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आम आदमी को मिल सकता है रेलगाड़ी का मालिकाना हक?

अगर जमीन अधिग्रहण का मसला रेलवे के साथ उलझता है तो उस भूमि का स्वामी रेलगाड़ी का 'मालिक' भी बन सकता है। इस संबंध में जानकारी दे रहे हैं विवेक देवरॉय
विवेक देवरॉय /  April 12, 2017

यह धारणा गलत है कि कोई व्यक्ति निजी तौर पर ट्रेन यानी रेलगाड़ी का मालिक नहीं बन सकता। हकीकत में भूमि के मालिक ट्रेन का मालिकाना हक  हासिल कर सकते हैं और रेलवे स्टेशन के कुछ हिस्से के मालिक भी बन सकते हैं। यह कहानी है पंजाब के जालंधर जिले में स्थित कटाना गांव के संपूरण सिंह की। चंडीगढ़-लुधियाना रेल लाइन को बनने में काफी वक्त लगा। इसके निर्माण का प्रस्ताव 1997-98 में रखा गया था। इसका निर्माण तीन चरणों में किया गया: चंडीगढ़-मोरिंडा, सनेहवाल-लुधियाना और न्यू मोरिंडा-सनेहवाल । इसके लिए वर्ष 1999 से 2002 के बीच भूमि अधिग्रहण किया गया। इसमें जो भी देरी हुई वह मोटे तौर पर भूमि अधिग्रहण की दिक्कतों और उसके चलते होने वाली मुकदमेबाजी के कारण हुई। निचली अदालतों तथा पंजाब एवं  हरियाणा उच्च न्यायालय में बहुत बड़ी तादाद में ऐसे मामले दर्ज थे। संपूरण सिंह के पास 5.5 बीघा जमीन थी और भारतीय रेल (उत्तर रेलवे) ने इसका 2007 में अधिग्रहण कर लिया था। भूस्वामी को इसके लिए 25 लाख रुपये प्रति एकड़ की दर से मुआवजा दिया गया। वह संतुष्ट नहीं थे और इसके खिलाफ अदालत चले गए। कई अन्य भूस्वामियों ने भी यही किया था। अदालत ने कहा कि प्रति एकड़ 50 लाख रुपये की दर से हर्जाना मिलना चाहिए। दोनों पक्षों को सुनने के बाद जनवरी 2015 में अदालत ने इस हर्जाने को भी बढ़ाकर दोगुना कर दिया। संक्षेप में कहें तो भारतीय रेल को संपूरण सिंह को 1.47 करोड़ रुपये का मुआवजा चुकाना चाहिए था। चूंकि 42 लाख रुपये का भुगतान किया जा चुका था इसलिए 1.05 करोड़ रुपये का भुगतान बकाया था। सिंह ने अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पास अपील करके आदेश का क्रियान्वयन कराए जाने की मांग की। अगर कोई संस्थान भुगतान नहीं करता है तो अदालत के पास यह अधिकार होता है कि वह उसकी संपत्ति जब्त करे।
नई दिल्ली-अमृतसर स्वर्ण शताब्दी एक्सप्रेस इन्हीं दोनों शहरों के बीच चलती है। इसकी देखरेख का दायित्व उत्तर रेलवे का है। अदालत ने आदेश दिया कि इस ट्रेन को जब्त कर लिया जाए। एंड-ऑन जनरेटर कार (ईओजी) होने के नाते यह ट्रेन और इसका डब्ल्यूएपी 5 इंजन काफी महंगा माना जाता है। अगर बकाया राशि को देखा जाए तो इसके लिए पूरी ट्रेन की जब्ती जरूरी नहीं थी। लेकिन शायद न्यायाधीश नाराज थे और अपने आदेश के जरिये दंड भी देना चाहते थे। यही वजह थी कि उन्होंने लुधियाना स्टेशन पर अधीक्षक के कमरों में से एक को भी जब्त कर लिया। आखिर सिंह इस ट्रेन का क्या करेंगे? रेलवे अधिनियम 1989 किसी व्यक्ति को निजी तौर पर ट्रेन चलाने की इजाजत नहीं देता। अदालती निगरानी के अधीन ट्रेन और उस कमरे की नीलामी की जानी चाहिए थी। इससे उसकी बाजार कीमत निकल आती। लेकिन भारतीय रेल ने भुगतान के लिए और वक्त मांगा।
