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नई अर्थव्यवस्था में बाजार की शक्तिका असर

अजय शाह /  April 05, 2017

हम पुरानी अर्थव्यवस्था में रेंट सीकिंग (बिना कुछ दिए आर्थिक लाभ हासिल करना) को लेकर चिंतित रहते हैं और नए तकनीक सक्षम उद्योगपतियों का सम्मान करते हैं। बहरहाल, कुछ उच्च तकनीक वाली कंपनियों ने नेटवर्क प्रभाव के जरिये अपना एकाधिकार कायम करने की कोशिश की। एक बार यह स्थिति हासिल कर लेने के बाद मनचाहे लाभ हासिल करने का अवसर मिलता है, वह भी उपभोक्ताओं की कीमत पर। कुछ उद्यमियों और उनके फाइनैंसरों ने नेटवर्क प्रभाव कायम करने और जबरदस्त कारोबारी बढ़त हासिल करने के लिए भारी पैमाने पर छूट देने की योजना अपनाई। हमें प्रतिस्पर्धा कानून में आक्रामक मूल्य निर्धारण की अवधारणा का विस्तार करने की आवश्यकता है ताकि इन हालात से निपटा जा सके। इसके लिए भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) और प्रतिस्पर्धा अधिनियम पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता होगी। 
नवाचार आर्थिक प्रगति का आधार है। हम तकनीकी क्षेत्र की कंपनियों की सराहना करते हैं क्योंकि वे खूब नवाचार अपनाती हैं और इसकी बदौलत उनकी किफायत लगातार बढ़ती है। लेकिन उसके साथ ही हमें यह भी मानना होगा कि कुछ तकनीक आधारित कारोबार वास्तव में अपना राजस्व अधिग्रहण और बाजार की शक्ति का गलत इस्तेमाल करके जुटाते हैं। हाल ही में स्मृति परशीरा, अविरूप बोस और मैंने हाल ही में एक पर्चे में इस बात का परीक्षण किया।
उच्च तकनीक वाले उद्योग तीन माध्यमों से बाजार शक्ति से प्रभावित होते हैं। कई बार तयशुदा लागत बहुत अधिक होती है और सीमांत लागत तकरीबन शून्य होती है। उसकी मदद से मौजूदा बाजार प्रतिस्पर्धियों का मुकाबला करना मुश्किल होता है। अन्य परिस्थितियों में ऐसे नेटवर्क प्रभाव हैं जहां किसी व्यवस्था के लाभार्थी के लाभ उपयोग करने वालों की संख्या के समानुपाती होते हैं। उदाहरण के लिए खरीदार और विक्रेता दोनों अपनी-अपनी जरूरत के हिसाब से ईबेडॉटइन का इस्तेमाल करते हैं। एक बार ईबेडॉटइन की स्थापना हो जाने के बाद उसे चुनौती देना असंभव हो जाता है। किसी बाजार की ताकत के अधिग्रहण का तीसरा तरीका गूगल खोज की तरह है जहां बड़ी तादाद में मौजूदा उपयोगकर्ता उपभोक्ता व्यवहार के बारे में आंकड़ों का बेहतरीन विश्लेषण करते हैं। यही बात गूगल को सर्वश्रेष्ठï खोज इंजन बनाती है।
तकनीकी परिदृश्य वाले लोग नेटवर्क प्रभाव कायम करने के अवसरों की पहचान चिह्निïत करने में गर्व महसूस करते हैं। जब भी मैं किसी तकनीकी उद्यमी और उसे वित्तीय मदद मुहैया कराने वालों को इन अवसरों और इन्हें भुनाने के बारे में बात करते सुनता हूं तो मेरे कान लाल हो जाते हैं। कई उद्यमी और उनके फाइनैंसर नेटवर्क प्रभावों की मदद से मजबूत स्थिति कायम करना चाहते हैं। अगर तकनीकी नवाचार की मदद से मजबूत स्थिति नहीं कायम की जा सकी तो वे अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए उपभोक्ताओं को रियायत देने की राह अपनाते हैं। 
तकनीकी कंपनियां और उनकी मदद करने वालों ने यह प्रभाव हासिल करने के लिए बहुत अधिक पैसा खर्च किया है। वैश्विक टैक्सी कंपनी उबर को वर्ष 2016 की पहली छमाही में 1.27 अरब डॉलर का घाटा सहना पड़ा। इस दौरान उसने लगातार वाहन चालकों और यात्रियों को लगातार रियायत और प्रोत्साहन राशि दी ताकि ऐसा माहौल तैयार कर सके जहां बाजार के दोनों पक्ष केवल और केवल उसका ही इस्तेमाल करें। यानी पैसा केवल एक कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल हुआ। यहां नवाचार है पैसे खर्च करके ताकि बाजार की ताकत अपने पक्ष में किया जा सके और हमेशा के लिए मनचाही आय हो सके। कुछ अन्य ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्मों के साथ भी यही मामला है।
