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बिहार में शराबबंदी का एक साल

सत्यव्रत मिश्रा /  04 06, 2017

बिहार में शराबबंदी का सरूर

शराबबंदी के एक साल बाद भी आलोचक इसमें खामियां निकाल रहे हैं, पर कुल मिलाकर नीतीश कुमार राज्य में शराब पर लगाम लगाने में काफी हद तक कामयाब रहे हैं

शराबबंदी से बिहार में माहौल काफी अच्छा हुआ है। लोग डर रहे थे कि इससे राज्य के खजाने पर भारी चपत लगेगी, लेकिन उल्टे इस फैसले से राज्य के लोगों के 10,000 करोड़ रु. बचे।अब इस पैसे का इस्तेमाल लोग अपने जीवन को  धारने में कर रहे है।

- नीतीश कुमार, मुख्यमंत्री, बिहार

करीब एक साल पहले बिहार ने शराब से नाता तोड़ने का फैसला लिया था। इस फैसले का जश्न बीते साल बिहार दिवस के मौके पर धूम-धाम के साथ मनाया गया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का चेहरा खुशी से दमक रहा था। उस दिन जोशीले अंदाज में उन्होंने कहा था, 'अगर हम शराबबंदी के अपने फैसले में सफल रहते हैं तो हमारी प्रतिष्ठा में चार चांद लग जाएंगे। इसके इतने फायदे होंगे कि आप गिन नहीं सकते है। अगर हम अपने इस लक्ष्य को हासिल कर लेते हैं, तो देश के हर हिस्से, हर कोने से आने वाले दिनों में शराबबंदी की मांग उठेगी।'

एक साल के बाद सफलता को लेकर बहस जारी है, लेकिन कुमार बिहार में शराब पर लगाम कसने में मोटे तौर पर सफल रहे हैं। बिहार सरकार जहां इसके फायदे गिनाते नहीं थक रही है, तो आलोचक इसमें खामियां निकालने से नहीं चूक रहे हैं। राज्य सरकार शराबबंदी के बाद बिहार में अपराध और दुर्घटनाएं कम होने का दावा कर रही है, तो वहीं विरोधियों के मुताबिक बीते महीनों में अपराधियों की हिम्मत बढ़ी है। मुख्यमंत्री के मुताबिक शराब पर प्रतिबंध से सामाजिक सद्भाव बढ़ा है, तो आलोचकों के मुताबिक इस फैसले की वजह से सरकारी खजाना खाली हो गया है और निवेशक बिहार से दूर हुए हैं। हालांकि, इस फैसले को लेकर मुख्यमंत्री के इरादे पर कोई शक नहीं कर सकता है।

बीते साल 1 अप्रैल को उन्होंने बिहार में देसी और मसालेदार पर शराब की बिक्री बंद कर दी थी। जनता के जबरदस्त समर्थन को देखते हुए उन्होंने महज चार दिनों के भीतर ही राज्य में शराब पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। पटना उच्च न्यायालय ने 30 सितंबर को राज्य में शराबबंदी कानून को निरस्त करने का फैसला सुनाया, तो उन्होंने 2 अक्टूबर को गांधी जयंती पर नए कानून को अधिसूचित कर दिया। अब बिहार में शराब की एक खाली बोतल भी किसी को सलाखों के पीछे भेजने के लिए काफी है। वहीं, इस कानून के तहत शराब पीने पर अब पूरे परिवार पर मुकदमा चलाया जा सकता है। इस साल की शुरुआत में राज्य सरकार ने बिहार पर सभी ब्रुअरीज और बॉटलिंग प्लांट को भी बंद करने का आदेश सुना दिया।

शराबबंदी को इतनी कड़ाई से लागू करने के लिए बिहार सरकार की काफी आलोचना हुई, लेकिन राज्य के नेतृत्व को इससे फर्क नहीं पड़ रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार किसी भी मौके पर शराबबंदी को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में दिखाने से नहीं हिचकते। इस साल 22 मार्च को बिहार दिवस के मौके पर शराबबंदी की सफलता उनके चेहरे साफ दमक रही थी। खुशी से लबरेज गले से उन्होंने कहा, 'शराब पर प्रतिबंध से बिहार में माहौल काफी अच्छा हुआ है। लोग डर रहे थे कि शराबबंदी से राज्य सरकार के खजाने पर भारी चपत लगेगी, लेकिन उल्टे इस फैसले से बिहार के लोगों के 10,000 करोड़ रुपये बचे। अब इस पैसे का इस्तेमाल लोग अपने जीवन को सुधारने में कर रहे है।'

