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मयखाने में वीराने

वीनू संधू, निकिता पुरी, रंजीता गणेशन और अभिषेक रक्षित /  04 10, 2017

राजमार्ग के किनारे शराब बेचने व परोसने पर उच्चतम न्यायालय की पाबंदी के बाद देश भर में पब और होटल संचालकों की चिंताएं बढ़ीं

गुरुग्राम के साइबर हब में स्थित सोशल बार में लटक रही 'ड्राई डे' की तख्ती, बारटेंडर के पास आइस टी और लेमोनेड बनाने का ही है काम

दिल्ली से सटे गुरुग्राम के एक फाइव स्टार होटल में ठहरे मेहमान गत 31 मार्च को उस समय अचानक सकते में आ गए जब होटल के कर्मचारियों ने अचानक उनके दरवाजे पर दस्तक देनी शुरू कर दी। जैसे ही मेहमानों ने दरवाजे खोले होटल के कर्मचारियों ने कमरे के भीतर बने छोटे से बार में रखी शराब की सारी बोतलों को आननफानन में खाली करना शुरू कर दिया। इसकी वजह समझ पाने में नाकाम मेहमानों को कर्मचारियों ने एक फैसले का हवाला देते हुए अपनी मजबूरी बताई।

दरअसल उसी दिन उच्चतम न्यायालय ने यह आदेश दिया था कि राजमार्गों के 500 मीटर के दायरे में बने सभी होटलों और रेस्टोरेंट में शराब की बिक्री नहीं हो सकेगी। केवल शराब बिक्री की अधिकृत दुकानों को ही इस पाबंदी से छूट दी गई है। यह आदेश 31 मार्च की मध्यरात्रि से ही लागू होना था लिहाजा राजमार्ग के पास बने उस होटल में भी शराब की बिक्री रोकनी पड़ी। इस फैसले पर अमल के लिए होटल प्रबंधन को केवल छह घंटे का ही वक्त मिल पाया था।

इस फैसले ने शराब के कारोबार से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों को काफी गहराई तक प्रभावित किया है। शराब निर्माताओं, वितरकों और बिक्री वाली दुकानों के अलावा रेस्टोरेंट, पब, बार एवं होटल भी इस फैसले की चपेट में आए हैं। इन व्यवसायों से जुड़े लोगों का कहना है कि इस पाबंदी से करीब 10 लाख लोगों की आजीविका खतरे में पड़ सकती है। इसी तरह शराब परोसने वाले पबों को वित्त वर्ष 2017-18 में 10,000 करोड़ रुपये से लेकर 15,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है। शराब बिक्री का लाइसेंस देने वाली राज्य सरकारों को भी राजस्व का भारी नुकसान होने का अंदेशा है।

इस स्थिति में इस पाबंदी से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए तरीके तलाशे जाने लगे हैं। हालांकि फैसला आने के एक सप्ताह के भीतर ही राजमार्गों के आसपास बने अधिकतर बारों और पबों ने शराब की बिक्री रोक दी है। कुछ रेस्टोरेंट मालिकों ने तो इस फैसले से बचने के लिए दूसरी जगह तलाशनी शुरू कर दी है जबकि कुछ जुगाड़ू किस्म के लोग पाबंदी से बचने के लिए नए-नए तरीके आजमा रहे हैं।

दिल्ली के आसपास वाले इलाकों में गुरुग्राम का डीएलएफ साइबरहब अपने खानपान और शराब के लिए खासा मशहूर है। इस हब में करीब 50 रेस्टोरेंट, बार और पब मौजूद हैं जिनमें से 34 में शराब परोसी जाती रही है। लेकिन उच्चतम न्यायालय के फैसले ने इस साइबरहब को भी नए-नए तरीके आजमाने के लिए मजबूर कर दिया है।

दिल्ली से जयपुर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या आठ पर स्थित इस साइबरहब का एक हफ्ते पहले तक जहां प्रवेश द्वार हुआ करता था, अब वहां पर नो एंट्री का बोर्ड और बैरीकेड लगा है। इसी तरह साइबरहब से निकलने के द्वार को भी कंक्रीट दीवार से बंद कर दिया गया है। ऐसे में साइबरहब में जाने के लिए लोगों को आगे से यू-टर्न लेकर नए प्रवेश द्वार तक पहुंचना पड़ रहा है। इस अनूठी तरकीब से राजमार्ग और साइबर में बने रेस्टोरेंट के बीच की दूरी बढ़कर करीब एक किलोमीटर हो गई है। यह दूरी 500 मीटर की उच्चतम न्यायालय की तय सीमा से अधिक है लिहाजा साइबरहब में मौजूद वाइन कंपनी पब शराब परोसने लगा है। लोगों को लुभाने के लिए यह पब मुफ्त मॉकटेल की पेशकश भी कर रहा है।

