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उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजों की अलहदा व्याख्या

अशोक लाहिड़ी /  April 09, 2017

चुनाव नतीजों को केवल ध्रुवीकरण कहकर खारिज कर देना अतिसामान्यीकरण होगा। इसके मायने इससे कहीं अधिक हैं। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अशोक लाहिड़ी
पंजाब और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में निर्णायक नतीजे निकलना स्वागतयोग्य कदम है। इसके बाद खराब प्रदर्शन के लिए गठबंधन की अनिवार्यता को बतौर बहाना इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा।
वर्ष 1993 से 2007 के बीच उत्तर प्रदेश में खंडित जनादेश आता रहा। वर्ष 2007 में प्रदेश पूर्ण बहुमत वाली सरकार की ओर वापस आया और 2012 में इसे दोहराया गया। लेकिन इन दोनों अवसरों पर किसी एक पार्टी को ऐसी प्रचंड जीत नहीं मिली थी जैसी 2017 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मिली। पार्टी को इस चुनाव में तीन चौथाई सीटों पर जीत मिली। इसे केवल ध्रुवीकरण कहना अतिसामान्यीकरण होगा। मामला इससे कहीं अलग है।
इन चुनावों में क्रमश: पहले और दूसरे स्थान पर आने वाले दलों भाजपा और समाजवादी पार्टी ने विकास के एजेंडे पर जोर दिया। इसमें 24 घंटे बिजली, स्वच्छ पेयजल और शौचालय, शहरों और जिलों को जोडऩे वाले चार लेन राजमार्ग आदि शामिल थे। हारने वाले दो प्रमुख दलों राष्टï्रीय लोकदल (रालोद) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के घोषणापत्र चुनाव से महज कुछ समय पहले जारी किए गए और वे उतने प्रभावी भी नहीं थे। रालोद और बसपा की दुर्दशा के विपरीत भाजपा की जबरदस्त जीत बताती है कि पहचान आधारित राजनीति का पतन हो रहा है।
पहले बात करते हैं राजद की। राजद नेता अजित सिंह केंद्र में वी पी सिंह, पी वी नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह जैसे अलग-अलग दलों के नेताओं के अधीन मंत्री रहे। उनकी निष्ठïा बदलती रही लेकिन चौधरी चरण सिंह के प्रति जाटों की निष्ठïा ने पश्चिम उत्तर प्रदेश में उनको प्रासंगिक बनाए रखा। हालांकि उनका मत प्रतिशत लगातार गिरा और 2007 के 3.7 फीसदी से गिरकर 2017 में यह 1.8 फीसदी हो गया। पार्टी ने 403 में से 357 सीटों पर किस्मत आजमाई लेकिन उसे केवल एक सीट पर जीत मिली। वह केवल तीन जगह अपनी जमानत बचा पाई। बसपा की पराजय तो वाकई चौंकाने वाली थी। ठीक वैसे ही भाजपा की विशाल जीत।
सन 1984 में स्थापना के बाद से ही बसपा उत्तर प्रदेश में उभार पर रही। मायावती और उनके पहले कांशीराम ने पार्टी को अच्छी तरह संभाला। सन 1989 और 1991 के चुनाव में जहां पार्टी बमुश्किल 10 फीसदी वोट हासिल कर सकी थी, वहीं 2007 के विधानसभा चुनाव में उसे 30.4 फीसदी मत मिले। 2007 से 2012 तक पार्टी प्रदेश में बहुमत से सत्ता में रही। लेकिन उसका पराभव भी उतना ही तेज रहा। 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रदेश में उसकी मत हिस्सेदारी 19.6 फीसदी रही जबकि 2012 के विधानसभा चुनाव में यह हिस्सेदारी 26 फीसदी और 2017 में 22.2 फीसदी थी।
अतीत में भी चुनावी नतीजे पार्टियों के पक्ष या विपक्ष में जाते रहे हैं। आपातकाल के बाद 1977 के आम चुनाव में भारी पराजय के बाद इंदिरा गांधी 1980 के चुनाव में बेहतरीन जीत के साथ वापस आई थीं। सन 1984 के लोकसभा चुनाव में महज दो सीटों पर सिमटने के बाद भाजपा 2014 में भारी बहुमत से सत्ता में आई। लेकिन उत्तर प्रदेश में बसपा का भविष्य ठीक नहीं दिख रहा। उत्तराखंड और पंजाब में अतीत में हम ऐसा होते देख चुके हैं।
