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अनावश्यक हस्तक्षेप

संपादकीय /  April 13, 2017

सरकार ने 500,000 टन कच्ची चीनी के शुल्क मुक्त आयात की इजाजत देने का फैसला किया है जो कुछ खास समझदारी भरा नहीं लगता। यहां तक कि यह घोषणा करते समय खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री राम विलास पासवान ने जोर देकर कहा कि हमारी जरूरतों को देखते हुए  पर्याप्त चीनी मौजूद है। मार्च के मध्य में चालू वर्ष की कुल चीनी उपलब्धता करीब 2.8 करोड़ टन थी। इसमें 77 लाख टन का आरंभिक स्टॉक शामिल था जबकि अनुमानित आवश्यकता 2.4 से 2.5 करोड़ टन है।

 
जाहिर सी बात है कि करीब 40 लाख टन चीनी अतिरिक्त उपलब्ध होगी। अगर चीनी उद्योग के पहले घोषित 2.25 करोड़ टन के उत्पादन अनुमान के स्थान पर संशोधित किए गए 2.03 करोड़ टन के आकलन को सही मान लिया जाए तो भी मौजूदा सत्र का समापन चीनी के अधिशेष के साथ ही होगा। हालांकि पासवान आरोप लगा चुके हैं कि चीनी उद्योग जनता को भ्रमित कर रहा है, ऐसे में यह भी एक शंका है। 
 
लिहाजा सवाल यह उठता है कि बीते तीन सप्ताह के दौरान ऐसा क्या हुआ कि सरकार को शुल्क मुक्त आयात की इजाजत देनी पड़ी। यहां तक कि चीनी क्षेत्र में भी आयात की सलाह को लेकर अलग-अलग राय व्यक्त की जा रही है। खासतौर पर यह देखते हुए कि यह मात्रा कुल आवश्यकता का बहुत मामूली हिस्सा है। उद्योग जगत का एक धड़ा सोचता है कि कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए और अधिक मात्रा में आयात करना पड़ सकता है जबकि अन्य का मानना है कि इस आयात की कोई आवश्यकता ही नहीं है। उनकी दलील है कि महाराष्ट्र तथा देश के दक्षिणी राज्यों में चीनी के उत्पादन में सूखे के चलते जो गिरावट आई है उसकी भरपाई उत्तरी राज्यों खासतौर पर उत्तर प्रदेश में हुए अच्छे उत्पादन से हो गई है। ऐसा इसलिए हो सका क्योंकि गन्ने का रकबा बड़ा था और ज्यादा मिठास वाले गन्ने की किस्म इस्तेमाल की गई। इसके अलावा अक्टूबर 2017 में शुरू हो रहे अगले मौसम में चीनी उत्पादन के पूर्वानुमान में भी काफी सुधार हुआ है। इसके अलावा वर्ष के दौरान वास्तविक खपत भी बहुत अधिक नहीं रहने का अनुमान है। इसके पीछे भी कई वजह हो सकती हैं, मसलन नोटबंदी, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये दी जाने वाली चीनी पर केंद्र की सब्सिडी का समापन और घरेलू बाजार में चीनी की अपेक्षाकृत मजबूत कीमत। एक नजरिया यह भी है कि कच्ची चीनी के आयात से केवल उन मिल मालिकों को फायदा होगा जिनके पास अपनी रिफाइनिंग क्षमता है। चाहे जो भी हो लेकिन चीनी उद्योग पहले ही इस मौसम में चीनी की अच्छी कीमतों से लाभान्वित हो चुका है।
 
बहरहाल, आयात के गुणदोषों पर बात किए बगैर तथ्य यही है कि वैश्विक चीनी बाजार में भारत के हस्तक्षेप से चीनी कीमतें मजबूत होंगी जबकि सबसे बड़े चीनी उत्पादक ब्राजील में रिकॉर्ड उत्पादन के कारण कीमतें अब तक कमजोर थीं। हकीकत में कीमतों में तेजी आनी शुरू भी हो चुकी है। ऐसे में आयात में होने वाली कोई भी बढ़ोतरी घरेलू कीमतों पर अनुमानित प्रभाव को खत्म कर देगी। बड़ा सवाल यह भी है कि क्या चीनी ऐसी अनिवार्य वस्तु है कि सरकार को उसके मामले में बार-बार हस्तक्षेप करना पड़े? हकीकत में चीनी की आपूर्ति का बड़ा हिस्सा पेय पदार्थ और आधुनिक एवं पारंपरिक मिष्ठïान्न आदि उद्योगों में चला जाता है। आम आदमी का उपभोग इससे काफी कम है। ऐसे में जरूरत यह है कि चीनी के घरेलू और बाहरी कारोबार को लेकर स्थिर नीतियां तैयार की जाएं बजाय ऐसे औचक निर्णय करने के। मूल्य में स्थिरता लाने के लिए जरूरत यह है कि गन्ने और चीनी का मांग आधारित उत्पादन हो। ऐसा तभी संभव है जब सरकार का हस्तक्षेप न्यूनतम हो। 
Keyword: sugar, चीनी आयात,
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