सन' के बारे में पता होना चाहिए। इसके मुताबिक कोई भी परिसंपत्ति हाल में कितना भी अच्छा प्रदर्शन करे, भविष्य में वह लगातार वैसा ही प्रदर्शन करती नहीं रह सकती। खराब प्रदर्शन करने वाली परिसंपत्ति श्रेणी के बारे में भी यही तर्क लागू होता है। सेबी के साथ पंजीकृत निवेश सलाहकार विपिन खंडेलवाल कहते हैं, 'निवेशकों को किसी खास प्रकार के एमएफ के प्रतिफल का अंदाजा लगाने के लिए दीर्घ अवधि के औसत प्रतिफल पर अच्छी तरह से विचार करना चाहिए।'
 
एक अन्य दिलचस्प अध्ययन एमएफ में निवेश की अवधिसे जुड़ा है। एक ओर जहां अधिक संख्या में निवेशक (58 प्रतिशत) अनिश्चितता के समय एमएफ में निवेश बनाए रखने का वादा करते हैं, लेकिन वास्तव में यह अवधि बहुत कम थी। खंडेलवाल कहते हैं, 'जब लोग निवेश करना शुरू करते हैं तो वे अपने एमएफ में काफी बदलाव करते हैं। कई निवेशक एमएफ को शेयरों की तरह लेते हैं और मानते हैं कि इनका लेन-देन और सक्रिय रूप से प्रबंधन किए जाने की जरूरत है। बाद में जाकर वे लंबी अवधि के लिए निवेश करना शुरू करते हैं।' वह कहते हैं कि कई लोगों में धैर्य का अभाव होता है। खंडेलवाल कहते हैं,'जैसे ही लोग देखते हैं कि फंड 30-40 प्रतिशत ऊपर गया है वे मान लेते हैं कि बिकवाली का यह उचित समय है। निवेशक कई बार स्टार रेटिंग पर भी निर्भर रहते हैं। जब भी वे देखते हैं कि किसी फंड को 5 स्टार रेटिंग मिल गई है तो वे कम रेटिंग वाले फंड से निवेश निकालकर पांच स्टार वाले फंड में लगा देते हैं।' इस प्रक्रिया में उन्हें कई बार कर और एक्जिट कॉस्ट का भुगतान करना पड़ता है और वे ऐसे मौके पर पांच स्टार रेटिंग वाले फंड में निवेश करते हैं, जब इसकी चमक कमजोर पडऩी शुरू हो जाती है। 
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