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सामाजिक सुरक्षा की कैसी हो व्यवस्था?

मनीष सभरवाल और ऋतुपर्णा चक्रवर्ती /  April 10, 2017

सामाजिक सुरक्षा को लेकर मसौदा श्रम कानून एक महत्त्वाकांक्षी लेकिन आधा-अधूरा दस्तावेज है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं मनीष सभरवाल और ऋतुपर्णा चक्रवर्ती

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की वेबसाइट पर सामाजिक सुरक्षा से संबंधित मसौदा श्रम कानून प्रकाशित किया गया है। यह महत्त्वाकांक्षी किंतु अधूरा दस्तावेज प्रतीत हो रहा है। 15 श्रम कानूनों को एक साथ लाकर मजबूत बनाने की कवायद तीन वजहों से अत्यधिक खतरनाक है। पहली, इसमें इस बात को मान्यता नहीं दी गई है कि उम्रदराज लोगों की सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था गरीबों के लिए बनी व्यवस्था से ढांचागत रूप में अलग होती है। दूसरा, इसमें सार्वभौमिक मूल आय, प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण, भविष्य निधि, स्वास्थ्य बीमा, मातृत्व लाभ आदि के तत्त्वों को शामिल करने का प्रयास किया गया है जबकि इस दौरान इसके वित्त पोषण का प्रश्न अनुत्तरित है। तीसरा, इसमें समृद्घ देशों की सामाजिक सुरक्षा की समस्याओं मसलन राजकोषीय स्थायित्व, प्रशासनिक लागत, राजनीतिक डिजाइन के दुरुपयोग आदि से कोई सबक नहीं लिया गया है। हमारा मानना है कि इस मसौदा श्रम कानून को न केवल मौजूदा कानूनों को समावेशी बनाना चाहिए और विविध मंत्रालयों, बहुअंशधारक आयोग आदि को अलग करना चाहिए बल्कि उसे इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि 5 करोड़ संगठित क्षेत्र के रोजगार के लाभों को 1.25 अरब की आबादी के लिए एकीकृत सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के रूप में विकसित करना चाहिए।
गत माह मानव इतिहास में पहली बार पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की तादाद 65 वर्ष से कम उम्र के लोगों की कुल संख्या से कम हो गई। जीवन संभाव्यता बढ़ रही है। एक कोरियाई महिला 90 वर्ष तक जीवित रह सकती है। कैलिफोर्निया के स्कूली शिक्षकों के एक पेंशन फंड में 300 से अधिक सदस्य ऐसे हैं जिनकी उम्र 100 वर्ष से अधिक है। जापान में उम्रदराज लोगों के लिए बने डायपर की बिक्री बच्चों के डायपर का आंकड़ा पार कर चुकी है। अमीर देशों में सामाजिक सुरक्षा के वादे टूटेंगे क्योंकि उनको उम्रदराज जनता को ध्यान में रखकर नहीं तैयार किया गया था। एंजेला मर्केल ने हाल ही में चेतावनी दी थी कि दुनिया की कुल आबादी का 7 फीसदी हिस्सा यूरोप में रहता है और वह वैश्विक जीडीपी का 25 फीसदी उत्पन्न करता है। ऐसे में दुनिया के कुल सामाजिक खर्च का 50 फीसदी यूरोप को नहीं मिलता रह सकता।
ब्रिटेन में एक औसत पेंशनर परिवार की आय औसत काम करने वाले परिवार की तुलना में अधिक है। अमेरिकी केंद्रीय बजट का अनावंटित हिस्सा सन 1960 के 66 फीसदी से घटकर आज 20 फीसदी रह गया है। लेकिन युवा मतदान नहीं करते जबकि उम्रदराज लोग संगठित, सक्रिय और मुखर हैं। उम्रदराज होते समाजों के लिए राजनीतिक रूप से खुद को मजबूत कर पाना मुश्किल होता है। आर्थिक रूप से स्थिर फ्रांस में राष्टï्रपति पद के उम्मीदवार एमानुएल मैक्रॉन के चुनावी घोषणापत्र में नकली दांत, चश्मों और श्रवण यंत्रों के लिए 100 फीसदी धन वापसी की घोषणा की गई है। इन समाजों में सामाजिक सुरक्षा की जवाबदेही लगातार बढ़ती जा रही है।
