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बैंकों के फंसे कर्ज की समस्या के हल में हैं राजनीतिक पेच

ए के भट्टाचार्य /  April 02, 2017

माना जाता है कि देश के वित्तीय क्षेत्र की गड़बडिय़ों ने दो खास चुनौतियों को जन्म दिया है जो एकदूसरे से संबंधित हैं। एकतरफ जहां फंसे हुए कर्ज की समस्या ने बैंकों की वित्तीय हालत खराब कर रखी है तो दूसरी और ढेर सारी कंपनियां ऐसी हैं जिन पर कर्ज का बोझ बढ़ता ही जा रहा है। खासतौर पर बुनियादी क्षेत्र की कंपनियां कर्ज में डूबी हैं और उनको इससे निपटने में खासी तकलीफ का सामना करना पड़ रहा है।
इसे भारतीय अर्थव्यवस्था की बैलेंसशीट की दोहरे घाटे की समस्या कहा जाता है। भारतीय कंपनियों का कर्ज में डूबा होना उनकी हालत को कमजोर तो करता ही है, साथ ही देश में निवेश के माहौल पर बुरा असर डालता है। बैंकिंग क्षेत्र की सेहत पर इसके नकारात्मक असर से हर कोई वाकिफ है। जब तक ये समस्याएं हल नहीं हो जाती हैं तब तक निवेश और वृद्घि में स्थायी सुधार मुश्किल है। 
फंसे हुए कर्ज की चुनौती से निपटने का एक तरीका है उन परियोजनाओं के प्रवर्तकों के खिलाफ उचित कदम उठाए जाएं जिनको ऋण दिया गया है। इससे निवेश का माहौल बेहतर होगा। साथ ही बैंकों को भी पुराने फंसे हुए कर्ज से निजात मिलेगी और वे नया ऋण देने पर विचार करेंगे। 
ये बातें सभी लोग जानते हैं। इस पर चर्चा हो चुकी है। इस सिलसिले में कई योजनाएं भी पेश की गई हैं लेकिन कुछ खास प्रगति नहीं हो सकी। देश की कंपनियां जस की तस कर्ज में डूबी हैं। देश के बैंक, खासतौर पर सरकारी बैंक इस समस्या में डूबे हैं। उन्होंने भी तमाम योजनाएं पेश कीं लेकिन सब बेकार। 
इस बीच सरकार और रिजर्व बैंक की नई योजना से उम्मीद जग रही है। यह योजना इस समस्या से निदान पाने का प्रयास करेगी। सरकार को अंदाजा है कि इन बैंकों के प्रबंधन अपनी ऋण पुस्तिका सुधारने के अनिच्छुक हैं। वे खराब ऋण को रियायत पर बेचने या ऋण न चुका पाने वाले प्रवर्तकों की परियोजनाओं की बिक्री की इच्छा नहीं रखते। नई योजना आरबीआई की मदद लेने की है ताकि वह कानूनन यह सुनिश्चित करे कि बैंक प्रबंधन कड़े फैसले लेकर अपना कर्ज कम करें। ऐसा करते हुए उनको कानून प्रवर्तन एजेंसियों या जांच का कोई डर भी नहीं होगा। 
नई नीति के सफल होने की संभावनाएं हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि यह पहला मौका है जब केंद्रीय बैंक से नियामकीय भूमिका निभाने को कहा जा रहा है। कुछ अस्पष्टï वजहों से अब तक सरकार यह उम्मीद कर रही थी कि केवल केंद्रीय बैंक की कुछ योजनाओं की मदद से फंसे कर्ज से निपटने के इस लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। लेकिन वह उपाय काम नहीं आया। अब केंद्रीय बैंक से कहा जा रहा है कि वह अधिक सक्रिय भूमिका निभाकर देनदारी चूकने वालों, बढ़ते कर्ज और फंसे हुए कर्ज से निपटने के कदम उठाए। अब बैंकों को तेजी से कदम उठाने होंगे। ऐसे कदम फंसी हुई संपत्ति की नीलामी, देनदारी चूकने वालों पर जुर्माने आदि की दिशा में बढ़ सकते हैं। इस पहल का नेतृत्व आरबीआई के हाथ रहेगा।
