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गेहूं की बंपर फसल का रास्ता साफ, रस्ट की समस्या होगी दूर!

सुरिंदर सूद /  April 03, 2017

गेहूं की फसल के विकास एवं शोध में लगे वैज्ञानिक लंबे समय से रस्ट (रतुआ) की समस्या से दो-चार होते आ रहे हैं। रस्ट गेहूं के पौधों में लगने वाली ऐसी खतरनाक बीमारी है जो फसल को 20 फीसदी से लेकर 80 फीसदी तक नुकसान पहुंचा देती है। कवक संक्रमण के चलते होने वाला यह रोग गेहूं की फसलों को बुरी तरह प्रभावित करता रहा है। हालांकि वैज्ञानिकों को कुछ हद तक रस्ट के संक्रमण को कम करने में कामयाबी मिली है लेकिन यह अंशकालिक समाधान ही साबित होता रहा है जिससे रस्ट दोबारा वापसी कर पाने में कामयाब हो जाता है। पौधों में लगा रस्ट या तो गेहूं की तमाम किस्मों की प्रतिरोधक क्षमता को प्रभावित कर देता है या प्रतिरोधक जीन से अधिक सशक्त रस्ट साबित होते हैं। 
लेकिन अब हमारे कृषि वैज्ञानिक रस्ट पर काबू पाने का एक ऐसा तरीका तलाशने के करीब पहुंच गए हैं जो प्रतिरोध के विभिन्न स्रोतों की पहचान से जुड़ा हुआ है। इसकी मदद से पत्तियों और तनों में लगने वाले रस्ट से गेहूं के पौधों को लंबे समय तक निजात मिल सकती है। इसके अलावा पत्तियों पर लगने वाले धब्बों से भी दीर्घकालिक राहत मिल सकती है। कृषि क्षेत्र में दुनिया की सबसे बड़ी अनुसंधान परियोजना से इस आविष्कार तक पहुंचा जा सका है। इस खासियत के चलते लिम्का बुक ऑफ रिकॉड्र्स में भी इसे जगह मिली है।
देश में हरित क्रांति लाने में अहम भूमिका निभाने वाली गेहूं की शुरुआती किस्मों को रस्ट के आगे हार माननी पड़ी थी जिसके चलते कुछ समय बाद ही उनका इस्तेमाल रोकना पड़ गया था। रस्ट की चपेट से गेहूं को बचाने के लिए उनके भीतर रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने की कोशिश की गई। लेकिन गेहूं की विभिन्न किस्मों को रस्ट के असर से बचाने के लिए की गई तमाम कोशिशें लंबे समय तक कारगर नहीं साबित हो पाईं। यही वजह है कि आज के समय में न केवल भारत बल्कि गेहूं की पैदावार से जुड़े सभी प्रमुख देशों में रस्ट एक गंभीर समस्या बन चुका है। 
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन ने जारी एक अलर्ट में कहा है कि रस्ट की वजह से दुनिया भर में गेहूं को गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। यहां तक कि पास्ता के लिए इस्तेमाल होने वाला ड्यूरम गेहूं भी रस्ट के हमले से नहीं बच पाया है। गेहूं की तीन प्रमुख किस्मों ट्राइटिकम एस्टिवम, टी ड्यूरम और टी डाइकोकम में से ड्यूरम को सबसे अधिक रोग प्रतिरोधक क्षमता से लैस माना जाता है लेकिन अब वह भी रस्ट की चपेट में आने लगा है।
रस्ट पर काबू पाना इसलिए भी मुश्किल हो जाता है कि रस्ट को जन्म देने वाले कवक हवा के जरिये एक जगह से दूसरी जगह पहुंच जाते हैं। जब गेहूं के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र उत्तरी मैदानों में गेहूं की फसल नहीं होती है तो रस्ट के रोगाणु प्यूसिनिया दक्षिण भारत में नीलगिरि और पालनी के पहाड़ी इलाकों में बोई जाने वाली गेहूं की फसल के सहारे खुद को जिंदा रखते हैं। जैसे ही गेहूं की फसल का अगला सीजन आता है, ये रोगाणु हवाओं के जरिये एक बार फिर उत्तर भारत के मैदानी इलाकों का रुख कर लेते हैं। प्यूसिनिया के इस चक्रमण पथ को बाधित करने के लिए गेहूं वैज्ञानिकों ने दक्षिण भारत के पहाड़ी इलाकों में गेहूं की रस्ट-प्रतिरोधी किस्मों की खेती को प्रोत्साहित करने की कोशिश की। लेकिन उसके बावजूद रस्ट की बीमारी पर अच्छी तरह काबू नहीं पाया जा सका है।
रस्ट पर लगाम के लिए राष्ट्रीय जीन बैंक की तरफ से एक और कोशिश की जा रही है। देश और दुनिया भर में गेहूं की 19,460 किस्मों के नमूने इस जीन बैंक में इक_ïा किए गए हैं और उनके अध्ययन से यह जानने की कोशिश की जाएगी कि किस किस्म के गेहूूं में रस्ट से लडऩे की क्षमता अधिक है? तमिलनाडु के वेलिंगटन, पंजाब के गुरदासपुर और पश्चिम बंगाल के कूच बिहार में इन किस्मों की स्क्रीनिंग कर जेनेटिक विश्लेषण किया गया। देश के अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले इन इलाकों में चलाए गए इस व्यापक शोध कार्य का मकसद सभी तरह के रस्ट से एक साथ लड़ पाने में सक्षम गेहूं की प्रजाति की पहचान करना था। इस शोध कार्य में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अलावा प्रमुख कृषि विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञ भी शामिल हुए। दिसंबर 2016 में इस शोध कार्य के नतीजे बहुविषयी शोध पत्रिका प्लस वन में प्रकाशित किए गए।
इस अध्ययन के दौरान पता चला कि 498 जेनेटिक किस्मों में विभिन्न तरह के रस्ट के प्रति रोग-प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो चुकी है जबकि 868 किस्में गेहूं की पत्तियों में होने वाले धब्बेदार रोग से लड़ सकती हैं। शिमला के फ्लावरडेल शोध संस्थान में गेहूं रस्ट के बारे में किए गए गहन परीक्षण के बाद रस्ट प्रतिरोधक क्षमता वाली किस्मों की संख्या 137 तक पहुंच गईं। वैज्ञानिक गेहूं की इन किस्मों में क्रोमोसोम की खास जींस की स्थिति का भी पता लगाने में सफल रहे। जींस की इस खास स्थिति के ही चलते गेहूं के पौधों में विभिन्न रस्ट से लडऩे की क्षमता पैदा होती है। इस जानकारी का इस्तेमाल करके गेहूं में खास जगह पर रस्ट के प्रति प्रतिरोधक क्षमता वाले जींस को रखा जा सकता है। इसके लिए परंपरागत या जैव-प्रौद्योगिकी तरीकों का सहारा लिया जा सकता है।
इस शोध के परिणामों ने गेहूं की पैदावार बढ़ाने की राह में बड़ी बाधा रहे रस्ट पर लगाम लगाकर नई किस्मों के ईजाद की राह तैयार कर दी है। अब यह जिम्मेदारी गेहूं के विकास में लगे वैज्ञानिकों पर आ गई है कि वे रस्ट-रोधी गेहूं की किस्में तैयार करें। इससे न केवल गेहूं की पैदावार में बढ़ोतरी होगी बल्कि किसान भी कम लागत से अधिक पैदावार वाली खेती कर अधिक कमाई कर पाने में सफल होंगे।
Keyword: wheat, rust, gene,
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