कारोबारी सुगमता की बात भूल ही जाइए, हम तो कारोबार की गॉरंटी को ही लेकर खासे चिंतित हैं

रियाज अमलानी
अध्यक्ष, एनआरएआई

हालांकि अपनी अलहदा कॉकटेल्स के लिए चर्चित फर्जी कैफे का बार खाली ही पड़ा हुआ है। कैफे का एक कर्मचारी कहता है कि मौजूदा हालत में असली बियर तो परोस नहीं सकते हैं लिहाजा फ्रूट बियर ही मिल सकती है। स्थिति को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच इस कैफे ने फिलहाल अपने खाने पर ही खास ध्यान देना शुरू कर दिया है। यह अलग बात है कि केवल खाना परोसने से ही उस नुकसान की भरपाई नहीं हो पा रही है।  फर्जी कैफे का मालिकाना हक रखने वाली कंपनी मैसिव रेस्टोरेंस्ट्स के संस्थापक जोरावर कालरा कहते हैं कि इस पाबंदी से उनके चार रेस्टोरेंट प्रभावित हुए हैं जिनमें से एक मुंबई और एक चंडीगढ़ में स्थित है। वह कहते हैं, 'भारतीय अतिथि सत्कार कारोबार के इतिहास में यह सबसे तगड़ा झटका है।'

कालरा के फर्जी कैफे से थोड़ी दूरी पर ही द बियर कैफे मौजूद है। उसकी हालत और भी खराब है क्योंकि उसके पास नुकसान की भरपाई के लिए खाने का भी सहारा नहीं है। पहले इस कैफे के बाहर '24 घंटे खुला है' का बोर्ड टंगा रहता था लेकिन अब वहां पर 'बार बंद है' का बोर्ड लटका हुआ है। अपने बेहतर दिनों में यह कैफे 19 देशों की शराब परोसता था लेकिन अब यहां पर सूखा पड़ गया है। बियर कैफे के प्रबंधक तरुण तोमर व्यंग्यपूर्ण लहजे में कहते हैं, '1 अप्रैल को हमारी पांचवीं सालगिरह थी और उस दिन हमें यह शानदार उपहार मिला है।' बहरहाल अब उन्हें अपने परिवार की चिंता सताने लगी है जिसमें उनकी दो बेटियां भी शामिल हैं।

कर्मचारियों के मनोबल पर भी इस पाबंदी ने गहरी चोट पहुंचाई है। सोशल बार ऐंड कैफे की सहायक प्रबंधक सोनल डागर कहती हैं, 'बदले हुए माहौल में हम रोजाना सुबह और शाम अपने कर्मचारियों के साथ बैठक कर रहे हैं। इसमें हम उन्हें यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि सब कुछ अच्छा होगा।' वह बताती हैं कि कैफे के बार में काम करने वाले लड़के खुद को निकम्मा महसूस कर रहे हैं क्योंकि उनके पास नींबू पानी और आइस-टी बनाने के अलावा कोई काम ही नहीं रह गया है। इस कैफे का संचालन रियाज अमलानी करते हैं जो भारतीय राष्ट्रीय रेस्टोरेंट संघ (एनआरएआई) के अध्यक्ष भी हैं।

गुरुग्राम में ट्राइडेंट ऐंड द ओबेरॉय होटल के बाहर खड़ा सुरक्षाकर्मी नए प्रवेशद्वार की जानकारी देने वाली तख्ती थामे हुए साइबरहब के उस पार स्थित ट्राइडेंट ऐंड ओबेरॉय होटल ने भी अपने पुराने प्रवेश द्वार को बंद कर दिया है और वहां पर वर्दीधारी गॉर्ड बिठा दिए हैं जो हरेक मेहमान को थोड़ी दूर बने नए प्रवेश द्वार के बारे में बताते हैं। हालांकि नया प्रवेश द्वार थोड़े संकरे रास्ते पर बना है लेकिन राजमार्ग से उसकी दूरी ज्यादा है। एक कर्मचारी ने बताया कि पहले यह रास्ता केवल होटल कर्मचारियों के आने-जाने के लिए ही इस्तेमाल होता था। दिल्ली-जयपुर राजमार्ग पर ही लीला एम्बीयंस होटल भी मौजूद है। इस होटल का प्रवेश द्वार भी अब बंद कर दिया गया है जिसकी वजह से होटल आने वाले मेहमानों को पास ही बने आवासीय परिसर एम्बीयंस लगून से होते हुए आना पड़ रहा है। इससे इस आवासीय परिसर में रहने वाले लोग भी नाखुश दिख रहे हैं।

