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निवेश के परिवेश पर किसका असर

सुबीर गोकर्ण /  April 03, 2017

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने जनवरी 2017 में विश्व आर्थिक पूर्वानुमान जारी किए थे। उनसे यही संकेत मिलता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था धीमी गति से सुधार की राह पर है। सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं और क्षेत्र वर्ष 2016 की तुलना में वर्ष 2017 और 2018 में कहीं तेज गति से विकसित होंगे। इनमें से कुछ की गति तो खासी उल्लेखनीय होगी। बहरहाल आने वाले कुछ सालों के लिए अपेक्षाकृत सकारात्मक संभावनाओं को इस बात से नुकसान पहुंचेगा कि वृद्घि की राह में कई ढांचागत बाधाएं भी हैं। ये लंबी अवधि के प्रदर्शन पर नकारात्मक असर डाल सकते हैं। इनमें से एक कारक है निवेश। 
वर्ष 2008 के वित्तीय संकट के पहले के वक्त में निवेश गतिविधियां वैश्विक वृद्घि में अहम योगदान कर रही थीं। विश्व बैंक ने जनवरी 2017 में इससे जुड़े संकेतकों के रुझान का ब्योरा पेश किया। उसके तीसरे खंड के मुताबिक वर्ष 2003 से 2008 के बीच पांच साल की अवधि में निवेश सालाना 12 फीसदी की दर से बढ़ा। वर्ष 2015 में यह दर घटकर 3.4 फीसदी रह गई। हकीकत में देखा जाए तो सन 2010 के बाद वृद्घि दर हर वर्ष घटती चली गई। 
फिलहाल निवेश की धीमी गति को समझने के लिए विभिन्न देशों में निवेश के मौजूदा स्तर और उसके दीर्घावधि के औसत से तुलना करके निकाला जा सकता है। वर्ष 2006 में जब यह निवेश चक्र अपने उच्चतम स्तर पर था तब कुल देशों में से करीब 70 फीसदी की निवेश संबंधी गतिविधियां सामान्य से ऊपर थीं। बाद में कमोबेश तमाम निवेश संबंधी अनुमान नकारात्मक रुझान के संकेत दिखाने लगे। 
इस गिरावट के लिए कई बातें जिम्मेदार हैं। पहली बात, हालांकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार आ रहा है लेकिन वृद्घि दर वित्तीय संकट के पहले तय की गई मानक दर के आसपास भी नहीं है। इस परिदृश्य में निवेश संबंधी गतिविधि का धीमा होना तय था। दूसरी बात, मौजूदा ऊर्जा और जिंस कीमतों के परिदृश्य में इन वस्तुओं का निर्यात करने वाले देशों में नई क्षमताओं में निवेश काफी कमजोर हुआ है। हाल के दिनों में जिंस कीमतों में कुछ तेजी आई है लेकिन वह मांग में सुधार की वजह से नहीं है। बल्कि वह तो निर्यातकों द्वारा आपूर्ति कम करने के परिणामस्वरूप हुआ है। यह नए निवेश के लिए अनुकूल स्थिति नहीं है। 
तीसरा कारक है कई देशों में वित्तीय क्षेत्र की स्थिति। निरंतर मौजूद परिसंपत्ति गुणवत्ता की समस्याओं और बढ़ी हुई पूंजी आवश्यकता ने वित्तीय तंत्र की जोखिम उठाने की क्षमता को बुरी तरह प्रभावित किया है। अगर मांग थी भी तो इस बात की संभावना कम ही है कि उसे पूरा करने के लिए पर्याप्त फंड मिल पाता। लेकिन मौजूदा हालात में फंडिंग की दिक्कतें निवेश की बाधा नहीं हैं। जब भी निवेश संबंधी गतिविधि जोर पकड़ेगी तब ये समस्याएं शुरुआत की प्रक्रिया को बाधित कर सकती हैं। 
