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देश की स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था खुद इलाज की मोहताज

कारोबारी मंत्र
भूपेश भन्डारी /  April 12, 2017

बीते मार्च महीने में महाराष्ट्र के चार सरकारी अस्पतालों में नाराज भीड़ ने चिकित्सकों पर हमला किया। इसके बाद जूनियर डॉक्टर हड़ताल पर चले गए और राज्य में स्वास्थ्य संकट शुरू हो गया। इसके चलते शल्य चिकित्सा के 500 से अधिक मामलों को टालना पड़ा। मार्च में ही चेन्नई में 1,000 से अधिक चिकित्सक सड़कों पर उतर आए क्योंकि एक सरकारी अस्पताल में लोगों ने चिकित्सक पर हमला कर दिया था।
मामला केवल सरकारी अस्पतालों तक सीमित नहीं है। निजी अस्पतालों के चिकित्सकों को भी हाल के दिनों में हमलों का सामना करना पड़ा है। फरवरी में कोलकाता में एक अस्पताल में पेट दर्द के इलाज के लिए भर्ती एक बच्ची की मौत हो जाने पर भीड़ ने अस्पताल पर हमला कर दिया था। एक अन्य अस्पताल उस समय आलोचना का शिकार बना जब उसने एक मृत मरीज के परिजनों से कहा कि उनको मरीज का शव तभी सौंपा जाएगा जब वे सारा बकाया पैसा जमा कराएंगे। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा कराए गए एक अध्ययन के मुताबिक 75 फीसदी से अधिक चिकित्सकों को कभी न कभी शारीरिक या भाषाई हिंसा का सामना करना पड़ता है। इसकी कई वजह हैं।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के प्रेसिडेंट केके अग्रवाल कहते हैं कि मरीज अब भक्ति युग से ज्ञान युग में प्रवेश कर चुके हैं। यानी अब वे चिकित्सक के प्रति श्रद्धा नहीं रखते बल्कि अपनी बीमारी और उसके इलाज के बारे में वे पहले से ही सारी जानकारी रखते हैं। कोई भी शंका होने पर वे प्रश्न करते हैं जो कि वाजिब भी है। जबकि चिकित्सक अब तक पुराने जमाने में जी रहे हैं जहां उनसे सवाल नहीं पूछे जाते थे।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने पिछले दिनों एक ऑनलाइन सर्वे की शुरुआत की जिसके नतीजे रोचक हैं। इसमें 500 से अधिक लोगों ने भाग लिया। उनमें से 72 फीसदी ने कहा कि चिकित्सकों को अपना पूरा परिचय देना चाहिए और अपनी शिक्षा के बारे में भी उनको पूरी जानकारी देनी चाहिए। सर्वे में शामिल 92 फीसदी लोगों के मुताबिक चिकित्सकों को उनकी बात पूरे विस्तार से सुननी चाहिए। 85 फीसदी लोगों का मानना था कि चिकित्सक को उन्हें बीमारी, इलाज और दवाओं के बारे में सबकुछ बताना चाहिए। वहीं 79 फीसदी लोगों ने कहा कि चिकित्सकों को पहले यह देखना चाहिए कि क्या उन्हें इलाज समझ आ गया है। जाहिर है कहीं न कहीं मरीजों और चिकित्सकों के दरमियान संवाद की कमी है।
यूं भी अस्पताल जाने पर किसी भी मरीज का सामना सबसे पहले किसी न किसी जूनियर डॉक्टर से ही होता है। ये डॉक्टर अक्सर अपनी बात सही ढंग से संप्रेषित नहीं कर पाते हैं। नतीजा, इससे मरीज नाराज होते हैं। निजी अस्पतालों में चिकित्सक जोखिम को कम करके बताते हैं कि कहीं मरीज डर कर वहां से चला न जाए। अक्सर ऐसा करने के कारण इलाज की लागत बढ़ जाती है। कुछ महंगे अस्पताल तो अपने चिकित्सकों की सुरक्षा के लिए बाउंसर तक रखते हैं।
इधर, लोगों में गुस्सा भी लगातार बढ़ता जा रहा है। निजी अस्पतालों में चिकित्सकों के प्रति श्रद्धा की जगह अब शंका ने ले ली है। शायद इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने निजी अस्पतालों को तलब कर उन्हें कुछ सीख सबक दिए। उन्होंने उनकी तुलना बूचडख़ानों से कर दी। इसके बाद वह राज्य विधानसभा में एक विधेयक लाईं ताकि अतिरिक्त बिलिंग करने, दुर्घटना के शिकार मरीज का इलाज करने से मना करने, तथा किसी शव को पैसे के लिए रोकने वाले अस्पतालों को बाकायदा अपराधी ठहराया जा सके। राज्य के अस्पतालों को इलाज का पूरा अग्रिम अनुमान देना होगा और अंतिम बिल और आरंभिक अनुमान में एक फीसदी से अधिक अंतर नहीं आना चाहिए। इस विधेयक में निजी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए एक नियामक की बात भी कही गई है। झारखंड में भी निजी अस्पतालों के लिए ऐसा विधेयक तैयार है।
हालांकि इससे कोई मदद मिलेगी इसमें संदेह ही है। नियमन और प्रवर्तन मूल्य नियंत्रण से कहीं अधिक बेहतर हैं। पुलिस राज कायम कर ऐसे सुधार नहीं किए जा सकते।
सरकारी अस्पतालों में क्षमता की समस्या है। हाल में हुई तमाम हिंसात्मक घटनाओं में मरीज के मित्र या परिजन इलाज से खुश नहीं थे। उनकी हताशा चिकित्सकों पर निकली। हो सकता है इलाज की प्रक्रिया गलत हो। हो सकता है चिकित्सकों का तरीका संवेदनशील न रहा हो। अन्य मामलों में यह स्पष्ट है कि अस्पतालों की सीमित क्षमता समस्या की वजह बनती है।
चिकित्सकों के आसपास इतने मरीज होते हैं कि वे सबको पूरा समय नहीं दे पाते। यह बात लोगों को रास नहीं आती। सरकारी अस्पतालों में वरिष्ठ चिकित्सक रोज करीब 90 मरीज देखते हैं। महाराष्ट्र में जिन चिकित्सकों पर हमला किया गया उनमें से एक 36 घंटे से लगातार अस्पताल में था। वह एक वार्ड में 45 लोगों को देख रहा था जिनमें से सात बुरी तरह बीमार थे। ज्यादातर अस्पतालों में नर्सों की तादाद बेहद कम थी।
सरकार को स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करनी चाहिए। इससे अस्पतालों में चिकित्सकों पर से दबाव कम होगा और निजी अस्पतालों पर भी नजर रखी जा सकेगी। मरीजों के पास भी अधिक विकल्प होंगे। फिलहाल ऐसा नहीं है। स्वास्थ्य बीमा की हालत बहुत खराब है। अगर ऐसा नहीं होता तो बीमा कंपनियां निजी अस्पतालों को ज्यादा बिलिंग करने से रोक सकती थीं। लेकिन क्षमता सुधार सरकार की प्राथमिकता में नहीं दिख रहा। ऐसे में अस्पतालों में हिंसा का सिलसिला जारी है।

Keyword: hospital, medical, treatment,
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