होटल और रेस्टोरेंट को लग रहा है कि प्रवेश द्वार बदल देने से ही वे उच्चतम न्यायालय के फैसले की जद में आने से बच जाएंगे। लेकिन आबकारी विभाग के अधिकारी उन्हें इस तरह का भरोसा देने को तैयार नहीं हैं। गुरुग्राम के आबकारी उपायुक्त एस सी दहिया कहते हैं कि किसी होटल या रेस्टोरेंट के उसी प्रवेश द्वार को मान्यता दी जाएगी जो मास्टर प्लान में दर्ज है। अगर मास्टर प्लान में नए प्रवेश द्वार का कोई जिक्र नहीं है तो उसे राहत मिलने की उम्मीद न के बराबर है। बहरहाल राजमार्ग के आसपास बने होटलों और रेस्टोरेंट में शराब परोसने की मंजूरी रखने वाले 25 रेस्टोरेंट ने अपने लाइसेंस लौटा दिए हैं। कुछ कारोबारियों ने अपना कामकाज ही बंद कर दिया है जबकि कुछ लोगों ने दूसरी जगह जाने का मन बना लिया है।

अप्रैल का महीना देश भर में पबों और बार के लिए व्यस्त समय माना जा रहा था। होटल कारोबार से जुड़े लोगों का मानना था कि अप्रैल में पारा चढ़ते ही लोग ठंडी बियर और बर्फीले कॉकटेल की तलब पूरी करने के लिए उनकी तरफ रुख करेंगे और रेस्टोरेंट एवं पब में लगी विशालकाय टीवी स्क्रीन पर इंडियन प्रीमियर लीग के मुकाबले देखते हुए अपनी शाम बिताएंगे। लेकिन उच्चतम न्यायालय के फैसले के चलते इस साल राजमार्गों के आसपास बने बार और पब पैसा कमाने का यह सुनहरा मौका भुनाने से वंचित रह गए हैं।

वैसे कुछ राज्यों ने रेस्टोरेंट कारोबारियों की मुश्किलें दूर करने के लिए अपनी तरफ से मदद का हाथ बढ़ाया है। पश्चिम बंगाल सरकार ने अपने अधिकार क्षेत्र वाले करीब 277 किलोमीटर लंबे राज्य राजमार्गों को पुनर्वर्गीकृत करते हुए संपर्क मार्ग के रूप में तब्दील कर दिया है। इससे यह सड़कें नगर निगमों और नगर पालिकाओं के दायरे में आ गई हैं और उच्चतम न्यायालय के फैसले के दायरे से बाहर भी हो गई हैं। राज्य सरकार का यह आदेश 16 मार्च की तारीख को ही जारी किया गया है।

राज्य सरकार ने 21 किलोमीटर लंबे पूर्वी बाइपास के कुछ हिस्सों को भी राज्य राजमार्गों की सूची से बाहर कर दिया है। इस कदम से हयात रीजेंसी, आईटीसी सोनार बांग्ला, जेडब्ल्यू मैरियट और गेटवे जैसे कुछ लोकप्रिय होटलों को भी फैसले की जद में आने से बचा लिया है।

पश्चिम बंगाल सरकार को शराब की बिक्री से करीब 3,200 करोड़ रुपये का आबकारी राजस्व मिलता है। ऐसी स्थिति में शराब बेचने और परोसे जाने पर लगी पाबंदी को लेकर उसकी बेचैनी को समझना अधिक मुश्किल नहीं है। पश्चिम बंगाल विदेशी शराब उत्पादक एवं विक्रेता संघ के मुताबिक राज्य सरकार के इस फैसले से करीब 40 फीसदी बार एवं रेस्टोरेंट को बचाया जा सकेगा। इस कदम से करीब 2000 लोगों की नौकरी पर छाया संकट भी दूर होगा।

