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डिजिटल भुगतान में सुरक्षा पर रहे ज्यादा ध्यान

देवाशिष बसु /  April 06, 2017

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी महत्त्वाकांक्षी दृष्टि के अधीन सारे लेनदेन को बैंकों के जरिये अंजाम देना चाहते हैं, वह भी डिजिटल तरीके से। सरकार ने नकद लेनदेन को हतोत्साहित करने और डिजिटल बैंकिंग लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए कई उपाय अपनाए हैं। नोटबंदी के दौरान इस तरह की खबरें आमतौर पर सामने आती रहीं कि कैसे चाय वाले और पान वाले छोटे-छोटे भुगतान डिजिटल तरीके से ले रहे हैं। डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, ई-वॉलेट और सरकार, बैंक तथा अन्य माध्यमों द्वारा विकसित ऐप के जरिये भुगतान तेजी से बढ़ा है। इसके पीछे मूल विचार है काले धन पर नियंत्रण कायम करना। हालांकि डिजिटल बैंकिंग की यह दृष्टिï और नीति 8 नवंबर 2016 को दिए गए प्रधानमंत्री के भाषण में पूरी तरह नदारद था।
इसमें दो राय नहीं है कि डिजिटल भुगतान का विकल्प नोट के विकल्प से बेहतर है। आदर्श स्थिति में यह सीधी पहुंच, अत्यधिक सरलता, लेनदेन का पूरा रिकॉर्ड रखने, व्यापक पहुंच और कम लागत वाली व्यवस्था है। अगर ये सारे लाभ उपभोक्ताओं को नहीं मिल पा रहे हैं तो यह माना जाना चाहिए कि डिजिटल लेनदेन की प्रक्रिया में खामी है। यह बात याद रखनी होगी कि डिजिटल मामले में उपभोक्ता अपना सारा नियंत्रण एक सिस्टम को सौंप देता है जो नकद लेनदेन की तुलना में खासा अस्पष्ट होता है। जाहिर सी बात है कि डिजिटल लेनदेन को उपभोक्ताओं के लिए एकदम स्पष्ट और पारदर्शी हो। अपेक्षाकृत मजबूत पक्ष यानी बैंकों को कमजोर यानी ग्राहकों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। यही वजह है कि डिजिटल सेवाएं तब बहुत अच्छा प्रदर्शन करती हैं जब विक्रेता एक ऐसा तरीका निकालता है जहां ऐसे विकल्प पहले से मौजूद रहते हैं जो उपभोक्ता के लिए मददगार हों। अगर ऐसा नहीं होता तो डिजिटल माध्यम एक दु:स्वप्र की तरह है क्योंकि खरीदार पूरी तरह कंप्यूटर सर्वर और कॉल सेंटर की मर्जी पर आश्रित रहता है। 
हर कोई यह मानता है कि भारतीय ई-कॉमर्स जगत अपने मौजूदा आकार से बहुत छोटा होता अगर भारतीय ई-कॉमर्स कंपनियों ने कैश ऑन डिलिवरी यानी नकद भुगतान पर सामान मुहैया कराने का विकल्प नहीं दिया होता। अगर ये कंपनियां भी पहले भुगतान करने का विकल्प अपनातीं तो क्या होता? बैंकों के ग्राहक आज ऐसी ही स्थिति से दोचार हैं। आइए देखते हैं कुछ ऐसे मुद्दे जिनका सामना बैंकों के ग्राहकों को कभी न कभी करना पड़ता है। 
 
बैंक के डिजिटल लेनदेन में जवाबदेही: बैंक के डिजिटल लेनदेन कई वजहों से गलत हो सकते हैं। इनमें से अधिकांश मामलों में ग्राहक की कोई गलती नहीं होती। डेबिट कार्ड और बैंक खाते का हैक होना नई बात नहीं है। डिजिटल भुगतान की बढ़ती तादाद के बीच जरूरत यह है कि उपभोक्ताओं को अवांछित गतिविधियों से बचाया जाए। आज बचाव का पूरा उत्तरदायित्व ग्राहक पर है, न कि बैंक पर। जबकि भुगतान व्यवस्था पूरी तरह बैंक के नियंत्रण में है, फिर भी ग्राहकों से डिजिटल लेनदेन अपनाने को कहा जा रहा है। हम बिना उपभोक्ताओं के बचाव का उचित उपाय किए डिजिटलीकरण की ओर बढ़ रहे हैं। जबकि अधिकांश देश इस विषय में उचित व्यवस्था कर चुके हैं। 
 
