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जीएसटी में अनुपालन का अनावश्यक बोझ

श्यामल मजूमदार /  April 04, 2017

लोकसभा ने पिछले सप्ताह बुधवार को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से संंबंधित शेष विधेयकों पर हस्ताक्षर कर दिए। अब सरकार आजादी के बाद के सबसे बड़े सुधार को लागू करने के लिए तैयार है। धन विधेयक होने की वजह से इस पर राज्य सभा में चर्चा महज औपचारिकता ही थी।
उद्योग जगत अत्यंत उत्सुकता से इसकी प्रतीक्षा कर रहा है कि जीएसटी परिषद विशिष्ट उत्पादों को लेकर टैरिफ पर क्या निर्णय लेती है लेकिन एक क्षेत्र है जहां उद्योग जगत की स्थिति पहले से तय हो चुकी है। इसका संबंध मुनाफाखोरी रोकने से है। मुनाफाखोरी वह स्थिति है जहां कोई व्यक्ति किसी सीमित वस्तु से अत्यधिक लाभ हासिल करने की कोशिश करता है। हालांकि इसके खिलाफ बने प्रावधान बहुत ही अनिश्चित हैं और अगर कंपनियों को पूरा लाभ ग्राहक को देना पड़ा तो इससे कंपनियां अपनी आपूर्ति शृंखला में किफायती सुधार करने से पीछे हट सकती हैं। जिस अंतिम विधेयक को लोकसभा की मंजूरी मिली है उसमें मसौदा प्रावधान जस के तस रखे गए हैं।
सवाल बड़े होते जा रहे हैं। उदाहरण के लिए जीएसटी प्राधिकार कैसे साबित करेंगे कि मुनाफाखोरी की गई। जो भी सरकार को जमीनी स्तर पर इससे निपटने के लिए व्यापक दिशानिर्देश जारी करने होंगे। उदाहरण के लिए क्या मुनाफे का आकलन उत्पाद के स्तर पर होगा या संस्था के स्तर पर? क्या हर लागत के लिए यह विश्लेषण किया जाएगा या केवल प्रमुख मूल्यों के मामले में? 
कोई भी कंपनी जो मुनाफा कमाती है उसे दोषी ठहराया जा सकता है और उस पर यह इल्जाम लगाया जा सकता है कि कम कर दर और इनपुट क्रेडिट का लाभ ग्राहकों को नहीं दे रही। इस प्रक्रिया में मुनाफाखोरी रोकने की व्यवस्था न केवल कागजी कार्रवाई में जबरदस्त इजाफा कर सकती है बल्कि यह विवादों, आरोपों और शोषण आदि को बढ़ावा देने की वजह भी बन सकती है। ऐसे में कर दर में रियायत का लाभ उपभोक्ताओं को पहुंचाने की व्यवस्था करने के बजाय बेहतर होगा अगर बाजार व्यवस्था और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा पर भरोसा किया जाए। 
जीएसटी विधेयक के अनुबंध 171 (1) के अनुसार वस्तुओं या सेवाओं की आपूर्ति से जुड़ी कर दरों में किसी भी तरह की कमी या इनपुट कर क्रेडिट का कोई भी लाभ ग्राहकों तक पहुंचाया जाना चाहिए। ऐसा कीमत में कमी के जरिये किया जा सकता है। इस संबंध में वास्तव में क्या नियम कायदे और जुर्माना आदि तय किए गए हैं, यह अभी स्पष्टï नहीं है। इसकी वजह से अनिश्चितता बनी हुई है। 
सरकार का कहना है कि उसका उद्देश्य है कीमतों में छेड़छाड़ और गठजोड़ की प्रक्रिया को रोकना। हालांकि यह दलील ठीक नहीं लगती क्योंकि यह देखना तो प्रतिस्पर्धा आयोग का काम है और ऐसे में एक और प्राधिकार स्थापित करने की कोई जरूरत नहीं। 
