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इंदिरा गांधी के सांचे में ढलते दिख रहे हैं नरेंद्र मोदी?

मुद्रा मंत्र
सुबीर रॉय /  March 31, 2017

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करियर को लेकर जबरदस्त साम्यता देखी जा सकती है। हालांकि दोनों के करियर जहां एकसमान नहीं हैं, वहीं उनमें जो समानता है उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। इंदिरा गांधी ने कांग्रेस पार्टी को दोफाड़ कर अपनी स्थिति मजबूत की और पुराने नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया। पुराने नेता चाहते थे कि इंदिरा उनके हाथों कठपुतली बनकर रहें। मोदी ने ऐसा कुछ नहीं किया है लेकिन उन्होंने भारतीय जनता पार्टी ( भाजपा) के तमाम दिग्गज नेताओं को किनारे जरूर लगा दिया है। प्रधानमंत्री बनने के बाद जमीनी समर्थन के साथ राष्टï्रीय नेता के रूप में अपना कद मजबूत करने की कोशिश में इंदिरा गांधी ने ऐतिहासिक गरीबी हटाओ कार्यक्रम की शुरुआत की। इसके चलते वह गरीबों की चहेती बनंी। मोदी ने 2014 का आम चुनाव विकास को मुद्दा बनाकर जीता। इससे उनकी अपील का दायरा व्यापक हुआ तमाम युवाओं और आकांक्षी लोगों ने उन्हें वोट दिया। यह मतदान जाति और धर्म से परे जाकर किया गया।
इंदिरा गांधी ने न केवल गरीबों को खुश किया बल्कि उन्होंने प्रिवी पर्स की व्यवस्था समाप्त करके अमीरों के खिलाफ उनकी नाराजगी का भी फायदा उठाया। राजा-महाराजाओं से यह अधिकार भी छीन लिया गया कि वे खुद को राजा कह सकें। मोदी ने भी नोटबंदी की मदद से गरीबों की सहानुभूति बटोरने का ठीक वैसा ही काम किया है।
सरकार ने इसकी आधिकारिक वजह भले ही काले धन से लड़ाई बताई है लेकिन यह निर्णय क्यों किया गया यह सत्य अब तक सामने नहीं आ सका है। लेकिन इसे गरीबों के मन में यह भाव पैदा हुआ कि सरकार ने उनके हित में यह निर्णय किया है क्योंकि इससे अमीरों के पास जमा भारी संपत्ति उजागर हुई। मेरा सामना गरीब तबके के ऐसे तमाम लोगों से हुआ जिनका कहना था कि वे कष्ट सहने को तैयार हैं क्योंकि इससे अमीरों के पास जमा काला धन निकल जाएगा। इनमें तमाम घरेलू सहायक और वाहन चालक आदि शामिल थे।
इंदिरा गांधी ने जो कांग्रेस के साथ किया और जो कुछ मोदी भाजपा के साथ कर रहे हैं उसमें ढेर सारी बात साझा है। इंदिरा गांधी ने पार्टी नेतृत्व को पूरी तरह समाप्त कर दिया और पार्टी को पूरी तरह अपने अधीन कर लिया। राज्यों के नेता पूरी तरह उनकी इच्छा के गुलाम सदृश हो गए थे। नोटबंदी ने भाजपा के समर्थक माने जाने वाले कारोबारी वर्ग को प्रभावित किया। छोटे से लेकर बड़े कारोबारी तक अपना काफी कारोबार नकद में करते आए थे। ये सब नोटबंदी के असर से बच नहीं सके।
हालिया उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से निकले तमाम नेताओं ने भाजपा का रुख किया। भाजपा ने उनमें से कई को टिकट ही नहीं दिया बल्कि जीतने वाले कई नेताओं को तो प्रदेश सरकार में मंत्री भी बनाया गया है। इसका भाजपा के उन स्थानीय नेताओं पर क्या असर हुआ होगा जिनकी मेहनत बेकार गई? भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं ने अनौपचारिक बातचीत में स्वाभाविक तौर पर यह माना कि भाजपा भी अब अपने आलाकमान से संचालित है। ठीक वैसे ही जैसे कांग्रेस इंदिरा गांधी के अधीन थी।
न्यायपालिका से निपटने का इंदिरा गांधी का तरीका भी इस तुलना में अहम है। उस वक्त सर्वोच्च न्यायालय में ऐसे न्यायाधीशों की भरमार की गई जो उनके प्रति प्रतिबद्धता रखते थे। वहीं मोदी के लिए हालांकि अभी शुरुआती दौर है लेकिन मुख्य न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहड़ की नियुक्ति और उसके बाद के दो शुरुआती फैसले यह बताते हैं कि इससे मोदी सरकार की राह कुछ आसान हुई है।
पहला, वरिष्ठ न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी प्रक्रिया ज्ञापन जो लंबे समय से लंबित था उसे ऊपरी अदालत ने मंजूरी दे दी है। दूसरा, अदालत ने कांग्रेस की उस याचिका को निरस्त कर दिया जिसमें उसने गोवा में राज्यपाल द्वारा कांग्रेस के बजाय भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने पर सवाल उठाया था। गोवा में कांग्रेस सबसे बड़ा दल बनकर उभरी थी। फली नरीमन ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि कानून और पुरानी नजीरों की उनकी समझ यह कहती है कि किसी भी राज्य के राज्यपाल का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह सबसे बड़े दल के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करे।
न्यायमूर्ति खेहड़ की नियुक्ति से ठीक पहले अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने उनसे कहा था कि वह बिड़ला-सहारा भुगतान मामले की सुनवाई न करें। इस मामले में मोदी पर भी आरोप था कि उन्होंने गुजरात में मुख्यमंत्री पद पर रहते भुगतान हासिल किया था। भूषण ने कहा था कि खेहड़ को हट जाना चाहिए क्योंकि उनकी पदोन्नति की फाइल प्रधानमंत्री के समक्ष है। इस पर खेहड़ ने भूषण की बातों को गलत और आतर्किक करार दिया था। चूंकि इस संबंध में कोई निर्णायक जानकारी नहीं है इसलिए कुछ नहीं कहा जा सकता है कि मोदी उच्च न्यायपालिका को अपने अनुकूल बनाने का प्रयास कर रहे हैं या नहीं।
गांधी और मोदी के बीच सबसे बड़ा अंतर धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर है। गांधी आपातकाल लगाने के लिए जानी जाती हैं और उनमें तानाशाही प्रवृत्ति थी लेकिन वह धर्मनिरपेक्षता को लेकर एकदम अडिग थीं। मोदी के साथ ऐसा नहीं है। उन पर आरोप है कि उन्होंने सांप्रदायिक कार्ड खेला और 2002 के दंगे हो जाने दिए। उसके बाद उन्होंने गुजरात में विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सीमित भी किया। मोदी ने यह संकेत दिया कि वह सांप्रदायिक कार्ड भी खेल सकते हैं और जरूरत पडऩे पर उसे त्याग भी सकते हैं। हालिया उत्तर प्रदेश चुनावों में हिंदू मतों का एकीकरण देखने को मिला। इसके बाद योगी आदित्यनाथ को प्रदेश का मुखिया बना दिया गया। इनमें से पहला कदम तो मोदी का विचार रहा होगा लेकिन क्या दूसरे के लिए उन पर दबाव डाला गया?

Keyword: Prime minister, narendra modi, indira gandhi,
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