बसपा का मुख्य राजनीतिक हथियार रहा है अनुसूचित जाति या दलित जो सदियों के अन्याय से पीडि़त रहे हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक दलितों की आबादी कुल 20.7 फीसदी है। उत्तर प्रदेश बसपा की राजनीति के लिए मुफीद रहा है। लेकिन उत्तर प्रदेश इकलौता ऐसा प्रांत नहीं है। पंजाब में दलितों की आबादी 31.9 फीसदी, हिमाचल प्रदेश में 25.2 फीसदी, पश्चिम बंगाल में 23.5 फीसदी और हरियाणा में 20.2 फीसदी हैं। इन सभी राज्यों में बसपा लगातार कमजोर है।
उत्तराखंड और पंजाब की बात करें तो 2017 में दोनों राज्यों में उत्तर प्रदेश के साथ ही चुनाव हुए। उत्तराखंड में अनुसूचित जाति की आबादी 15.2 फीसदी है। यह आबादी हरिद्वार के आसपास 12 सीटों के आसपास केंद्रित है। बसपा इस बार एक भी सीट जीतने में नाकाम रही। उसका मत प्रतिशत भी पिछले तीन चुनावों के 11-12 फीसदी से घटकर 7 फीसदी रह गया।
पंजाब देश में अनुसूचित जाति की सबसे अधिक आबादी वाला प्रांत है। 2011 की जनगणना में यहां दलित आबादी 31.9 फीसदी थी। खासतौर पर अमृतसर, गुरदासपुर, होशियारपुर, जालंधर, लुधियाना, पटियाला और संगरूर के आसपास अधिक दलित हैं। इसके बावजूद 2017 चुनाव में बसपा यहां एक भी सीट जीतने में नाकाम रही। इसकी मत हिस्सेदारी 1992 के 16.3 फीसदी से घटकर 1997 में 6.4 फीसदी और इस बार 1.5 फीसदी रह गई।
कोई एक जाति अपने दम पर बड़ी जीत का सबब नहीं बन सकती। भारतीय राजनीति में जाति का महत्त्व रहा है और अब भी है लेकिन चुनावी जीत के लिए रणनीति तैयार करनी होती है। इसके लिए एक नहीं बल्कि कई पहचान समूहों को एक साथ लाना होता है। भाजपा और कांग्रेस ने उत्तराखंड में जबकि अकाली दल ने पंजाब में दलितों को अपने साथ लेना शुरू किया तो बसपा की हालत पतली होती गई। उत्तर प्रदेश में भाजपा ने उसका आधार छीन लिया और विकास के एजेंडे पर जीत हासिल की।
उत्तर प्रदेश में भाजपा ने बेहद सावधानी से दलितों की उपजातियों पर ध्यान दिया और अपना दल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी) के साथ गठबंधन करके पकड़ मजबूत की। इन दोनों दलों की स्थापना बसपा के दो संस्थापक सदस्यों और कांशीराम के सहायकों सोनेलाल पटेल (कुर्मी) और ओम प्रकाश राजभर (राजभर) ने की थी। इसके अलावा भाजपा ने बहुत बड़ी तादाद में दलित उपजातियों के उम्मीदवारों को टिकट दिया। पासी, कोरी, वाल्मीकि आदि जातियां मायावती के जाटव वोट बैंक से अलग हैं। जातिगत पूर्वग्रह के दूर होने और वैकल्पिक दलों के आने से कई दलितों ने बसपा के प्रति अपनी निष्ठïा बदल ली।
इतना ही नहीं अपर्याप्त ही सही लेकिन कुछ सशक्तीकरण दलितों को मिल चुका है। ऐसे में शायद विकास उनके एजेंडे में न केवल अधिक महत्त्वपूर्ण हो चला है बल्कि यह वक्त की जरूरत भी है। शेष देश की तुलना में उत्तर प्रदेश पहचान की राजनीति में अधिक उलझा रहा है। संभवत: इसीलिए यह राज्य काफी पीछे छूट गया है। उदाहरण के लिए प्रति व्यक्ति आय के मामले में उत्तर प्रदेश सन 1951 में राष्ट्रीय औसत के आसपास था जबकि 2014-15 में राष्टï्रीय आय से बहुत अधिक पिछड़ चुका था। उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजे शायद एक संदेश लेकर आए हैं कि बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश अब 'बीमारू' श्रेणी से आजाद हो चले हैं।

Keyword: UP, election, punjab, BJP,
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