यह कदम राजनीतिक दृष्टिï से भी समझदारी भरा नजर आ रहा है। नरेंद्र मोदी सरकार बैंकों के फंसे हुए कर्ज के मुद्दे पर इसलिए हड़बड़ी नहीं दिखा रही थी क्योंकि उसे डर था कि ऐसे किसी कदम को कारोबारियों के हित में माना जा सकता था। उसने वर्ष 2013 के भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास विधेयक में बदलाव की कोशिश की थी तो उस पर ऐसे ही आरोप लगे थे कि वह कारोबारियों की मदद के लिए ऐसा कर रही है। तब सरकार को अपना कदम वापस लेना पड़ा। मोदी सरकार को 'सूटबूट की सरकारÓ कहकर पुकारा गया। 
तब से अब तक सरकार ऐसे कदम उठाने से बचती रही है जिनको कारोबारियों या अमीरों का मददगार माना जा सकता है। यही वजह है कि बड़ी कंपनियों के लिए निगमित कर की दर में प्रस्तावित कटौती अभी घोषित नहीं की गई है। इसके बजाय सालाना 50 लाख रुपये से अधिक आय वाली कंपनियों के लिए दर बढ़ा दी गई है। जबकि इस अवधि में कम आय वाले वर्ग की दरें कम की गई हैं। इसी तरह सरकार बैंकों के फंसे हुए कर्ज के मोर्चे पर भी सामने नहीं आना चाहती थी क्योंकि यह कदम भी कारोबारियों के हित में जाता दिखेगा। ध्यान देंगे कि फिलहाल जिस कदम की बात की जा रही है वह आरबीआई के अधीन उठाया जाएगा। ऐसे में सरकार सामने नहीं आएगी। इसका उसके लिए गलत राजनीतिक परिणाम नहीं होगा। 
लगभग ऐसी ही राजनीतिक वजहों से ही वित्तीय क्षेत्र की दूसरी चुनौती का भी कोई शीघ्र हल निकलता नहीं दिख रहा है। यह चुनौती सरकारी बैंकों की कमजोर वित्तीय सेहत से जुड़ी है। फंसे हुए कर्ज के निपटान से इन बैंकों की कुछ मदद होगी लेकिन उनमें से कई वित्तीय स्तर पर इतने अधिक कमजोर हैं कि उनको अहम बदलाव की आवश्यकता है। इसके लिए उनका एक बेहतर बैंक में विलय किया जा सकता है या ऐसे बैंक को बंद किया जा सकता है। दुर्भाग्यवश सरकार द्वारा फिलहाल ऐसी कोई योजना शुरू करने की संभावना अत्यंत कम है। 
जिन तीन सरकारी बैंकों की हालत सबसे खस्ता है वे सभी पश्चिम बंगाल के हैं। राज्य में तृणमूल कांग्रेस का शासन है। भाजपा आने वाले दिनों में यहां अपनी छाप छोडऩा चाहती है और ऐसे में बैंक बंद करने के फैसले से बड़ी तादाद में लोग बेरोजगार होंगे। यह निर्णय केंद्र सरकार की लोकप्रियता पर असर डालेगा और तृणमूल कांग्रेस को अवसर देगा कि वह अपने समर्थकों को भाजपा के खिलाफ भड़का सके। ऐसे में मोदी सरकार वहां इस तरह के कदम उठाने से बचेगी। 
लब्बोलुआब यह कि आरबीआई के नेतृत्व में होने वाली पहल देश के कारोबारी क्षेत्र के लिए मददगार हो सकती है और उसका कुछ बैंकों पर भी सकारात्मक असर होगा। परंतु वित्तीय रूप से कमजोर सरकारी बैंकों की समस्या बनी रहेगी और उनमें पूंजी डालने से कोई हल नहीं निकलने वाला। 
Keyword: bank, debt, companies,
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