आर्थिक नीति की दृष्टि से देखें तो यह विचार ठीक नहीं है। बाजार की ताकत एक समस्या है। तकनीकविद और निजी पूंजी निवेशक बाजार पर ही काबिज होना चाहते हैं। अर्थशास्त्रियों और बाजार नीति नियंताओं को इस बात पर ध्यान देना चाहिए।
एक कंपनी का तकनीकी नवाचार की बदौलत शीर्ष स्थान पर पहुंचना एक बात है। इस दलील को माना जा सकता है कि समाज कुछ कंपनियों द्वारा कुछ समय तक अकूत मुनाफा कमाने को स्वीकार कर सकता है क्योंकि इससे नवाचार को प्रोत्साहन मिलता है। लेकिन बाजार में ताकतवर पहुंच हासिल करने के लिए अपनाई गई ऐसी नीतियां बेहतर उत्पाद के उत्पादन को एक तरह से हतोत्साहित करती हैं। ऐसे में असल खेल वित्तीय ताकत का है, न कि बौद्धिक क्षमता का। इस समस्या का एक नया पहलू है निवेशकों के ऐसे गठजोड़ का प्रमाण जो सामरिक व्यवहार अपनाते हैं और यह तय करने लगते हैं कि कौन सी कंपनी रहेगी कौन सी नहीं? उबर ऐप की कंप्यूटर प्रोग्रामिंग बहुत खराब है। अब सवाल आता है उपभोक्ताओं को सब्सिडी देने के लिए लाखों डॉलर की रकम जुटाने का। चूंकि अब असल कारक बौद्धिक नहीं बल्कि वित्तीय ताकत है इसलिए बड़ी टेक कंपनियों का लाभ भी तेजी से नए आविष्कार करने वालों के बजाय वित्तीय मदद करने वालों की ओर स्थानांतरित होता जा रहा है। 
भारतीय जन नीति में ऐसे सवालों पर कैसे विचार करना चाहिए? पहली बात है नेटवर्क प्रभाव के बारे में पूरी जानकारी हासिल करना और प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता संरक्षण के साथ नई अर्थव्यवस्था को समझना। 
दूसरी बात है कमी को पूरा करने की संभावना पर विचार करना। उपभोक्ताओं को दी जाने वाली रियायत तब तक उपभोक्ता के पक्ष में मानी जा सकती है जब तक वह बाजार की ताकत को प्रभावित नहीं करती। लेकिन जब यह बाजार को हथियाने का जरिया बन जाए तो उसे अलग तरह से देखना होता है।
तीसरा तत्त्व है इंटरनेट के समय में कदम उठाने की क्षमता। सीसीआई के पारंपरिक सोच के मुताबिक आक्रामक मूल्य निर्धारण पुरानी अर्थव्यवस्था में बाजार शक्ति के धीमे उदय पर आधारित होती थी। सीसीआई को अब ऐसे मामले निपटाने में तेजी दिखानी चाहिए। स्वैच्छिक निपटारा प्रक्रिया विकसित करनी चाहिए जिसकी मदद से जल्द से जल्द हस्तक्षेप किया जा सके और मामलों को शुरुआत में ही निपटाया जा सके।
चौथा तत्त्व है पारस्परिकता पर जोर। ई-मेल जैसे कारोबार में बाजार ताकत हथियाने की संभावना कम है क्योंकि यह पूर्ण पारस्परिकता पर काम करता है। एक नया खिलाड़ी किसी भी समय बाजार में प्रवेश कर सकता है चाहे उसका आकार कैसा भी हो। 
देश में सभी नियामकों और सीसीआई के लिए पारस्परिकता और खुली पहुंच को प्रतिस्पर्धा पूर्व के स्तर पर लाना होगा। उदाहरण के लिए भुगतान मामलों से जुड़ी रतन वाटल समिति ने जोर देकर कहा था कि भुगतान के तीन स्तरों, आरटीजीएस व्यवस्था, एनपीसीआई जैसे भुगतान और यूपीआई जैसे उपभोक्ता भुगतान मॉडल में खुली पहुंच और पारस्परिकता होनी चाहिए। इससे आरबीआई का मौजूदा रुख बदल जाएगा जहां भुगतान नियमन डिजिटल वॉलेट और बैंक खातों में पारस्परिकता को रोकती हैं। इससे पेटीएम जैसे कुछ उद्यमों को जगह बनाने का अवसर मिला।
Keyword: cci, competition,
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