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गाय की उपासना और उपेक्षा का क्या है सामाजिक समीकरण?

मुद्रा मंत्र
सुबीर रॉय /  April 09, 2017

दिल्ली के वसंत कुंज इलाके के आसपास तेजी से विकसित होते उच्च मध्य वर्ग के चलते तमाम ऐसी सड़कें और पटरी विकसित हो चुके हैं जिनको नगर निगम कर्मी भी बड़ी उदासीनता से ही साफ करते हैं। मैं जिस जगह से गुजरता हूं वहां करीब ही कई बड़े कचरा इकठ्ठïा करने वाले कंटेनर रखे हैं जो कचरे से भरे हुए हैं। उन्हें रोज वहां से हटाकर उनकी जगह खाली कंटेनर रख दिए जाने चाहिए लेकिन ऐसा नहीं होता है।
शाम ढले भी वहां यही नजारा देखने को मिलता है। कई गायें उस कचरे के आसपास अपने लिए खाना तलाशती नजर आती हैं। हालांकि वहां फैली बदबू बताती है कि कचरे में सडऩ शुरू हो चुकी है। गायों को इस तरह गंदगी में अपना भोजन तलाशते और खुद को नुकसान पहुंचाते देखना दुखद है। यहां तक कि वे प्लास्टिक तक खा जाती हैं। भला कौन पशु प्रेमी होगा जो गायों को इस तरह खुद को नुकसान पहुंचाते देखना चाहेगा।
मानो इतना ही काफी नहीं था कि अगले दिन शाम को उन गायों में से एक मुझे वहीं पास की एक भीड़ वाली सड़क पर लगभग भ्रमित अवस्था में खड़ी नजर आई। वह हिलडुल तक नहीं रही थी। भीड़ के कारण वह तय नहीं कर पा रही थी कि उसे किधर जाना है। उसके चारों ओर कारें ही कारें इक_ïी थीं और सभी जोर-जोर से हॉर्न बजा रहे थे। गाय के लिए सड़क के दूसरी ओर जाना भी संभव नहीं था क्योंकि डिवाइडर खासा ऊंचा था।
दिल्ली में ऐसे दृश्य आम हैं। मुझे तो कोलकाता के ईस्टर्न बाईपास के एक छोर पर स्थित मेट्रोपोलिस मॉल के पास भी ऐसा ही दृश्य देखने को मिल चुका है। वहां सामने ही एक महंगी रिहाइशी इमारत थी। वहां भी गाय ठीक वैसे ही भ्रमित थी और कारों के हॉर्न ने उसका जीना मुहाल कर रखा था। मुझे यह बहुत ज्यादा बुरा लगा क्योंकि मैं  एक पशुप्रेमी हूं। कुत्ता, बिल्ली और गाय जैसे पालतू पशुओं को लेकर मेरे मन में अनूठा स्नेह है।
शायद यह मुझे मेरी स्वर्गीय मां से विरासत में मिला है। जब मैं बच्चा था तो मेरी मां मुझे तमाम कहानियां सुनाया करती थीं। वह मुझे अपनी गायों और गोशाला की बातें बतातीं। मां कहतीं कि वे गायें भी उतनी ही स्नेहिल थीं जितनी कि उनकी देखभाल करने वाली महिलाएं। मां एक रोचक घटना को याद करतीं कि कैसे गोशाला में गायों का भोजन ले जाने वाली महिला को देखते ही सारी गायें
गरदन उठाकर उसकी ओर देखने लगतीं मानों वे उसे इशारा कर रही हों कि पहले उन्हें भोजन चाहिए।
मेरी मां को गायों से कुछ खास लगाव था। गाय एक ऐसी सीधी-साधी घरेलू जीव थी जिसकी देखभाल करना उसके मालिक का कर्तव्य थाा। उसे पवित्र भी माना जाता है। मां उन लोगों  के बारे में अच्छी राय नहीं रखती थी जो अपने पालतू पशुओं की देखभाल ठीक से नहीं करते। मां ने मुझे बहुत बचपन में ही शरतचंद्र चट्टïोपाध्याय की मशहूर लघुकथा महेश सुना दी थी। इस कहानी में महेश ने गुस्से में आकर अपने समान ही गरीब किसान गफूर के प्रिय पालतू पशु की हत्या कर दी थी।
