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फंसे कर्ज का हल करने की शीघ्र हो पहल : अरुंधती भट्टाचार्य

अनूप रॉय, अभिजित लेले और विशाल छाबड़िया / मुंबई April 03, 2017

बीएस बातचीत

गैर-निष्पादित आस्तियों (एनपीए) के मसले के समाधान की दिशा में कदम उठाए जाने के बावजूद यह लंबे समय से बैंकिंग क्षेत्र को परेशान कर रहा है। भारतीय स्टेट बैंक की चेयरमैन अरुंधती भट्टाचार्य ने कहा कि इस साल ठोस उपाय किए जाएंगे। अनूप रॉय, अभिजित लेले और विशाल छाबड़िया के साथ बातचीत में उन्होंने भविष्य की रणनीतियों और एसबीआई को दुनिया के शीर्ष 30 बैंकों में शामिल करने के लक्ष्य और फंसे कर्ज के निपटान पर चर्चा की। पेश हैं मुख्य अंश :

सहायक बैंकों के साथ विलय होने से एसबीआई दुनिया का 45वां सबसे बड़ा बैंक बन गया है। ऐसे में अगला कदम क्या होगा?

हमारी आकांक्षा अगले तीन साल में दुनिया के शीर्ष 30 बैंकों में शुमार होना है। बैंक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में संभावनाएं तलाशते हुए अपना विस्तार करेगा। मैं केवल आय में वृद्धि की ही संभावना नहीं देख रही हूं। मैं दक्षता, उत्पादकता और अनुपात में सुधार की बात कर रही हूं जो व्यापक बदलाव लाएगा। मुझे नहीं लगता कि बैंक के विकास के लिए हमें दूसरे बैंकों के अधिग्रहण पर विचार करना चाहिए। हम विलय के बाद अपनी बढ़ी हुई क्षमता का लाभ उठाएंगे और विस्तार के लिए व्यापक तौर पर डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी इस्तेमाल करेंगे।

एक साल पहले दबाव वाली संपत्तियों के निपटान की दिशा में बात आगे बढऩे की उम्मीद थी। लेकिन बहुत कुछ नहीं हो पाया। नए वित्त वर्ष में क्या उम्मीद है?

मैं चीजों के दुरुस्त होने को लेकर आश्वस्त हूं। लेकिन हमें थोड़ा इंतजार करना होगा। इस साल हम इस बारे में कोई निर्णय लेंगे। मुझे नहीं लगता कि हमें इसमें और देरी करनी चाहिए।

आपको नहीं लगता कि एनपीए के निपटान में देरी से बैंकों पर दबाव बढ़ रहा है?

आप इस बात से वाकिफ हैं कि हमारा एनपीए किस तरह का और कितना है। ऐसे में प्रावधान बढ़ेगा ही। ऐसे में यह बेहतर होगा कि हम इसका साथ-साथ समाधान भी करते चलें। हम जिस तरह की संपत्तियों या कर्ज के बारे में बात कर रहे हैं, उनमें कई काफी बड़े आकार के हैं। अगर उनमें सुधार होता है तो उनसे जुड़ी कई इकाइयां आसपास बढ़ती हैं। ऐसे में अगर उनका अस्तित्व ही निश्चित न हो तो आसपास के पारिस्थितिकी पर भरोसा डिग सकता है।

विभिन्न योजनाओं के बाद भी इसका समाधान नहीं हो पाया। एनपीए निपटान के लिए आदर्श समाधान क्या हो सकता है?

यह सच है कि भारत में निपटारा प्रक्रिया में काफी वक्त लगता है। राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट (एनसीएलटी) से अपार आशा जुड़ी हैं। लेकिन एनसीएलटी को इसके लिए थोड़ा समय की जरूरत होगी। पारिस्थितिकी को पूरा करने के लिए कई सहायक चीजों को लाना होगा और एनसीएल को प्रभावी बनाना होगा। निपटारा करने वाले पेशेवरों को प्रमाणित और पंजीकृत करना चाहिए। बैंकिंग प्रणाली में विभिन्न मॉडलों के मूल्यांकन का तंत्र की जरूरत है। समस्या यह है कि सामने आने वाले कई मॉडल तुलनीय नहीं हैं और विचार अलग-अलग हो सकते हैं, जो केवल बाहरी लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि बैंकरों के अंदर भी है। ऐसे में हमें निर्णय को लेकर सहमति बनाने के तरीकों पर विचार करना चाहिए और बैंकरों को पूरे आत्मविश्वास से निर्णय लेना चाहिए। उनसे बाद में सवाल तलब नहीं करने चाहिए क्योंकि यह विशुद्घ रूप से वाणिज्यिक आधार पर लिए जाते हैं। अगर उन्हें इस तरह की सहूलियत दी जाती है तो कई मामले निश्चित तौर पर निपटाए जा सकते हैं।

