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बीएस-4 उत्सर्जन मानक पर कहां है बहस की गुंजाइश?

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  April 10, 2017

वाहन निर्माता कंपनियों में भारत स्टेज-4 (बीएस-4) उत्सर्जन मानक वाली तकनीक अपनाने को लेकर इस कदर हायतौबा क्यों है? वे क्यों कह रही हैं कि उनके साथ भारी अन्याय हुआ है और उनसे तय मियाद के पहले इन मानकों को अपनाने को कहा गया है। अपने बचाव में वे जिस सरकारी अधिसूचना का सहारा ले रही हैं उसमें कहा गया  कि वाहन निर्माता कंपनियां 31 मार्च, 2017 तक बीएस-3 वाहनों का निर्माण बंद कर देंगी। कंपनियों का कहना है कि इस अधिसूचना का यह तात्पर्य नहीं है कि 1 अप्रैल 2017 से बीएस-3 वाहनों का पंजीयन बंद कर दिया जाएगा। वाहन कंपनियों की प्रतिनिधि संस्था सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (सायम) कहती है कि बिक्री पर रोक लगाने का यह निर्णय पहले से तैयार वाहनों पर बहुत भारी साबित होगा। ऐसे में उनको ही नहीं बल्कि देश को भी नुकसान होगा। यह सही नहीं है।
मैं यह सवाल इसलिए पूछ रही हूं क्योंकि मैं इस निर्णय में शामिल रही हूं। पहले यह निर्णय पर्यावरण प्रदूषण (नियंत्रण एवं बचाव) प्राधिकरण ने एनसीआर (ईपीसीए) के लिए लिया। उसके बाद वायु प्रदूषण के मामले में यह हुआ और आखिर में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्देश दिया। मैं इस आलेख के जरिये न केवल अपनी स्थिति स्पष्टï कर रही हूं बल्कि एक बार पुन: विनम्रतापूर्वक पूछना चाहती हूं कि इतनी हायतौबा क्यों?
अब जरा देखते हैं कि मसला क्या है? पहली बात तो यह कि वाहनों की वजह से प्रदूषण होता है जो अंतत: हमारे फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है। दूसरा, ईंधन की गुणवत्ता सुधारना और वाहन तकनीक में सुधार करना उत्सर्जन स्तर में भी सुधार लाता है। तीसरी बात, ईंधन की गुणवत्ता और तकनीक में यह सुधार हमेशा से प्रतीक्षित था और इसका प्राय: विरोध भी देखने को मिला। अप्रैल 1999 में सर्वोच्च न्यायालय ने जो उस वक्त हवा की गुणवत्ता पर एक मामले की सुनवाई कर रहा था, ने निर्देश दिया कि देश में सभी वाहनों को उस वर्ष जून तक यूरो-1 (उस वक्त तक बीएस मानक नहीं थे) मानक को अपनाना होगा। यह निर्देश भी दिया था कि 1 अप्रैल, 2000 तक राष्टï्रीय राजधानी क्षेत्र में यूरो-2 को लागू करना अनिवार्य है। उस वक्त उसने यह नजीर रखी थी कि ऐसा किसी वाहन का पंजीयन नहीं किया जाएगा जो यूरो-2 मानक के अनुरूप न हो।
हमें आज सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन शीर्ष पीठ की बात को याद करना चाहिए। मई 1999 में इस मामले की सुनवाई करते हुए वाहन कंपनियों के वकील ने कहा था कि उन्हें यूरो मानकों को लागू करने के लिए और वक्त चाहिए। पीठ ने इस पर व्यंग्य करते हुए कहा था कि लोगों का सांस लेना मुहाल हुआ है और आप अपने लिए समय मांग रहे हैं। दिल्ली और एनसीआर में इसके चलते बदलाव आया। कुछ कंपनियों ने तत्काल बदलाव को अपनाया जबकि शेष ने धीरे-धीरे उनका साथ पकड़ा।
