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वित्त विधेयक संशोधनों से निकली तीन अहम बातें

ए के भट्टाचार्य /  April 04, 2017

वर्ष 2017-18 का केंद्रीय बजट पारित करते समय जो संशोधन किए गए, उन पर बहस मोटे तौर पर इस बात पर केंद्रित रही कि कैसे सरकार ने कुछ अन्य कानूनों में बदलाव को वित्त विधेयक के साथ जोड़कर पारित करने की राह चुनी। जाहिर सी बात है कि ऐसा करने के पीछे राजनीतिक वजह जिम्मेदार थीं। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि उक्त संशोधनों को वित्त विधेयक, जो कि हर तरह से धन विधेयक है, के साथ जोड़ते ही उन्हें कानून बनने के पहले राज्य सभा की मंजूरी की आवश्यकता नहीं रह गई। 
ऐसा करना हर दृष्टि से आपत्तिजनक था। करीब 10 ऐसे अलग-अलग कानूनों को वित्त विधेयक में शामिल किया गया जिन्हें अन्यथा किसी भी तरह धन विधेयक का हिस्सा नहीं माना जा सकता था। सरकार का यह कदम देश के उच्च सदन की खुलेआम अवज्ञा थी। ऐसा करने का अर्थ यही था कि सरकार की नजर में इन जरूरी बदलावों के दौरान उच्च सदन यानी राज्य सभा की राय की कोई अहमियत ही नहीं थी। सरकार ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि राज्य सभा में उसका बहुमत नहीं है और वह वहां विधेयकों को आसानी से पारित नहीं करा सकती। बहरहाल, इस कदम के पीछे के राजनीतिक औचित्य को किसी भी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता। 
सरकार अपने पक्ष में यही दलील दे सकती है कि इन प्रस्तावित बदलावों में से कई वित्त मंत्री के बजट भाषण का हिस्सा थे इसलिए उनको वित्त विधेयक में शामिल करना गलत नहीं है। लेकिन यह दलील कमजोर है और इससे यह बात जायज नहीं हो जाती।
बहरहाल इससे तीन बातें एकदम स्पष्टï होकर उभरती हैं। पहला, इससे पता चलता है कि विपक्षी राजनीतिक दलों की तैयारी कितनी कमजोर है। दूसरा, इससे देश के नियामकीय संस्थानों की कमजोरी साबित होती है और तीसरा, इससे सरकार की एक मामूली ही सही लेकिन अपना आकार छोटा करने की कोशिश नजर आती है। हालांकि आकार छोटा करने की यह कवायद भी सामान्य से अलग है। आइए इन तीनों बिंदुओं पर करीबी दृष्टिï डालें। 
इन तमाम गैर वित्त विधेयकों में बदलाव लाने का इरादा तो सरकार ने फरवरी में वर्ष 2017-18 का बजट पेश करते समय ही जाहिर कर दिया था। सवाल यह उठता है कि तब से लेकर अब तक विपक्षी राजनीतिक दल क्या कर रहे थे जबकि इस दौरान संसद का सत्र भी चल रहा था? उनकी खामोशी ने सरकार को बजट के अंत के बाद कुछ और संशोधन शामिल करने का अवसर दिया। अगर विपक्ष सतर्क होता और मीडिया समेत नागरिक समाज ने चौकन्नापन दिखाया होता तो निश्चित तौर पर ऐसे गलत रुझान को रोकने में जरूरी मदद मिल सकती थी। 
यह भी याद रखने वाली बात है कि कई विधायी बदलाव जो वित्त विधेयक के पारित होने के बाद अमल में आएंगे उनकी बदौलत कम से कम आठ अलग-अलग पंचाटों का मौजूदा के साथ विलय हो जाएगा। इनमें से प्रत्येक पंचाट किसी न किसी क्षेत्र की नियामकीय व्यवस्था का हिस्सा है। ऐसे में आठ नियामकों का काम अब उनसे छीनकर अन्य पंचाट को सौंप दिया जाएगा। 
इससे कुछ पंचाटों पर स्वाभाविक रूप से काम का बोझ काफी बढ़ जाएगा। वहीं एक बात और गौर करने लायक है। नियामकों ने एक पंचाट का दूसरे में विलय किए जाने के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा है। उनकी ओर से कोई विरोध नहीं किया गया। सबसे बुरी बात यह है कि उन नियामकों की ओर से भी पूरी खामोशी देखने को मिल रही है जिनके पंचाट पर अब उक्त आठ पंचाटों का अतिरिक्त काम का बोझ लाद दिया गया है। कम से कम यह सवाल तो उठना ही चाहिए था कि क्या इस प्रस्तावित विलय का असर उनके काम पर नहीं पड़ेगा?
एक अधिक ताकतवर और सक्रिय नियामक क्या कर सकता है इसका अंदाजा कुछ वर्ष पहले की घटना से लगाया जा सकता है। उस वक्त सरकार वित्त विधेयक की मदद से आरबीआई अधिनियम में संशोधन करने से पीछे हट गई थी क्योंकि रिजर्व बैंक ने इसका विरोध स्पष्टï कर दिया था। यह बानगी एक तगड़े और कमजोर नियामक के 
बीच का अंतर समझने के लिए काफी है। 
एक और बात, आठ पंचाटों का मौजूदा पंचाट में विलय दिखाता है कि सरकार अपना आकार छोटा कर रही है। सरकार निश्चित तौर पर इन पंचाटों के कर्मचारियों समेत अपनी तमाम लागत कम कर रही है। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि इस कटौती का बड़ा असर न्यायपालिका पर ही होने जा रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि अधिकांश पंचाटों की अध्यक्षता सेवानिवृत्त न्यायधीशों के पास ही है और अब आठ पंचाटों के मौजूदा संस्थानों में विलय के बाद इन रिक्तियों में और अधिक कमी आएगी। 
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि इन तमाम नियुक्तियों के मामले में न्यायपालिका से मशविरा किया जाएगा लेकिन यह कोरा आश्वासन है क्योंकि प्रभावी तौर पर देखा जाए तो न्यायपालिका खुद नरेंद्र मोदी सरकार के उसका कद छोटा करने के प्रयास का शिकार हो गई है। जबकि नौकरशाही और नौकरशाहों की प्रधानता वाले संस्थान बच गए हैं जबकि न्यायपालिका की प्रमुखता वाले संस्थानों का आकार कमतर हुआ है।
Keyword: finance bill, general budget,
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