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खुद नहीं करेंगे खेती तो लगेगा जीएसटी

सुदीप्त दे और संजीव मुखर्जी /  04 04, 2017

केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) विधेयक के मसौदे में 'खेतिहर' शब्द की परिभाषा में अहम बदलाव से अपने खेत में खुद खेती नहीं करने वाले जमीन मालिक अब जीएसटी कर के दायरे में आ गए हैं। यह विधेयक अभी संसद में विचाराधीन है। परिभाषा में बदलाव के बाद अब कीटपालन (रेशम कीट आदि) से जुड़े किसानों को भी नई जीएसटी प्रणाली के तहत पंजीकरण कराना पड़ सकता है। हालांकि यह बाद में ही पता चलेगा कि रेशम कीटपालन को जीएसटी के दायरे में लाने से रेशम साडिय़ों की कीमतें बढ़ेंगी या नहीं।
केंद्रीय जीएसटी (सीजीएसटी) के मसौदे में धारा 2 (8) में खेतिहर की परिभाषा में बदलाव किया गया है। इससे वे लोग या हिंदू अविभाजित परिवार जीएसटी के दायरे में आ जाएंगे जो अपने या भाड़े पर मजदूर लेकर खेती कराते हैं यानी खुद से काश्तकारी नहीं करते। पिछले साल नवंबर में पेश जीएसटी विधेयक के मसौदा प्रारूप में 'खेतिहर' उस व्यक्ति को मना गया है जो खुद खेती करता हो।
लक्ष्मीकुमारन ऐंड श्रीधरन में पार्टनर एल बद्री नारायण कहते हैं, 'सरकार खेतिहर की परिभाषा में केवल वास्तविक किसानों को ही शामिल करना चाहती है।' कर विशेषज्ञों का कहना है कि जो खुद खेती नहीं करते हैं, वे जमीन मालिक खेतिहर की परिभाषा के दायरे में नहीं आते। वे अपना खेत किसी दूसरे खेतिहर को देते हैं, जिसके बदले जमीन मालिक को फसल में हिस्सेदारी या नकद रकम मिलती है। खेतान ऐंड कंपनी में कार्यकारी निदेशक दिनेश अग्रवाल कहते हैं,'इस तरह स्वयं खेती न कर जमीन लीज पर देकर नकद रकम या फसल में हिस्सेदारी लेने वाले 
लोगों को इस पर जीएसटी का भुगतान करना होगा।'
ईवाई इंडिया में पार्टनर सत्य पोद्दार भी इस बात से सहमत हैं। वह कहते हैं, 'खेती के लिए लीज पर दी गई जमीन से मिलने वाली नकद रकम या फसल जीएसटी के तहत कर योग्य हो सकती है। हां, बाद में संशोधित कानूनों में इसे कर मुक्त रखा जाता है तो अलग बात है।' जानकारों का कहना है कि अपनी जमीन पर खुद से खेती नहीं करने वाले जमीन मालिक अगर बंटाईदारी या फसल साझेदारी या रकम के बदले अगर किसी और को अपने खेत देते हैं तो इसे नई कर प्रणाली के तहत सेवा की आपूर्ति माना जाएगा। लक्ष्मीकुमारन ऐंड श्रीधरन के नारायण कहते हैं कि हालांकि उन्हीं निष्क्रिय जमीन मालिकों पर जीएसटी लगेगा जिनकी बंटाईदारी या कृषि किराए से आय 20 लाख रुपए सालाना से अधिक होगी। जीएसटी पंजीकरण के लिए 20 लाख रुपये की सीमा है। पूर्वोत्तर राज्यों में यह सीमा 10 लाख रुपये है। 
पोद्दार जैसे ही कुछ दूसरे विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि उत्पादों को कर-मुक्त सूची में रखने से किसानों को कोई खास फायदा नहीं होगा। कृषि कार्य में इस्तेमाल होने वाली चीजों जैसे उर्वरक, बीज, ट्रैक्टर आदि को जीएसटी के तहत कर योग्य माना गया है। हालांकि कृषि उत्पाद मोटे तौर पर जीएसटी में नहीं रखे गए हैं, इसलिए किसान इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा करने की स्थिति में नहीं होंगे। पोद्दार कहते हैं, 'इससे अक्षमता पैदा होगी।' ज्यादातर जानकारों का मानना है कि सरकार आगे चलकर नियम बनाते समय  कृषि से किराये की आय को जीएसटी से बाहर रख सकती है। इसका कारण यह कि ऐसे किसी नियम का व्यापक असर होगा। 
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जमीन को पट्टïे पर देने का चलन पुराना है और इस समय जितनी जमीन पर खेती हो रही है उसमें आधी जमीन इसी श्रेणी में आती है। मसौदा सीजीएसटी विधेयक में खेतिहर की परिभाषा का दायरा छोटा करने से कीटपालन और चारागाह जैसी गतिविधियों को कृषि कार्य नहीं माना जा सकता। नारायण कहते हैं, 'लिहाजा कीटपालन में लगे किसी किसान को जीएसटी में पंजीकरण कराना होगा।' विशेषज्ञों का कहना है कि इससे रेशम उत्पादों आदि की कीमत पर फर्क पड़ सकता है। यह असर इस पर निर्भर करेगा कि इस पर दर कितनी रहती है? नारायणन का मानना है कि आगे चलकर 'जमीन पर खेती से प्राप्त उत्पाद' शब्द पर विवाद भी हो सकता है। वह सवाल उठाते हैं, 'क्या इसमें प्राथमिक या प्रत्यक्ष उत्पाद ही आएंगे या जिनिंग वाली कपास या तेल भी जिसकी आपूर्ति किसान कर सकते हों।' फिलहाल तो यह कहना मुमकिन नहीं है कि नई अप्रत्यक्ष कर प्रणाली कृषि क्षेत्र को किस तरह प्रभावित करेगी। 
 
Keyword: GST, farmer, definition,
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