ई-वॉलेट लेनदेन की जवाबदेही: आपको ई-वॉलेट कंपनी से एक ई-मेल मिलता है कि आपका लेनदेन सफल रहा। लेकिन मान लीजिए ऑनलाइन कारोबारी कंपनी कहती है कि उसे पैसा नहीं मिला तब? आपका पैसा साइबर जगत में खो गया। आपके पास क्या विकल्प शेष हैं? कमोबेश कोई नहीं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने एटीएम के विफल लेनदेन के लिए नियम बना रखे हैं। उपभोक्ता की शिकायत का सात दिन में निवारण जरूरी है, वरना 100 रुपये रोजाना के हिसाब से जुर्माना देना होता है। परंतु वॉलेट या यूनीफाइड पेमेंट इंंटरफेस (यूपीआई) के लिए ऐसा कोई नियम नहीं है। यहां तक कि एनईएफटी और आईएमपीएस जैसे ढांचों में भी उपभोक्ता को छोटी-मोटी गलती के लिए दंडित 
किया जाता है
 
अपर्याप्त कानून: डिजिटल भुगतान को लेकर बहुत अधिक कानून नहीं हैं। ई-वॉलेट गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां हैं इसलिए उन पर बैंकों के नियम लागू नहीं होते। जबकि वित्तीय क्षेत्र की तकनीकी कंपनियों का सुरक्षा अनुपालन सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 43ए के अधीन आता है। सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता पवन दुग्गल के मुताबिक एक उपभोक्ता और मोबाइल वॉलेट सेवा प्रदाता के बीच का लेनदेन बमुश्किल अनुबंधित होता है जिसे कभी भी खारिज किया जा सकता है। उन्होंने कुछ माह पहले इस समाचार पत्र में लिखा था कि देश में डिजिटल भुगतान को कानूनी समर्थन देने की आवश्यकता है। इससे न केवल उपभोक्ताओं का पैसा सुरक्षित होगा बल्कि खुद कंपनियों का भी बचाव होगा। इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है कि अगर कुछ गड़बड़ होती है तो मामला कौन देखेगा? वह खुलकर कहते हैं कि डिजिटल भुगतान को लेकर उपजे किसी भी विवाद से निपटने के लिए कोई कानूनी व्यवस्था नहीं है।
 
अतिरिक्त शुल्क/शुल्क चोरी: डिजिटल भुगतान में सबसे अहम है भागीदारी। उपभोक्ताओं को किसी भी सेवा के लिए अपनी स्वीकृति देनी होती है। भारतीय बैंक अब तक सन 1990 के दशक की मानसिकता से उबर नहीं सके हैं। वे मानकर चलते हैं कि ग्राहक को स्पष्ट करना चाहिए कि वह कौन सी सेवा नहीं लेगा। वरना उससे शुल्क वसूल किया जाएगा। बैंक लगातार शुल्क बढ़ा रहे हैं और विकल्प कम करते जा रहे हैं। यह सारी कवायद डिजिटल लेनदेन के नाम पर की जा रही है।
एक ओर जहां तकनीक के दम पर दुनिया भर में वित्तीय कारोबार तेजी से डिजिटल हुए हैं (भारत में सरकार के चलते) वहीं तमाम देशों के नीति निर्माता ग्राहकों के बारे में सबसे आखिर में सोचते हैं। माइक्रोसेव द्वारा बांग्लादेश, फिलीपींस और यूगांडा में डिजिटल बैंकिंग पर किए गए एक अध्ययन के मुताबिक सबसे ज्यादा मसले अवैध शुल्क, अतिरिक्त शुल्क, धनराशि के साइबर जगत में खोजने और खराब डिजिटल सेवा के ही आते हैं। आज वित्तीय सेवा प्रदाताओं का रुख ऐसा है कि वे हर समस्या के लिए ग्राहक को ही दोषी ठहराते हैं। यह डिजिटल जगत के श्रेष्ठ कार्य व्यवहार के विपरीत है। हकीकत में डिजिटल लेनदेन को नैसर्गिक तौर पर ग्राहक के पक्ष में होना चाहिए। क्या प्रधानमंत्री सुनिश्चित करेंगे कि देश में ऐसा हो? 
 
Keyword: modi, digital india, bank,
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