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स्वास्थ्य नीति नई, मगर इलाज नहीं

सुबीर रॉय /  04 05, 2017

नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति
केंद्र और राज्यों के ठोस प्रयासों के बगैर सरकार की 2017 की राष्ट्र्रीय स्वास्थ्य नीति के पिछली नीति से बेहतर परिणाम देने की संभावना नहीं है

नीति के लक्ष्य

2025 तक जन्म के समय जीवन प्रत्याशा में 67.5 से 70 तक वृद्धि
2025 तक 5 साल से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर 23 तक लाना
2020 तक मातृ मृत्यु दर मौजूदा स्तर से 100 तक कम करना
2018 तक कुष्ठ और 2017 तक काला जार का उन्मूलन
2025 तक जन स्वास्थ्य सुविधाओं के उपयोग का स्तर बढ़ाकर 50 फीसदी तक करना

देश में जन स्वास्थ्य की व्यवस्था बुरी तरह चरमराई हुई है और मरीजों को अपने इलाज के लिए बहुत सारा पैसा अपनी जेब से खर्च करना पड़ता है। ऐसे में जब नई स्वास्थ्य नीति की घोषणा हुई तो इसकी बारीकी से जांच पड़ताल करने की जरूरत शिद्दत से महसूस की गई कि क्या इसमें देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए वास्तव में कोई गंभीर उपाय किया गया है।

समस्या यह है कि स्वास्थ्य राज्य का विषय है और राज्य सरकारें स्वास्थ्य पर बहुत कम खर्च करती हैं। साथ ही राज्यों के बीच स्वास्थ्य व्यवस्था की गुणवत्ता और मानव विकास प्राप्तियों के बीच भारी अंतर है। इसके अतिरिक्त वर्ष 2002 की नीति के लक्ष्यों को हासिल नहीं किया गया है और इनमें से कई को फिर 2017 की नीति में शामिल किया गया है।

इसलिए नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के प्रभाव का आकलन दो सवालों के आधार पर सबसे सटीक तरीके से किया जा सकता है। पहला यह कि 2002 की नीति क्यों अपने लक्ष्यों को हासिल करने में नाकाम रही? क्या नई नीति में ऐसा कुछ है जिससे पिछड़े राज्यों को आगे लाया जा सके? साल 2002 में केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार थी और एक बार फिर उसी गठबंधन की सरकार है। इस बीच 10 साल तक कांग्रेस की अगुआई वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की सरकार ने राज किया। ऐसी स्थिति में व्यवस्था में गहरी पैठ बना चुकी उन वास्तविकताओं पर नजर डालना सही होगा जिनका राजनीतिज्ञों के पास कोई जवाब नहीं है।

वर्ष 2002 की नीति एक ईमानदार दस्तावेज है जिसमें उस समय के स्वास्थ्य ढांचे को संतोषजनक नहीं माना गया था। इसके मुताबिक ग्रामीण जन स्वास्थ्य सेवाएं पर्याप्त नहीं हैं जबकि अनधिकृत शहरी बस्तियों में तो इसका वजूद ही नहीं है। स्वास्थ्यकर्मियों की कमी को पूरा करने के लिए प्रशिक्षित नर्सों और अर्धचिकित्‍सा कर्मचारियों की जरूरत है। 

अद्र्घचिकित्सा कर्मचारियों के प्रशिक्षण और प्रदर्शन के लिए दिशानिर्देशों की जरूरत है। साथ ही जन स्वास्थ्य और दवाओं की विशेषज्ञता रखने वाले चिकित्सकों की जरूरत है। निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में स्वास्थ्य मानक सुनिश्चित करने के लिए भी नियमन की जरूरत बताई गई। इस नीति में नागरिक समाज को जोडऩे की बात कही गई थी, खासकर बीमारियों पर नियंत्रण के संबंध में। नीति का घोषित उद्देश्य जन भागीदारी को बढ़ावा देना था और इसके लिए प्राथमिक स्वास्थ्य क्षेत्र को मजबूत करने और दवाओं की मुफ्त आपूर्ति की बात कही गई थी। इसमें प्रस्ताव था कि विकेंद्रीकृत स्वास्थ्य व्यवस्था के जरिये केंद्र सरकार की फंडिंग के तहत कुछ जरूरी दवाएं मुहैया कराकर स्वास्थ्य व्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकता है।

नीति के मुताबिक लोगों को चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराने के लिए केंद्र सरकार राज्यों को ज्यादा फंड देगी। दिलचस्प बात है कि इस नीति में स्वास्थ्य के सभी क्षेत्रों में निजी क्षेत्र का केवल सैद्धांतिक रूप से स्वागत किया गया था। सरकार द्वारा वित्त पोषित और निजी क्षेत्र द्वारा मुहैया कराई जाने वाली जन स्वास्थ्य बीमा योजना को प्रायोगिक परियोजना के तौर पर शुरू करने की बात कही गई थी। इसमें ट्रिप्स के बाद के दौर में दवाओं की कीमतें बढऩे से जन स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए खतरे की संभावना भी जताई गई थी। इसकी वैकल्पिक योजना के तौर पर कम से कम 50 फीसदी टीके सरकारी संस्थानों से खरीदने का प्रस्ताव था। यह आवश्यक दवाओं के आधार पर उपचार को जारी रखता। 

