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बजट बनाना उबाऊ लेकिन फायदे भी बड़े

महीने की शुरुआत में अपनी कमाई लिखें और विभिन्न मदों में उसे बांटने के बाद अनुशासन के साथ करें खर्च
तिनेश भसीन /  April 09, 2017

साल दर साल ज्यादातर परिवार आपको एक ही शिकायत करते मिले होंगे: उनकी आमदनी में तो ठीकठाक इजाफा हुआ है, लेकिन बचत अब भी ढंग से नहीं हो पा रही है। इसकी वजह आम तौर पर यही होती है कि परिवार बदलावों के हिसाब से खुद को ढालता नहीं है।
उदाहरण के लिए मोबाइल कनेक्शन को ही लीजिए। इस समय रिलायंस जियो एकदम कौडिय़ों के भाव डेटा मुहैया करा रही है। उसे देखकर एयरटेल और वोडाफोन भी उसी तरह के पैकेज ले आई है। लेकिन सवाल यह है कि कितने लोगों ने इनका फायदा उठाने के लिए अपने मोबाइल फोन प्लान बदले हैं। जिस व्यक्ति का मोबाइल फोन का बिल 1,000 रुपये महीने से अधिक का आता है, वह थोड़ी सी सावधानी बरते तो उसे घटाकर आसानी से 500-600 रुपये कर सकता है। इस तरह सीधे-सीधे 50 फीसदी बचत की जा सकती है।
इसी तरह वेतन में बढ़ोतरी के साथ जीवनशैली में भी बदलाव हो सकता है। उदाहरण के लिए बस या मेट्रो के बजाय अक्सर कैब या कार का इस्तेमाल करना, बार-बार बाहर खाने जाना या मॉल में जाकर फिल्म देखना। इससे मासिक बजट बिगड़ जाता है। हालांकि कोई भी वित्तीय सलाहकार यह राय नहीं देगा कि व्यक्ति को अपने रहन-सहन पर खर्च नहीं करना चाहिए। लेकिन उन पर नजर रखने की जरूरत बिल्कुल है। घरेलू खर्च का बजट बनाने से इस मामले में मदद मिल सकती है।

पाई-पाई की कीमत
पाई-पाई जोडऩा कितना काम आता है, उसका उदाहरण देखिए। आप म्युचुअल फंड में हर महीने करीब 20,000 रुपये का निवेश करते हैं। अगर 12 फीसदी का औसत प्रतिफल भी माना जाए तो 20 साल के बाद आपके पास लगभग 1.86 करोड़ रुपये होंगे। लेकिन अगर आप अपने फंड में 10 फीसदी या 2,000 रुपये प्रतिमाह (यानी बीस साल में कुल 4.8 लाख रुपये अतिरिक्त) बढ़ाते हैं तो आपको 18 लाख रुपये और मिलेंगे। इस तरह आपके पास कुल 2.04 करोड़ रुपये की रकम होगी।
टीबीएनजी कैपिटल एडवाइजर्स के संस्थापक और मुख्य कार्याधिकारी तरुण बिरानी कहते हैं, 'जैसे ही किसी व्यक्ति को समझ आ जाता है कि उसके गैर जरूरी खर्च कौन से हैं तो बचत और महत्वपूर्ण खर्च के लिए रकम खुद ही बचने लगती है।'
बजट बनाना
बजट बनाना उबाऊ हो सकता है। अगर आप पहली बार बजट बना रहे हैं तो इसे आसान रखिए। बाद में हमेशा सुधार किया जा सकता है। बजट के चार हिस्से होते है-आय, निवेश, निश्चित खर्च (जरूरी और गैर-जरूरी) और अनिश्चित खर्च (जरूरी और गैर-जरूरी)। मुंबई के प्रमाणित वित्तीय योजनाकार गौरव मशरूवाला कहते हैं, 'अनिश्चित या औचक खर्चों के साथ शुरुआत मत कीजिए क्योंकि इनमें प्रविष्टिïयां बहुत अधिक होती हैं। उन्हें लिखते हुए व्यक्ति ऊब जाता है और अक्सर बजट बनाना ही बंद कर देता है। आय से शुरुआत करना सबसे बेहतर है। उसके बाद निवेश को नोट करें, उसके बाद निश्चित खर्च और अंत में अनिश्चित खर्च।'
निश्चित जरूरी खर्च वे हैं, जिनमें वर्ष के दौरान कोई बदलाव नहीं होगा। इनमें मासिक किस्तें, स्कूल फीस, बीमा प्रीमियम आदि शामिल हैं। निश्चित गैर-जरूरी खर्चों में पत्रिकाओं की ग्राहकी और जिम सदस्यता आदि शामिल हैं। अनिश्चित जरूरी खर्चों में कपड़े, परिवहन, बिजली, पानी, गैस आदि के बिल शामिल हैं, जबकि अनिश्चित गैर-जरूरी खर्चों में बाहर खाना, फिल्म देखना, कैफे में बैठना आदि शामिल हैं।
अरविंद राव ऐंड एसोसिएट्स के संस्थापक अरविंद राव कहते हैं, 'वित्त वर्ष शुरू होने से पहले इसे आधा दिन दीजिए। ज्यादातर आमदनी और खर्च को व्यवस्थित करने और इन्हें बजट में शामिल करने में आमतौर पर करीब तीन महीने का समय लगता है, इसलिए विभिन्न मदों के लिए धन का आवंटन लचीला रखें। एक वित्त वर्ष पूरा होने के बाद ही व्यक्ति कड़े लक्ष्य बना सकता है।'
जब आपको आमदनी और खर्च का पता चल जाता है तो एक मद से दूसरे मद में धन का आवंटन करना आसान हो जाता है।

