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व्यवस्थित बदलाव जरूरी

संपादकीय /  April 11, 2017

गत सप्ताह केंद्रीय मंत्रिमंडल ने रेल विकास प्राधिकरण (आरडीए) के गठन की इजाजत दे दी। यह प्राधिकरण रेल नियामक के रूप में काम करेगी। उम्मीद है कि 1 अगस्त से प्राधिकरण काम संभाल लेगा और वह तमाम नीतिगत निर्णयों पर सरकार को सलाह देगा, खासतौर पर किराया और माल भाड़ा तय करने के बारे में। लंबे समय से भारतीय रेल हर मोर्चे पर संघर्ष कर रहा है। यात्रियों की बात करें तो किराया बहुत अधिक नहीं बढ़ा है लेकिन सेवाओं का स्तर भी नहीं सुधरा है। दूसरी ओर, यात्री किरायों से कम आय की भरपाई माल भाड़ा बढ़ाकर करने की कोशिश की गई। इससे रेलवे की वित्तीय स्थिति भी प्रभावित हुई और वह बतौर मालवाहक महंगा होता गया। फिलहाल लंबी दूरी की यात्राओं में रेल सफर हवाई सेवा की तुलना में महंगा है और छोटी दूरी में बस की तुलना में।
सबसे बड़ी समस्या यह रही कि ऐसे मसले पर निर्णय लेने की राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाई गई। मिसाल के तौर पर कभी समय पर किराये में उचित वृद्घि नहीं की गई। रेलवे को ऐसे स्वतंत्र नियामक की सख्त आवश्यकता थी जो वाणिज्यिक सिद्घांतों पर काम करता हो और उचित निर्देशन कर सके। जैसा कि राष्टï्रीय परिवहन विकास नीति समिति (एनटीडीपीसी) ने 2014 में कहा था कि रेलवे बोर्ड के सारे कामकाज का केंद्रीकरण इस संस्थान की वृद्घि की दृष्टिï से बड़ा अवरोधक साबित हुआ है, खासतौर पर ऐसे समय जबकि बुनियादी ढांचे में जबरदस्त निवेश की आवश्यकता है। मनमाने निर्णयों की जगह स्वतंत्र नियामक किरायों को तार्किक बनाने और कारोबारी गुंजाइश बढ़ाने में अधिक सफल होगा। अगर रेलवे के माल भाड़ा राजस्व में आ रही कमी को देखा जाए तो ऐसा हस्तक्षेप महत्त्वपूर्ण है। इसकी मदद से ही राजस्व और यातायात दोनों सुधारे जा सकेंगे।
लिहाजा, स्वतंत्र नियामक स्वागतयोग्य पहल है। सबसे पहले वर्ष 2001 में राकेश मोहन की अध्यक्षता वाले विशेषज्ञ समूह ने इसकी आवश्यकता जताई थी। वर्ष 2015 आते-आते कई समितियों ने इसकी जरूरत पर बल दिया। इससे पहले रेल बजट को आम बजट में मिलाकर रेलवे को राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर करने का एक और उपाय किया गया। इस कदम को उसी से जोड़कर देखना चाहिए। रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने वर्ष 2015-16 के रेल बजट में ही रेल नियामक लाने का वादा किया था। लेकिन उसके बाद सरकार राह भटक गई। उसने नियामक के लिए विधायी मंजूरी हासिल करने की प्रक्रिया में काफी समय गंवाया। यह काम कार्यकारी आदेश से भी किया जा सकता था। इससे पहले भी कार्यकारी आदेश पर नियामकीय संस्थाएं गठित की जाती रही हैं। इसलिए रेलवे नियामक के गठन में देरी के पीछे यह दलील समझ से परे रही क्योंकि नियामक बनाने के लिए तरीका तो आखिरकार वही अपनाना पड़ा।
हालांकि माल भाड़े या किराये को लेकर इस नए संस्थान की अनुशंसाएं रेलवे पर बाध्यकारी ढंग से लागू नहीं होंगी। उसे इस बात की आजादी होगी कि वह अपने मुताबिक किराया तय कर सके। उम्मीद है कि ऐसा करने से रेलवे को तकनीकी मसलों पर विशेषज्ञ सलाह लेने का अवसर रहेगा। उदाहरण के लिए प्राधिकरण किराये का निर्धारण लागत वसूली के सिद्घांत पर कर सकता है। परंतु सेवा प्रदाता होने के नाते अंतिम निर्णय रेलवे के पास रहेगा। बहरहाल, एक बात यह भी है कि सुविधा और सुरक्षा बढ़ाए बिना केवल यात्री किराया बढ़ाने से रेलवे के कामकाज में कोई बड़ा बदलाव आने वाला नहीं है। रेलवे में असली सुधार तभी आएगा जब नियामक विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा पैदा करे और उनको तथा निजी कारोबारियों को लागत और तयशुदा मुनाफे के आधार पर रेल परिचालन की इजाजत दे।

Keyword: Rail development authority, RDA, cabinet, Railways,
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