दूसरे सवाल का जवाब ढूंढने के लिए अब राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 की पड़ताल करते हैं। यह जन स्वास्थ्य सेवाओं को ध्यान में रखकर बनाई गई है जिसमें सरकारी अस्पताल स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा हैं। इसमें जन स्वास्थ्य पर खर्च को प्राथमिकता दी गई है और कहा गया है कि दो-तिहाई खर्च प्राथमिक स्वास्थ्य पर खर्च किया जाएगा। इस नीति की सबसे सशक्त बात यह है कि इसमें दवाओं की खरीद की जन व्यवस्था को मजबूत करने की बात कही गई है जो कि गरीबों के लिए मुफ्त दवा मुहैया कराने के लिए जरूरी है। इसमें दवाओं की कीमत पर नियंत्रण रखने की बात कही गई है और डायनोस्टिक्स तथा उपकरणों को भी इसके दायरे में लाने की सिफारिश की गई है। लेकिन साथ ही यह आशंका भी जताई गई है कि नौकरशाही के बिना कुशल खरीद के वैसे नतीजे नहीं निकल सकते हैं जैसे कीमतों में नियंत्रण में हासिल हुए हैं।

मौजूदा नीति में एक विरोधाभास साफ दिखता है। इसमें सरकारी क्षेत्र की दवा कंपनियों को मजबूत करने की सिफारिश की गई है ताकि देश जरूरी दवाओं और टीकों के मामले में आत्मनिर्भर हो सके। वर्ष 2002 की नीति में भी यही बात कही गई थी। लेकिन विडंबना यह है कि सरकार अधिकांश सार्वजनिक उपक्रमों को या तो बेच रही है या फिर बंद कर रही है। 

इस नीति में प्रयोगशाला परीक्षणों के लिए वैश्विक व्यवस्थाओं को अपनाने की बात कही गई है लेकिन दवाओं की गुणवत्ता के लिए विनिर्माण की अच्छी व्यवस्थाओं का कहीं कोई जिक्र नहीं किया गया है। अमेरिका का खाद्य एवं औषधि विभाग बार-बार गुणवत्ता के मामले में भारतीय दवा कंपनियों की खिंचाई करता रहता है। नई स्वास्थ्य नीति में इस मुद्दे को सुलझाया जाना चाहिए था। नीति में इस बार पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया है कि संसाधनों का इस्तेमाल लाभ कमाने के लिए न किया जाए और निजी क्षेत्र स्वास्थ्य संबंधी आधारभूत ढांचे का विस्तार करे तथा इलाज मुहैया करने की व्यवस्था मजबूत करे। लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं की रणनीतिक खरीद में निजी क्षेत्र को जोडऩे में समस्या हो सकती है। शुरुआत की जा सकती है लेकिन इसमे फूक फूककर कदम रखने की जरूरत है। 

निजी डॉक्टरों और अस्पतालों की सेवाएं खरीदने के अहम मुद्दे पर जनता घबराई हुई है। मीडिया में निजी अस्पतालों द्वारा पैसे को ऐंठने के लिए की जाने वाली अजीबोगरीब हरकतें सामने आती रहती हैं। बीमा कवर का इस्तेमाल करने के लिए मरीजों का जबरदस्ती ऑपरेशन कर दिया जाता है या फिर छोटी सी बीमारी के लिए उन्हें अस्पताल में भर्ती करा दिया जाता है और गहन इलाज किया जाता है। 

स्वास्थ्य क्षेत्र के पेशेवरों की इस बारे में अलग-अलग राय है। सरकारी और निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली से अच्छी तरह वाकिफ एक डॉक्टर का मानना है कि भारत जैसे विशाल देश में गरीबी के मौजूदा स्तर को देखते हुए सरकारी अस्पताल निकट भविष्य में पर्याप्त क्षमता विकसित नहीं कर सकते। इसका हल यह है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना जैसी योजनाओं को आगे बढ़ाया जाए। बेहतर होगा कि इसमें निजी क्षेत्र को शामिल किया जाए और उनके लिए सभी सेवाओं के वास्ते अलग रेट निर्धारित किए जाएं। इससे लागत में कमी आएगी और फंडिंग की जरूरतें भी कम होंगी। 

दूसरी तरफ एक कॉर्पोरेट अस्पताल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि उन्हें सरकार के निजी अस्पतालों से सेवाएं खरीदने की योजना को लेकर संदेह है। उन्होंने कहा, 'इसमें दुरुपयोग की संभावना है। जन स्वास्थ्य सेवाओं में क्षमता के मुद्दे का समाधान करने के लिए प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्र को मजबूत करने की जरूरत है इससे रेफर के मामलों में कमी आएगी। इससे द्वितीयक और तृतीयक संस्थानों पर दबाव कम होगा।'

दोनों नीतियों को देखें तो वर्ष 2002 की नीति बेहतर दिखती है। यह ईमानदार, बिना लागलपेट वाली नीति थी और उसमें नागरिक समाज को जोडऩे की बात कही गई थी। वर्ष 2017 की नीति में शब्दों का आडंबर है और नीति में बदलाव का संकेत है। इसमें मुनाफे न कमाने और मुनाफा कमाने के लिए निजी क्षेत्र से सेवाएं खरीदने पर जोर दिया गया है। क्या 2017 की नीति 2002 से बेहतर परिणाम दे पाएगी? इसमें संदेह है। यह एक ऐसा दस्तावेज लगता है जिसे केवल खानापूर्ति के लिए बनाया गया है।
Keyword: national health policy,
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