पश्चिम बंगाल सरकार की ही तरह पंजाब सरकार ने भी राजमार्गों के पुनर्वर्गीकरण का सहारा लिया है। पंजाब सरकार ने राज्य राजमार्ग रही 30 किलोमीटर लंबी सड़क को शहरी मार्ग के रूप में तब्दील कर दिया है। इसी तरह राजस्थान लोक निर्माण विभाग ने भी राज्य के 16 जिलों से होकर गुजरने वाले 21 राज्य राजमार्गों के 25 खंडों को शहरी मार्ग घोषित कर दिया है।

इन राज्यों से सबक लेते हुए महाराष्ट्र सरकार भी अपने राजमार्ग के कुछ हिस्सों का नए सिरे से वर्गीकरण करने के बारे में सोच रही है। बड़े शहरों और कस्बों से होकर गुजरने वाले राजमार्गों को इसके दायरे में लाया जा सकता है। भारतीय होटल एवं रेस्टोरेंट संघ के अध्यक्ष आदर्श शेट्टी बताते हैं कि उनका संगठन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मिलकर राजमार्गों के पुनर्वर्गीकरण का अनुरोध करने वाला है।

अकेले मुंबई के नजदीकी इलाकों में ही 450 से अधिक बार और पब इस फैसले से प्रभावित हुए हैं। इनमें वेस्टर्न एक्सप्रेस राजमार्ग और ईस्टर्न एक्सप्रेस राजमार्ग पर स्थित बार भी शामिल हैं। अगर पूरे महाराष्ट्र की बात करें तो शराब बेचने एवं परोसने के कारोबार से जुड़े करीब 16,000 इकाइयां इससे प्रभावित हुई हैं। खास बात यह है कि इनमें से करीब 60 फीसदी शराब बिक्री केंद्रों को चलाने के लिए उनके मालिकों ने बैंकों से लाखों रुपये का कर्ज ले रखा है।

शेट्टी कहते हैं, 'इस फैसले की जद में आने से बचने के लिए इन पबों और बार को राजमार्ग से दूर ले जाना होगा। इसके लिए उन्हें न केवल अपनी मौजूदा जगह को बेचना होगा बल्कि नई जगह भी तलाशनी होगी और तमाम लाइसेंस में भी बदलाव करवाने होंगे। लेकिन ऐसा कर पाना व्यावहारिक रूप से मुमकिन नहीं है।'

ठाणे का विवियन मॉल ईस्टर्न एक्सप्रेस राजमार्ग से सटा हुआ ही है। इस समय इस मॉल की कॉफी बेचने वाली दुकानों पर कहीं अधिक भीड़ दिख रही है लेकिन रेस्टोरेंट एवं बार काफी हद तक खाली पड़े हुए हैं। मॉल के एक पब के प्रबंधक धरम सिंह बताते हैं कि उनका धंधा काफी हद तक बियर की बिक्री पर ही निर्भर रहा है लेकिन इस फैसले के बाद पूरा कारोबार चौपट हो गया है। जब बियर ही नहीं मिल रही है तो इस पब में हरदम बजता रहने वाला संगीत और ग्राहकों की आमद भी गुम हो गई है। ऐसे में कोई काम न देख पब के कर्मचारी पहले से ही साफ दिख रही मेज को फिर से चमकाने लग रहे हैं।

इस फैसले की वजह बताए जा रहे चंडीगढ़ को तो समझ ही नहीं आ रहा है कि क्या रास्ता अपनाया जाए? करीब 20 साल पहले चंडीगढ़ प्रशासन ने केंद्र सरकार से अधिक फंड हासिल करने के इरादे से अपनी सभी बड़ी सड़कों को राज्य राजमार्ग घोषित कर दिया था। लेकिन उच्चतम न्यायालय के फैसले से उपजे हालात में नई राह तलाशने के लिए चंडीगढ़ प्रशासन ने एक समिति का गठन किया है। उस समिति ने 20 साल पुराने फैसले को पलटने की सलाह दी है ताकि इन राज्य राजमार्गों को फिर से जिला मार्ग घोषित किया जा सके।

हालांकि राजमार्गों के किनारे बने होटलों और रेस्टोरेंट में शराब बेचे जाने पर रोक लगाने की मांग करने वाली याचिका दायर करने वाले हरमन सिद्धू ने चंडीगढ़ प्रशासन के इस कदम को पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में चुनौती दी। लेकिन उन्हें वहां से राहत नहीं मिली जिसके बाद उन्होंने एक बार फिर उच्चतम न्यायालय का रुख किया है। सर्वोच्च अदालत चंडीगढ़ प्रशासन के इस फैसले के खिलाफ 17 अप्रैल को सुनवाई करेगा।