एक पशुप्रेमी के रूप में मैं यह नहीं समझ पाता हूं कि गाय की पूजा करने वाले और उसे सार्वजनिक और जन नीति की बहस के बीच ले आने वाले लोग उसे सड़कों पर कैसे घूमने देते हैं। सड़कों पर घूमती गायों को हमेशा इस बात का खतरा रहता है कि कहीं कोई कार उनको टक्कर मार कर न चली जाए। ऐसा नहीं है कि इन गायों का कोई मालिक नहीं होता। ये गायें किसी न किसी ग्वाले की
होती हैं लेकिन उनको लगता है कि गायों को खुला छोड़कर कचरा बीन कर खाने देने से उनकी बचत होती है। उनको गायों के लिए चारा जो नहीं खरीदना पड़ता।
इस मामले में भारत तथा विकसित देशों के बीच जबरदस्त अंतर है। वे अपने पालतू पशुओं की पूजा नहीं करते लेकिन उनको यूं सड़क पर छुट्टïा घूमने के लिए भी नहीं छोड़ देते। वे अपने पशुओं को बाकायदा बांध कर रखते हैं, उन्हें दोनों वक्त चारा देते हैं और उनकी देखरेख करते हैं।
अगर मैं गो पूजक होता तो मैं अपनी गायों को यूं सड़कों पर आवारा छोड़ देने वालों को गंभीर अपराध का दोषी मानता और उन गायों के लिए सरकारी खर्च पर गोशालाएं बनवाता जो बूढ़ी हो चुकी हों, और दूध नहीं देती हों, जिन्हें उनके मालिकों ने अपने दम पर जिंदगी बिताने के लिए खुला छोड़ दिया हो। देश के सार्वजनिक व्यय के बारे में न्यूनतम जानकारी रखने वाला व्यक्ति भी यह जानता होगा कि ऐसा करने में पैसा कोई समस्या नहीं है। बल्कि इसके लिए पर्याप्त सामाजिक इच्छाशक्ति रखने वाले स्वयंसेवक तलाश करना मुश्किल है। ऐसी गोशालाएं सरकार के भरोसे नहीं चल सकतीं। सरकारी नौकरों के लिए यह एक और रोजगार भर होगा।
गायों की उपासना और साथ ही इस सामाजिक उपेक्षा के इस विरोधाभास की कई वजह हो सकती हैं। गायों को मारना पाप है जबकि उनकी उपेक्षा करने पर कोई धार्मिक बंदिश नहीं है। यह हमारे मूल्यों का भी दोष है जहां व्यक्तिगत स्वच्छता मायने रखती है जबकि सामाजिक स्वच्छता से कोई मतलब नहीं है।
एक अन्य व्याख्या को इस बात से समझा जा सकता है कि गुजरात में गो पूजा का कानूनी स्वरूप है और गाय को मारने पर आजीवन कारावास हो सकता है। वहीं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री कह चुके हैं कि गायों को मारने वाले को मृत्यु दंड दे दिया जाना चाहिए। यह एक प्रकार का सामाजिक भय पैदा करना है। जबकि उसकी सामाजिक उपेक्षा सार्वजनिक रुख तो है ही यह बात एक राजनीतिक एजेंडे को भी जन्म देती है। गायों को मारने को लेकर जनमत तैयार करना वोट हासिल करने का जरिया है। गाय कचरा खा रही है या प्लास्टिक इससे किसी को क्या लेनादेना? इसके लिए कोई कानून आपको दंडित नहीं करेगा।

Keyword: cow, slaughter, Politics,
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