निजी क्षेत्रों का ज्यादातर विस्तार बैंकों की फंडिंग के जरिए हुआ है। प्रवर्तकों का इसमें काफी कम योगदान है। क्या ये चीजें आपको एनपीए के समाधान पर सख्त फैसले लेने से रोक रही है?

यह हमें रोक नहीं रही है। जब हम कर्ज बट्टे खाते में डाल रहे हैं तो हम इक्विटी में भी कमी ला रहे हैं। हमारे पास अभी समाधान की मजबूत व्यवस्था नहीं है। ऐसे में अगर आप प्रवर्तक के बिना कुछ करने की कोशिश करते हैं तो आपके पास मजबूती के साथ किसी को सामने खड़ा करने की क्षमता होनी चाहिए, जो संपत्ति ले और उसका संचालन करे। यह हमारी प्राथमिक क्षमता नहीं है। हम चाहते हैं कि सक्षम इकाइयां सामने आए और कंपनी का परिचालन करे। अगर ऐसा नहीं है तो आपको आनिवार्य रूप से प्रवर्तक के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करने की कोशिश करनी चाहिए कि रकम का सही इस्तेमाल किया गया। कोई भी समाधान हर तरह से फिट नहीं होता। 

डिजिटल बैंकिंग के साथ लागत घट रही है, लेकिन ग्राहक या कारोबारी को अभी भी लेनदेन की लागत के तौर पर अच्छी खासी रकम देनी पड़ रही है? 

स्पष्ट तौर पर कहूं तो यह मानसिकता का मसला ज्यादा है। अगर आप सुपरमार्केट जाएं तो वहां हर कोई मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) देता है। आम लोग वहां जाते हैं। क्या कोई एमडीआर देने से मना करता है? लोग ऐसा नहीं करते। मुझे लगता है कि यह छोटे कारोबारियों की मानसिकता है। हां, बदलाव हो रहे हैं। लेकिन अगर आपकी बिक्री बढ़ रही है तो स्वत: ही इसका ख्याल रखा जाता है। हमें यह शुल्क तय करने का मामला बाजार की शक्तियों पर छोड़ देना चाहिए। 

एसबीआई ने लाइबोर व 95 आधार अंकों पर बॉन्ड से रकम जुटाई है। यह उच्च रेटिंग वाले देशों के उच्च रेटिंग वाली कंपनियों से तुलनायोग्य है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में हमारी बीबीबी (-) रेटिंग हैं। क्या आपको लगता है कि रेटिंग में सुधार होना चाहिए?

यह सिर्फ एसबीआई ब्रांड के साथ नहीं है बल्कि देश के साथ भी। अगर आप किसी अंतरराष्ट्रीय निवेशक से बात करेंगे तो हमारे कई नागरिकों से ज्यादा उन्हें हमारे देश पर ज्यादा भरोसा है। विकसित या विकासशील देश में से कोई भी ऐसा नहीं है जो इस तरह के चक्र से न गुजरा हो। सरकार रेटिंग एजेंसियों से रेटिंग में सुधार के लिए कह रही है। लेकिन अगर वे अपनी स्थिति पर टिके हैं तो करने के लिए हमारे पास काफी कम गुंजाइश बचती है। भारत ने अभी तक किसी अंतरराष्ट्रीय देनदारी में चूक नहीं की है।
Keyword: एनपीए, बैंकिंग, अरुंधती भट्टाचार्य, एसबीआई, विलय, आय, अधिग्रहण, डिजिटल प्लेटफॉर्म,
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