क्या हो सही तरीका
50-20-30 के अनुपात वाला बजट ऐसा खांचा है, जिसमें आप अपने खर्च को अपने बचत के लक्ष्यों के अनुरूप रख सकते हैं। यह उन लोगों के लिए कारगर साबित हो सकता है, जिन पर किसी तरह की पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं है और अगर है भी तो बहुत मामूली। इसमें 50 फीसदी आमदनी घर, खाना, परिवहन और यूटिलिटी बिल जैसी अत्यावश्यक चीजों के लिए अगल रखा जाना चाहिए और 20 फीसदी की बचत की जानी चाहिए। शेष राशि विवेकाधीन खर्च के लिए है, जिसे बाहर जाने, जीवनशैली से जुड़ी खरीद आदि के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसके बाद ऐसी व्यवस्था है, जिसे '60 फीसदी समाधान' कहा जाता है। इसमें 60 फीसदी आय निश्चित खर्चों पर व्यय की जानी चाहिए। शेष 40 फीसदी में सेवानिवृत्ति बचत, लंबी अवधि की बचत, अनियमित व्ययों और अपने शौकों, प्रत्येक के लिए 10 फीसदी राशि आवंटित की जानी चाहिए। अगर आपने पर्सनल लोन लिया है या आप पर क्रेडिट कार्ड का बकाया है तो सेवानिवृत्ति और बचत के लिए अलग किए पैसे से कर्ज का भुगतान करें।

परिवार की लें मदद
बहुत से दंपतियों का पैसे को लेकर अलग नजरिया रहता है। दोनों में से एक खर्चीला हो सकता है और दूसरे को बचत की आदत हो सकती है। ऐसे दंपती को अलग तरीके से अपना बजट बनाना चाहिए। इंटरनैशनल मनी मैटर्स के संस्थापक और मुख्य कार्याधिकारी लोवई नवलखी का सुझाव है, 'सबसे पहले तो उन्हें वह राशि तय कर लेनी चाहिए, जो दोनों हर महीने बचाएंगे। अनावश्यक खर्चों का बोझ उठाने में दोनों को मदद करनी चाहिए और बाकी बचे पैसे अपनी मर्जी से खर्च करने चाहिए।'
मशरूवाला कहते हैं, 'इस काम में अपने बच्चों को शरीक करने के लिए उन्हें वह पैसा लिखकर रखने को कहें, जो वे खर्च कर रहे हैं। परिजनों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चे ऐसा कर रहे हैं। जब उन्हें यह पता चल जाएगा कि उनके परिजन उनके खर्चों पर नजर रख रहे हैं तो वे खुद भी समझदारी से खर्च करना शुरू कर देंगे।'

उतावली से बचें
बजट को सफल बनाने के लिए इसकी शुरुआत केवल महीने के खर्च को लिखने से करें। उसके बाद योजना बनाएं। अगर आपने ठीक बजट आवंटन नहीं किया आप बजट पर अमल नहीं कर पाएंगे। यह सुनिश्चित करें कि हर महीने के अंत में बैंक में कोई पैसा बेकार न पड़ा रहे, अन्यथा आप इसका इस्तेमाल स्वैच्छिक खर्च में करेंगे। आम तौर पर ज्यादातर स्व-रोजगार वाले व्यक्ति अपने कारोबार और व्यक्तिगत आय का घालमेल कर देते हैं। ऐसी स्थिति में बजट पर टिके रहना मुश्किल होता है। बिरानी का सुझाव है कि ऐसे लोगों को खुद को हर महीने एक निश्चित वेतन देना चाहिए। आप दो बैंक खाते को भी अपना सकते हैं, जिसमें एक खर्च एवं ऋण और दूसरा बचत और निवेश के लिए हो। पैसे को अलग-अलग करने से बजट का अनुसरण करने में मदद मिलेगी। राव कहते हैं, 'बहुत से कर्मचारी निवेश के लिए अपने वेतन खाते का इस्तेमाल करते हैं। जब वे नई कंपनी में जाते हैं तो उन्हें नया खाता मिल जाता है और वे पुराने को बंद कर देते है। इसमें अगर आपको पैसे की तत्काल जरूरत पड़ती है तो आपको पैसे को निकालने में दिक्कत आ सकती है।'

Keyword: household budget, Salary, income,
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