राज्य सरकार के मुताबिक शराबबंदी के बाद से बिहार में अलग-अलग वस्तुओं की मांग बढ़ी है। राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक बीते वित्त वर्ष में दूध-दही की मांग में 18 फीसदी का इजाफा हुआ है। वहीं, शहद की मांग चार गुना बढ़ी है, जबकि रसगुल्ले की बिक्री 50 फीसदी चढ़ी है। उपभोक्ता उत्पादों (एफएमसीजी) की मांग में 25 फीसदी बढ़ी, जबकि टीवी, फ्रिज और वॉशिंग मशीन की बिक्री में 31 प्रतिशत का इजाफा दर्ज किया गया है। रेडीमेड कपड़ों की बिक्री भी बीते साल 50 फीसदी बढ़ी, जबकि गहनों की बिक्री 11 फीसदी बढ़ी है। इसके अलावा, दोपहिया वाहनों की बिक्री 23 फीसदी बढ़ी है। इसका श्रेय राज्य सरकार सीधे-सीधे शराबबंदी को दे रही है। 

दूसरी तरफ, राज्य सरकार ने कहा है कि बीते साल अप्रैल और दिसंबर के बीच अपराध 2015 की समान अवधि की तुलना में 27 फीसदी कम हुआ है। कत्ल के मामलों में 22 फीसदी की कमी आई है, जबकि इस दौरान 23 फीसदी कम डकैतियां हुई हैं। इसके अलावा, दंगों के मामले में 33 फीसदी की गिरावट हुई है। राज्य सरकार ने विधानसभा में ऐलान भी किया था कि बीते साल शराबबंदी की वजह से सड़क दुर्घटनाओं में 17-20 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई है। इन आंकड़ों से उत्साहित होकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अब महज 'शराबबंदी' की जगह 'पूर्ण नशाबंदी' पर अपना ध्यान केंद्रित करने का ऐलान किया है।

राज्य सरकार के इस उत्साह से कई विश्लेषक इत्तफाक नहीं रखते हैं। कई के मुताबिक राज्य में मांग में इजाफा स्वाभाविक है और इसके पीछे शराबबंदी अहम करार नहीं है। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता सुशील कुमार मोदी ने कहा, 'उपभोक्ता वस्तुओं की मांग में इजाफे के पीछे शराबबंदी अहम करार नहीं है, यह स्वभाविक विकास है। मिसाल के तौर पर 2006-15 के बीच राज्य में वाहनों की तादाद 10 गुना हो गई। इस दौरान तो राज्य में शराबबंदी थी नहीं?' कई विश्लेषक अपराध में गिरावट के सरकारी दावों पर भी शक जता रहे हैं। हालांकि, शराबबंदी से राज्य सरकार की कमाई में जरूर सेंध लगी है। बीते वित्त वर्ष में राज्य सरकार ने वाणिज्य करों में 22,000 करोड़ रुपये कमाई का लक्ष्य रखा था, लेकिन असल कमाई महज 18,000 करोड़ रुपये के आस-पास रही है। वह भी ऐसे वक्त जब राज्य सरकार ने बीते साल चार बार मूल्यववर्धित करों (वैट) में इजाफा किया था।

वैसे सरकारी अधिकारियों पर इस कमी का कोई असर नहीं हो रहा है। वित्त विभाग के प्रधान सचिव रवि मित्तल ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'इसका कोई बुरा असर नहीं होगा। अगर कमाई में कमी हुई होती, तो हमने सबसे पहले अपने खर्चों में कटौती की होती। हमने जनवरी में ही सभी विभागों को उनका पूरा आबंटन जारी कर दिया था और उन्होंने पूरी राशि का इस्तेमाल भी किया।' हालांकि, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक फरवरी तक कई विभागों ने अपने कुल आबंटन का 50 फीसदी भी खर्च नहीं किया था।  राज्य के मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह के मुताबिक शराबबंदी के फायदे को देखते हुए राजस्व का नुकसान काफी छोटा है। उन्होंने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'भले ही शराबबंदी की वजह से हमें 5,000-6,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है, लेकिन इसके एवज में काफी कुछ मिला है। अपराध कम हुआ है, दुर्घटनाएं कम हुई हैं। इनका मोल पैसों से नहीं लगाया जा सकता है। शराबबंदी से बिहार को काफी मुनाफा हुआ है।'