दो अन्य कारक हैं जो इसमें योगदान दे सकते हैं। एक है अधिकांश पूंजी प्रोत्साहन वाले उद्योगों में अतिरिक्त क्षमता की मौजूदगी। हाल ही में यूरोपीय चैंबर ऑफ कॉमर्स इन चाइना ने चीन में 2016 में अतिरिक्त क्षमता नामक एक रिपोर्ट जारी की जो चीन में ऐसे तमाम उद्योगों की मौजूदगी के बारे में इशारा करती है। वर्ष 2008 से 2014 के बीच क्षमता के इस्तेमाल में काफी गिरावट आई है। उदाहरण के लिए इस्पात उद्योग में इसका स्तर 80 फीसदी से गिरकर 70 फीसदी हो गया है। चीन के इस्पात उद्योग में 84 करोड़ टन की स्थापित क्षमता है। यानी इसमें 8.4 करोड़ टन की कमी आई। यह भारत की कुल स्थापित इस्पात क्षमता के बराबर है। इसी प्रकार रिफाइनिंग से लेकर शी
शा और सीमेंट उद्योग तक हर जगह क्षमता के इस्तेमाल में गिरावट देखने को मिली। जाहिर है इन क्षेत्रों में किसी भी तरह का नया निवेश देखने को नहीं मिलेगा। चीन की सरकार ने तो उत्पादन क्षमता में कटौती करने की योजना पेश की। इसके तहत पुराने और गैरकिफायती संयंत्र बंद किए जाएंगे। जब तक ऐसा नहीं होता है तब तक निवेश का परिदृश्य यूं ही बना रहेगा। 
इनमें से दूसरा है साझा अर्थव्यवस्था का तेज गति से विकास। उबर और एयरबीएनबी जैसी कंपनियां एक ऐसी नीति का पालन कर रही हैं जिसे मैं क्षमता को उभारने का नाम दे सकता हूं। इस कारोबारी मॉडल के अस्तित्व में आने तक निजी वाहन और घरों आदि को वाणिज्यिक परिसंपत्ति नहीं समझा जाता था। लेकिन अब ऐसा ही है। अचानक टैक्सियों की तादाद बहुत बढ़ गई है और रुकने के ठिकाने भी। होटल और टैक्सी मालिक तेजी से अपने कारोबारी मॉडल पर पुनर्विचार कर रहे हैं। इतना ही नहीं उबर और एयरबीएनबी तो साझेदारी वाली व्यवस्था की केवल दो बानगी हैं। कई अन्य ऐसे कारोबार हैं जो विभिन्न क्षेत्रों में ऐसी क्षमता उभार रहे हैं और अधिक से अधिक किफायती तरीके अपनाकर खरीदारी और बिक्री को नया रूप दे रहे हैं। प्रश्न यह है कि जब पुरानी क्षमताएं मौजूद हैं तो नई क्षमताओं का इस्तेमाल क्यों?
नीतिगत दृष्टिï से देखें तो मूलभूत प्रश्न यह है कि निवेश गतिविधियों को बल कैसे मिलेगा। धीमी वृद्घि दर और जिंस कीमतों, तनावग्रस्त वित्तीय तंत्र और गैरजरूरती क्षमताओं के इस्तेमाल की बात करें तो निवेश के लिए एक अलग तरह का माहौल बनता है। यह स्पष्टï नहीं है कि केवल ब्याज दर और कर प्रोत्साहन जैसे पारंपरिक तरीके ही निवेश को बढ़ावा दे पाएंगे या नहीं। इससे एक प्रश्न यह पैदा होता है कि ऐसा करने के लिए कोई नीतिगत उपाय हैं भी या नहीं? 
इस बीच जहां नीति निर्माता भी इन सवालों से जूझ रहे हैं वहीं बुनियादी ढांचागत क्षेत्र की मूलभूत आवश्यकताएं और नियमन को सुसंगत करना तात्कालिक आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त बुनियादी क्षेत्र का निवेश और अधिक जोखिमभरा हो जाएगा अगर निजी निवेश में तेजी नहीं आई। ऐसे में हमें ऐसा वित्तीय ढांचा विकसित करना होगा कि जो जोखिम को झेल सके और उसका साझा कर सके। निवेश के कमजोर रुझान से इतर सरकार को ऐसे नीतिगत उपाय अपनाने चाहिए जो सुधार की प्रक्रिया को जरूरत के मुताबिक तेज कर सकें। 
(लेखक आईएमएफ में बांग्लादेश, भूटान, भारत और श्रीलंका के कार्यकारी निदेशक हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं। यह आलेख भारतीय प्रबंध संस्थान, अहमदाबाद से प्रकाशित होने वाले विकल्प में प्रकाशित एक बड़े आलेख का संक्षिप्त अंश है।) 
Keyword: IMF, world economic survey,
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