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'अच्छे दिन' के नाम पर उत्साह का सिलसिला लगातार बरकरार

कनिका दत्ता /  April 06, 2017

'बाजार में तेजी लाना' एक ऐसा जुमला है जिसे बाजार जगत के पेशेवर बहुत पसंद करते हैं। इसका अर्थ है ऐसी कोशिशें जिनके चलते बाजार में उपभोक्ता की रुचि लगातार बनी रहे। इसमें नई पेशकश करना, पहले से चले आ रहे उत्पादों का विस्तार, नई योजनाएं आदि सभी शामिल हैं। किसी भी प्रतिस्पर्धी बाजार के लिए यह मूलभूत नियम है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का व्यापक एजेंडा इसी मानक बाजार तकनीक को दर्शाता नजर आता है। 
वर्ष 2014 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की जबरदस्त जीत के बाद देश के मुखिया ने सभी भारतीयों (पढ़ें उपभोक्ताओं) को लगातार इस स्थिति में बनाए रखा है जहां वे अगले बड़े तमाशे का इंतजार करते नजर आते हैं। कहीं सामाजिक बदलाव के प्रयोग चल रहे हैं तो कहीं निर्दोष साबित करने या शुद्घीकरण का कार्यकम चल रहा है। 
आम चुनाव के दौरान अच्छे दिन का वादा किया गया था लेकिन कहा जा सकता है कि भ्रष्टïाचार में घिरी संप्रग सरकार के आखिरी दिनों के विपरीत यह सरकार काम करती हुई तो नजर आती ही है। शुरुआत करते हैं विदेश नीति से। मनमोहन सिंह शक्तिहीन और उम्रदराज भले थे लेकिन उन्होंने अमेरिका के साथ असैन्य नाभिकीय समझौता करके देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पडऩे से बचाया। लेकिन हमारे नए प्रधानमंत्री की ऊर्जा, प्रतिबद्घता और उनकी चतुराई के सामने वह कुछ भी नहीं था। नए प्रधानमंत्री के पास संसद में बहुमत की शक्ति भी है। 
सरकार बनने के तत्काल बाद शपथग्रहण समारोह में दक्षिण एशियाई पड़ोसी देशों के नेताओं को बुलाया गया। इसमें पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भी शामिल थे। दोनों नेताओं ने एक दूसरे की मां के लिए साड़ी का आदान-प्रदान किया। इसके बाद चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग का भव्य स्वागत किया गया। दोनों नेताओं की झूले पर तस्वीर भी सामने आई। अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ मोदी के रिश्ते की भी खूब चर्चा हुई। खासतौर पर उस सूट की जिस पर उनके नाम की कढ़ाई की गई थी। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने गणतंत्र दिवस समारोह में भी शिरकत की। जापान में उनकी ड्रम बजाती और चाय पर ली गई तस्वीर सामने आई। अमेरिका में उन्होंने किसी रॉक स्टार की तरह लोगों को संबोधित किया। सेल्फी की तो बात ही मत पूछिए। 
इस बीच घरेलू नीति में कई योजनाएं सामने आईं। जन धन, स्वच्छ भारत, मेक इन इंडिया, इंद्रधनुष, स्टैंड अप इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी, उदय, जाम, 3एस, एमओएम, यूएसटीटीएडी आदि योजनाएं इसका उदाहरण हैं। एक वेबसाइट पर जून 2016 तक ऐसी 30 योजनाएं दर्ज थीं। जबकि एक अन्य पर 32। पुराने योजना आयोग को भंग करके उसकी जगह नीति आयोग का गठन किया गया। 
मोदी के पास इतना वक्त था कि उन्होंने हर किसी के बारे में विचार किया। उदाहरण के लिए उन्होंने एक घंटे के भाषण में बच्चों को लेकर अपनी चिंता जाहिर की। बच्चों को दूरदर्शन पर उनका यह भाषण अनिवार्य तौर पर सुनना पड़ा। सुशासन को लेकर उनकी चिंता का यह आलम था कि उन्होंने उसका नाम बदलकर सुशासन दिवस कर दिया। पवित्र गाय को लेकर उनकी चिंता के चलते लगभग पूरे देश में बीफ पर प्रतिबंध की स्थिति बन गई और बूचडख़ानों, कारोबारियों, दलितों पर हमलों की शुरुआत हो गई। एक निर्दोष मुस्लिम व्यक्ति को जान गंवानी पड़ी। छात्रों, गोरक्षकों का उत्साह बढ़ा और हिंदू आस्था जोर मारने लगी। देशभक्ति को नए सिरे से परिभाषित किया जाने लगा। मतभेद रखने वालों को पाकिस्तान भेजने की बात कही जाने लगी।
कारोबारी समुदाय के साथ सरकार की करीबी ने सारी सीमाएं पार कर लीं। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़कर फरवरी 2008 के 5.7 अरब डॉलर के उच्चतम स्तर के करीब आ गया। जीडीपी वृद्घि में हमने चामत्कारिक रूप से चीन को पीछे छोड़ दिया। इन अनवरत प्रयासों के चलते एक के बाद एक जहां राज्य दर राज्य भाजपा का शासन स्थापित होता गया (बिहार में जरूर उसे पराजय का सामना करना पड़ा), विपक्ष अप्रासंंगिक होता चला गया। इन तमाम बातों से हुआ क्या? क्या भारत रोजगार और विकास के मामले में स्वर्ग बन गया? मौजूदा सरकार ने वादा तो यही किया था। 
विदेशी निवेशक उत्साहित हैं, लेकिन देसी निवेशक चिंतित नजर आ रहे हैं। वर्ष 2014 से 2016 के बीच 112 खरब रुपये मूल्य के 6,124 निवेश प्रस्ताव आए और कहा गया कि इनसे 15 लाख लोगों को रोजगार मिलेगा। अगर वर्ष 2011-2013 के आंकड़ों की बात करें तो उस अवध में 260 खरब रुपये के 9,000 से अधिक प्रस्ताव आए थे जिनसे 38 लाख रोजगार तैयार होने थे। यह वह दौर था जब संप्रग सरकार की चौतरफा आलोचना हो रही थी। ये केवल प्रस्ताव हैं और हमें कोई अंदाजा नहीं कि इनमें से कितने फलीभूत हुए। लेकिन इनसे कारोबारी रुझान का अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है। 
मोदी के कार्यकाल की सबसे अहम परिघटना रही नोटबंदी। इसके चलते एक झटके में 80 फीसदी से अधिक प्रचलित मुद्रा बंद हो गई। हमसे कहा गया कि इससे काले धन पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी। उसके बाद जब बैंकों में नोटों की बाढ़ आ गई तो कहा गया कि यह कवायद अर्थव्यवस्था का डिजिटलीकरण करने के लिए की जा रही है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के ऐन पहले उन्होंने विपक्ष को एकदम नकदीशून्य कर दिया। इसके बाद दिसंबर में समाप्त तिमाही में जीडीपी की वृद्घि 7 फीसदी बताई गई। इस बात ने हर किसी को चकित कर दिया था। 
अब एक शख्स को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया गया है जिसके नाम पर कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। देश इस समय सबसे गरीब और बेरोजगार राज्य में वर्ष 2014 की प्रचार नीति का ही विस्तार देख रहा है। ऐसे में यह सवाल बना रहेगा कि हमें आगे क्या कुछ देखना है? 
Keyword: modi, yogi, UP,
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