लेकिन पूरे देश के लिए इस खाके पर सहमति नहीं बनी। सरकार ने आर ए माशेलकर के अधीन वाहन ईंधन समिति का गठन किया ताकि देश के लिए स्वच्छ ऊर्जा तकनीक अपनाई जा सके। वर्ष 2003 में इस बात पर सहमति बनी कि अप्रैल 2005 तक दिल्ली, एनसीआर और 12 अन्य प्रदूषित शहरों को बीएस-3 मानकों के अधीन लाया जाएगा। इसके बाद इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई।
वर्ष 2008 की अधिसूचना में कहा गया कि दिल्ली, एनसीआर और 12 अन्य शहर 2010 तक बीएस-4 मानक अपनाएंगे। वर्ष 2015 में शेष मुल्क के लिए इसका खाका तय किया गया। अंतिम निर्णय यह हुआ कि 1 अप्रैल 2017 से पूरा देश बीएस 4 मानक अपनाएगा। यानी वाहन कंपनियों को अच्छी तरह पता था कि एक अप्रैल 2017 से देश भर में उक्त ईंधन उपलब्ध होगा। बीएस-4 मानक में बदलाव भी नया नहीं है क्योंकि संबंधित तकनीक 2010 से ही उपलब्ध रहा है तथा अन्य शहरों ने इसे अपना भी लिया है। ऐसे में विनिर्माण तिथि का मामला पूरी तरह तकनीकी है क्योंकि ईंधन और तकनीक दोनों मौजूद हैं। टैक्सियों और ट्रकों के रूप में देशव्यापी स्तर पर चलने वाले वाहनों को स्वच्छ ऊर्जा मुहैया करानी ही इकलौती बाधा थी। वरना तो यह काम अबाध ढंग से होना चाहिए था।
परंतु ऐसा नहीं हो सका। मेरा चौथा बिंदु यही है। तथ्य यह है कि ईपीसीए (जिसकी मैं भी सदस्य हूं) ने अक्टूबर 2016 में एक बैठक बुलाई और इस बदलाव की तारीख पर चर्चा की। हमारा कहना था कि चूंकि 1 अप्रैल 2017 से स्वच्छ ईंधन उपयुक्त दर पर उपलब्ध होगा तो कंपनियों को अपनी इन्वेंटरी उसी हिसाब से तैयार करनी चाहिए। इसका लक्ष्य था उनसे यह मांग करना कि वे बीएस-3 वाहनों का उत्पादन बंद करें और बीएस-4 वाहनों का निर्माण तेज करें ताकि अप्रैल तक उनके पास पर्याप्त बीएस-4 वाहन बिक्री के लिए उपलब्ध हों। लेकिन कंपनियों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पेश किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि उनमें से अधिकांश, खासतौर पर तिपहिया और चौपहिया वाहन निर्माता लगातार बीएस-3 वाहनों का निर्माण कर रहे हैं। बल्कि निर्माण की यह दर पहले के मुकाबले कहीं तेज थी। फरवरी तक ये कंपनियां बीएस-3 वाहन बनाती रहीं। उद्योग जगत के मुताबिक 1 अप्रैल के बाद 90,000 से अधिक वाणिज्यिक वाहन अनबिके रह जाएंगे। यह किसकी गलती है।
पांचवां मसला बदलाव से संबंधित है। तथ्य यह है कि बीएस-4 वाहन, खासतौर पर डीजल से चलने वाले ट्रक आदि बीएस-3 वाहनों की तुलना में बहुत कम प्रदूषण पैदा करते हैं। इन दोनों मानकों के बीच उत्सर्जन में 80 फीसदी तक का सुधार है। बाजार में जल्दी से जल्दी बेहतर वाहन लाना मायने रखता है। इसमें दो राय नहीं है कि देश में पुराने प्रदूषण पैदा करने वाले वाहन समस्या बने हुए हैं लेकिन इस दलील का इस्तेमाल नए वाहनों को अपनाने में देरी के लिए नहीं किया जाना चाहिए। वाहनों की उम्र 10 से 15 साल होती है। ऐेसे में जितनी जल्दी नए वाहन आएं उतना बेहतर। इस पर कोई बहस कैसे हो सकती है।

Keyword: Automobile, bs3, BS4, Emission,
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