दूसरी तरफ, शराबबंदी की वजह से निवेशकों का बिहार से मोहभंग हुआ है। बीते साल काल्र्सबर्ग इंडिया के मुख्य कार्याधिकारी माइकल जॉनसन ने सार्वजनिक रूप से बिहार सरकार को खरी-खोटी सुनाई थी। उनके मुताबिक राज्य सरकार ने बरसों तक कंपनी को निवेश करने के लिए आमंत्रित किया और बीते साल महज 12 घंटों में अपना बोरिया-बिस्तर समेटने का आदेश सुना दिया। यूनाइटेड स्प्रिट्स की मुख्य रणनीतिकार अबंति शंकरनारायणन ने कहा, 'बीते साल अप्रैल से लेकर अब तक राज्य सरकार का हर फैसला हमारी समझ से परे है।' यूनाइटेड ब्रुअरीज ने पटना के पास 500 करोड़ रुपये के निवेश से एक बियर बॉटलिंग प्लांट लगाया था, लेकिन राज्य सरकार के फैसलों के मद्देनजर कंपनी को इसे जूस इकाई में तब्दील करना पड़ा। 

इंटरनैशनल स्प्रिट्स ऐंड वाइंस एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष अमृत किरण सिंह ने कहा, 'मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीते कार्यकाल में बिहार की पहचान सकारात्मक बातों के लिए होती थी। हालांकि, अब यह पहचान बदल गई है। आज विकास की जगह पर शराबबंदी के बाद 30,000 लोगों को जेल भेजने की चर्चा होती है। लोग अब फिर से बिहार से बाहर जाने लगे हैं क्योंकि अब बिहार में रोजगार नहीं है।'

बीते एक साल में शराबबंदी के बाद करीब 45,000 लोगों को शराबबंदी के उल्लंघन का मुकदमा दायर किया जा चुका है। इस वजह से राज्य सरकार के सामने नई समस्या भी खड़ी हो गई है। दरअसल, इसके बाद से बिहार की जेलों में भीड़ बढ़ती जा रही है क्योंकि इस 45,000 में से महज एक तिहाई आरोपियों को ही जमानत मिली है। मोटे मुनाफे को देखते हुए बड़े अपराधी भी इस गोरखधंधे में उतर रहे हैं।

भले ही आलोचक शराबबंदी का विरोध कर रहे हैं, लेकिन इस बाबत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जनता से काफी समर्थन मिल रहा है। खासतौर पर महिलाएं राज्य सरकार के इस कदम से काफी खुश हैं। वैशाली जिले के रजौली गांव की मुन्नी देवी की मुस्कान छुपाए नहीं छुपती है। उनके मुताबिक शराब से नाता टूटने के बाद उनके पति उन पर ज्यादा ध्यान देते हैं और कभी-कभार उपहार भी लेकर आते हैं। उनके बेटे भी अब वक्त से घर आते हैं और गांव में शामें अब शांत हो चुकी हैं। उन्होंने कहा, 'पहले मर्द शराब पीकर झगड़ा करते थे, अपनी पत्नियों को पीटा करते थे। नीतीश जी की कृपा है कि अब ये सब बंद हो गया है। अब लोग डरते हैं कि शराब पीएंगे तो पुलिस उन्हें जेल में बंद कर देगी।'

हालांकि, बिहार में शराबबंदी के बाद आस-पड़ोस के राज्यों को आबकारी से मोटी कमाई हो रही है। बहरहाल नीतीश कुमार को इस वक्त इस बात की ज्यादा चिंता नहीं है और वह शराबबंदी के पहले साल की कामयाबी में दमक रहे हैं।
Keyword: bihar, alcohol ban,
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