नए मसौदा श्रम कानून में कहा गया है कि इसका उद्देश्य है अलग-अलग बंटे हुए कानूनों को साामान्य बनाने, उनको तार्किक करने और उनको समावेशी बनाने का, ताकि उनका क्रियान्वयन और प्रवर्तन सहज हो सके। लेकिन यह मसौदा खुद जटिल और विरोधाभासी है। मसलन सार्वभौमीकरण, कारोबारी सुगमता, क्रॉस सब्सिडी, अनिवार्य अधिकार, स्वैच्छिक योगदान के लिए एक खाता, अनिवार्य सहयोग, अनिवार्य सब्सिडी योजना और गरीबों के लिए सामाजिक सहायता कार्यक्रम, व्यवहार्यता, कामगारों का पंजीकरण आदि को लेकर तमाम विरोधाभासी तत्त्व इसमें मौजूद हैं।
यह दस्तावेज अंतरराष्टï्रीय श्रम संगठन से बहुत अधिक प्रभावित है। हकीकत यह है कि आईएलओ खुद एक दशक से भी पहले अपनी प्रासंगिकता गंवा चुका है क्योंकि इसका उद्यमिता, राजकोषीय अनुशासन और कामकाज के नए दौर से कोई संपर्क ही नहीं है। श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के आंकड़ों को देखें तो वहां भी हालात ठीक नहीं है। उसने कर्मचारी भविष्य निधि योजना के कुछ हिस्से को कर्मचारी पेंशन योजना के साथ बदला है जिससे 50,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त जवाबदेही पैदा हुई। हमारा अनुमान बताता है कि प्रस्तावित श्रम कानून हमारी तमाम कर प्राप्तियों को अपने आप में समाहित कर सकता है। अगर श्रम एवं रोजगार मंत्रालय अपनी इच्छाशक्ति प्रदर्शित ही करना चाहता था तो उसे अनिवार्य पेरोल, पीएफ, ईएसआई, ईडीएलआई, ईपीएस, एलडब्ल्यूएफ आदि के रूप में 45 फीसदी की अतिरिक्त जब्ती को कम करना चाहिए था। इसकी वजह से कागज पर उल्लिखित और हाथ में आने वाले वास्तविक वेतन में बड़ा अंतर मौजूद है। इसके चलते कम आय वाले संगठित क्षेत्र के रोजगार बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।
अगर वह ऐसा नहीं कर पा रहा था तो उसे कम से कम गैर प्रतिस्पर्धी हो चले एकाधिकार को खत्म करना था। ईपीएफओ और ईएसआई दुनिया की सबसे महंगी सरकारी म्युचुअल फंड और स्वास्थ्य बीमा योजनाएं हैं। भारत अगर किसी सामाजिक सुरक्षा योजना को अपनाने की स्थिति में है तो वह है उच्च वेतन भत्ते। सच यह है कि उच्च वेतन नियामकीय फतवों से तय नहीं होता है बल्कि उसका निर्धारण शहरीकरण, औपचारिकीकरण, औद्योगीकरण और मानव संसाधन के बूते पर होता है।
किसी भी सरकार के लिए सामाजिक सुरक्षा संभवत: सबसे अधिक जटिल, राजनीतिक और अनुशासनात्मक मसला है। किसी एक मंत्रालय के पास इसका हल निकालने की कुव्वत नहीं है। हाल ही में प्रकाशित स्लोमन और फर्नबैक की बेहतरीन किताब 'द नॉलेज इल्यूजन: व्हाई वी नेवर थिंक अलोन' में यह दलील दी गई है कि ज्ञान श्रम के संज्ञानात्मक भेद की उपज है, इसके बावजूद हम खुद को व्यक्तिगत स्तर पर देखते हुए अपनी बौद्घिक खुराक बढ़ाते हैं और अपने-अपने मानसिक कारागारों में रहते हैं। यह एक खतरनाक नीतिगत चूक है। जिन लोगों को लगता है कि वे सामाजिक सुरक्षा जैसे मसलों के बारे में काफी ज्यादा जानकारी रखते हैं उनकी राय अधिक तगड़ी इसलिए होती है क्योंकि हम अपने ज्ञान की कमी तो मूल्यगत प्रतिबद्घता से पूरा करते हैं।
बहरहाल हमें इस मसौदा श्रम कानून पर दोबारा विचार करने की आवश्यकता है क्योंकि यह अमीर और गरीब नागरिकों, सूचित असंगठित और संगठित उद्यमों, अनिवार्य और स्वैच्छिक भागीदारी, नियोक्ता बनाम निजी फंडिंग और रियायती बनाम गैर रियायती के बीच उचित संतुलन कायम करने वाला नहीं है। बहरहाल श्रम कानून सुधारों और सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था कायम करने का काम इतना जटिल है कि उसे अकेले श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है।

Keyword: Social security, labour law, Subsidy,
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