कर्नाटक में उच्चतम न्यायालय की पाबंदी का फैसला ऐसे समय आया है जब राज्य सरकार ने हाल ही में शराब और बियर पर लगने वाले मूल्य वर्धित कर (वैट) को खत्म करने का बजट में ऐलान किया है। शराब के खुदरा विक्रेताओं को उम्मीद है कि वैट से छूट मिलने पर कर्नाटक में शराब बिक्री में जबर्दस्त उछाल आएगा। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने राजमार्गों के किनारे शराब की

बिक्री पर रोक लगाकर उनके इस उत्साह को थोड़ा फीका जरूर कर दिया है। यह जरूर है कि कर्नाटक का आबकारी सत्र जून में पूरा होने से उसे फिलहाल उच्चतम न्यायालय के इस फैसले की मार नहीं सहनी पड़ रही है। दरअसल उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में इस पाबंदी को सभी राज्यों के आगामी आबकारी सत्र से ही लागू करने की छूट दी हुई है। कर्नाटक के अलावा आंध्र प्रदेश का भी आबकारी सत्र जून में खत्म होता है जबकि तेलंगाना का आबकारी सत्र तो सितंबर में पूरा होता है। इस प्रावधान की वजह से इन राज्यों में राजमार्गों के किनारे शराब की बिक्री अभी प्रतिबंधित नहीं हुई है।

इसी छूट के चलते कर्नाटक के होसूर रोड पर बने शराब एवं बियर बार और बेनरघट्टा रोड पर मौजूद शराब की दुकानों पर कारोबार पूरे जोरशोर से जारी है। इसके बावजूद देश की सबसे बड़ी शराब निर्माता कंपनी यूनाइटेड ब्रुअरीज को आगे चलकर बिक्री में 40 फीसदी की गिरावट आने की आशंका सता रही है। इस बीच कर्नाटक के शराब प्रतिष्ठानों ने अभी से इस नियम को लागू करने को लेकर तैयारी जरूर शुरू कर दी है। बेंगलूरु से मैसूर जाने वाले राजमार्ग के पास स्थित ईगल्टन गोल्फ रिसॉर्ट के प्रबंधक जी पी मैथ्यूज तो इस बात से काफी राहत महसूस कर रहे हैं कि उनका रिसॉर्ट राजमार्ग से 2 किलोमीटर दूर है।

वहीं गोवा में राष्ट्रीय राजमार्ग 17 पर स्थित मराकस बार के मालिक राल्फ पिंटो इस पाबंदी से 5 वर्षों के लिए राहत देने की अपील कर रहे हैं। वह कहते हैं, 'भले ही आप राजमार्गों के किनारे किसी रेस्टोरेंट या बार को नया लाइसेंस न दें लेकिन पहले से चल रहे बार और पब को तो पांच साल की मोहलत दीजिए ताकि वे किसी दूसरी मुफीद जगह की तलाश कर सकें।' उन्हें यह आशंका सता रही है कि अगर कोई राहत नहीं मिली तो उन्हें बिक्री में गिरावट आने और रोजमर्रा के खर्चों के चलते कारोबार समेटना भी पड़ सकता है।

वैसे पिन्टो की यह उम्मीद पूरी होने की संभावना कम ही दिख रही है। बिहार के अनुभव से यह समझना अधिक मुश्किल नहीं है कि शराबबंदी को महिलाओं का जबरदस्त समर्थन हासिल है। ऐसे में केंद्र की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार शायद ही उच्चतम न्यायालय के इस फैसले को चुनौती देने का मन बनाएगी। इसके अलावा गोवा सरकार अन्य राज्यों की तरह शायद ही राज्य राजमार्गों को पुनर्वर्गीकृत करेगी क्योंकि उसे अपने राज्य में सड़कों का जाल फैलाने के लिए अधिक केंद्रीय मदद की दरकार है।

ऐसे में शराब की बिक्री से जुड़े तमाम पक्षों पर यह फैसला भारी पडऩे की आशंका सही साबित होती दिख रही है। भारतीय राष्ट्रीय रेस्टोरेंट संघ के प्रमुख रियाज अमलानी के शब्दों में इस आशंका को महसूस भी किया जा सकता है। अमलानी कहते हैं, 'कारोबारी सुगमता की बात भूल ही जाइए, हम तो कारोबार करने की गारंटी को ही लेकर खासे चिंतित हैं।'

Keyword: Supreme court, wine, Pub, drink,
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