वित्त मंत्री की इस बात से कोई मतांतर नहीं हो सकता है कि किसी को गैरवाजिब ढंग से पैसे नहीं कमाने चाहिए लेकिन इस गैरवाजिब अमीरी की व्याख्या का जिम्मा एकदम निचले स्तर के लोगों पर छोडऩे से प्रताडऩा की गुंजाइश बनी रहती है। उस लिहाज से देखा जाए तो उद्योग जगत में समाजवादी नियंत्रण और प्रताडऩा की वापसी को लेकर जो चिंता है वह काफी हद तक उचित है। माना जा रहा है कि मुनाफाखोरी रोकने के नाम पर कर अधिकारियों के हाथ और अधिक विशेषाधिकार आ जाएंगे। उद्योग जगत की एक शख्सियत के मुताबिक इस प्रावधान की कोई आवश्यकता नहीं थी। किसी निजी संस्थान के अनुचित लाभ को नियंत्रित करने का सबसे बेहतर तरीका है कि उस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ा दी जाए। 
पश्चिम बंगाल में सन 1958 से ही मुनाफाखोरी रोकने का कानून है। इसे पश्चिम बंगाल मुनाफाखोरी विरोधी अधिनियम कहा जाता है। इसका उद्देश्य भी वही है, अनुचित आय रोकना। आज भी इस कानून में नियमित रूप से संशोधन किए जाते हैं ताकि राज्य में मुनाफाखोरी अंकुश में रहे। इसके परिणाम त्रासद 
रहे हैं।
औद्योगिक नेताओं के मुताबिक जीएसटी के मुनाफाखोरी विरोधी प्रावधान विनिर्माताओं पर अनुपालन का बेजा बोझ बढ़ाएंगे। इससे बेवजह के विवाद पैदा होंगे। वे यह इशारा भी करते हैं कि किसी अन्य देश के जीएसटी में ऐसा पुरातन मुनाफाखोरी विरोधी कानून नहीं है। मलेशिया में जरूर इससे जुड़ा अनुभव बिल्कुल ठीक नहीं है। हकीकत में इससे विभिन्न वादों और शोषण के आरोपों में ही इजाफा हुआ है। मलेशिया ने मूल्य नियंत्रण और मुनाफाखोरी विरोधी नियमन 2014 का निर्माण किया और कई बड़ी कंपनियों पर नियम कायदे बदलने और मुनाफाखोरी करने का इल्जाम लगाया। डेलॉइट की एक रिपोर्ट के मुताबिक मलेशिया की सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि कारोबारी इस बदलाव की प्रक्रिया के दौरान उपभोक्ताओं का लाभ न उठाएं। वह यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि किसी कंपनी द्वारा किसी भी वस्तु की बिक्री से अर्जित लाभ जीएसटी के लागू होने के पहले के स्तर को पार न करे। 
परंतु नियमों के अधीन घरेलू व्यापार, सहकारिता और उपभोक्ता मंत्रालय (एमडीटीसीसी) के पास अदालत की राह लेने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है। अदालत में नियम तोडऩे वाले को जुर्माने की सजा और संभवत: कैद भी हो सकती थी मसला यह है कि नियम पालन करने का दायित्व पूरी तरह कारोबारियों पर था और कई मामलों में तो कारोबारियों के दोषी साबित होने के पहले ही 
उनके साथ दोषी की तरह व्यवहार किया जाने लगता। 
डेलॉइट ने कहा कि किसी कारोबार के लिए खुद को अदालत में बचाना मुश्किल है क्योंकि उसका नाम और उसके कथित कदम शीघ्र ही प्रचारित होने लगते हैं। इससे उसके ब्रांड को खासा नुकसान पहुंचता है। बाद में भले ही वह निर्दोष साबित हो। इसलिए अधिकांश कंपनियां मामले को यथासंभव निपटाने की कोशिश करती हैं, भले ही वे मूल्यवृद्घि को सही साबित करने की स्थिति में हों। 
इस आरोप से बचने का एक तरीका यह है कि किसी भी चरण में मूल्यवृद्घि न की जाए। लेकिन लागत बढऩे पर यह व्यावहारिक नहीं रह जाएगा। अंशधारक भी अपने निवेश पर अच्छा प्रतिफल चाहेंगे। देखना है भारतीय उद्योग किस दिशा में जाएगा? 
Keyword: GST, lok sabha,
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