यह कोई अजीब और शर्मिंदगी भरी स्थिति नहीं है क्योंकि भारतीय रेल पहले भी इस दौर से गुजर चुकी है। करीब 100 किलोमीटर लंबी चित्रदुर्ग-रायदुर्ग रेल लाइन का अधिग्रहण सन 1986 में किया गया था। सिंह की तरह इस मामले में भी कई ग्रामीण तय हर्जाने से नाखुश थे। उनमें से करीब 50 ने अदालत का रुख किया और सन 2015 में जिला प्रधान एवं सत्र न्यायालय ने भारतीय रेल (दक्षिण पश्चिम रेलवे) को आदेश दिया कि वह 50 किसानों को दो महीने के अंदर एक-एक करोड़ रुपया हर्जाना दे। दो महीने का समय रेलवे ने खुद मांगा था। लेकिन रेलवे ऐसा नहीं कर पाया और जनवरी 2016 में अदालत ने हरिहर-चित्रदुर्ग-बेंगलूरु पैसेंजर टे्रन की जब्ती का आदेश दे दिया। फरवरी 2016 में यह जब्ती हो भी गई। भारतीय रेल ने मामला निपटाने के लिए 45 दिन का समय और मांगा। यात्रियों की असुविधा देखते हुए ट्रेन को छोड़ दिया गया। नवंबर 2016 में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि निचली अदालतों को ट्रेन और इंजन आदि को जब्त नहीं करना चाहिए। अप्रैल 2015 में एक तीसरा मामला सामने आया। भारतीय रेल ने ऊना-तलवाड़ा रेलमार्ग का एक हिस्सा बनाने के लिए जमीन का अधिग्रहण किया। इस मामले में दो किसानों को हर्जाना देना था। भारतीय रेल द्वारा हर्जाना नहीं देने से अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने आदेश दिया कि नई दिल्ली-ऊना जनशताब्दी एक्सप्रेस को कुर्क किया जाए। भारतीय रेल ने अंतिम समय में भुगतान किया और रेलगाड़ी के ऊना से रवानगी के निर्धारित समय से पांच मिनट पहले उसे जब्त होने से बचा लिया।
ऐसे मामलों को समझना मुश्किल है। दावों और अपील को तो समझा जा सकता है लेकिन भारतीय रेल की धारा 187 में कहा गया है कि रेलवे की किसी संपत्ति के खिलाफ कार्रवाई से उसे निरोध हासिल है। किसी रोलिंग स्टॉक, मशीनरी, संयंत्र, उपकरण, फिटिंग, सामग्री आदि जिनका इस्तेमाल रेलवे प्रशासन द्वारा परिवहन के कार्य में या अपने स्टेशनों पर अथवा कार्यशालाओं में किया जाता है उनको किसी अदालती आदेश स्थानीय प्राधिकार या व्यक्ति द्वारा बगैर केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के जब्त नहीं किया जा सकता, न ही उसका इस्तेमाल किया जा सकता है। वहीं इसी धारा के दूसरे उपखंड में कहा गया है कि किसी डिक्री या आदेश के तहत रेलवे की आय की जब्ती अदालत द्वारा की जा सकती है। क्या भारतीय रेल को धारा 187 के पहले खंड में जरूरत से ज्यादा भरोसा है। हो सकता है इस बात में कुछ सच्चाई हो लेकिन इसका संबंध भारतीय रेल की निर्णय प्रक्रिया से भी है। नई रेल लाइन बिछाने और भूमि अधिग्रहण का काम कौन करता है? यह काम किसी खास क्षेत्र का निर्माण संगठन करता है जिसका नेतृत्व मुख्य प्रशासनिक अधिकारी (विनिर्माण) के पास होता है। वह उस क्षेत्र के महाप्रबंधक को रिपोर्ट करता है। तब तक एक अदालत ने अपने निर्णय में कह दिया था कि रेल लाइन एक डिवीजन की संपत्ति होती है जिसका नेतृत्व संभागीय रेल प्रबंधक (डीआरएम) के पास होता है। पूरे निर्माण कार्य पर इसका एकाधिकार होता है। किसी भी तरह के निर्माण के लिए डीआरएम से भुगतान करने को कहा जाता है। यानी रेल परिसंपत्ति की जब्ती के मामलों में भी उसकी जवाबदेही बनती है।
(लेखक नीति आयोग के सदस्य हैं। लेख में प्रस्तुत विचार पूर्णतया निजी हैं)

Keyword: Rail, Train, lines,
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