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ट्रंप की व्यापार नीति का क्या है असली लक्ष्य?

दीपक लाल /  March 31, 2017

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की व्यापार नीति का लक्ष्य चीन की बढ़त पर अंकुश लगाना है, न कि मुक्त व्यापार को त्यागना। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं दीपक लाल
ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने के निर्णय (ब्रेक्सिट) और अमेरिका में ट्रंप प्रशासन के अस्तित्व में आने के बाद कई लोग यह कह रहे हैं कि उदार अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था का खात्मा हो सकता है। ऐसा कहने वाले लोगों में से अधिकांश विदेश व्यापार को लेकर चिंतित हैं। परंतु विडंबना यह है कि ब्रिटेन यूरोपीय संघ जैसे संरक्षणवादी कारोबारी समूह से बाहर होकर पूरी तरह मुक्त व्यापार को आजमाना चाहता है। साथ ही अमेरिका में ट्रंप प्रशासन ने बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था की आलोचना की है। मैं पहले ही बेक्सिट पर लिखे अपने लेखों में एकपक्षीय मुक्त व्यापार के पक्ष में दलील पेश कर चुका हूं। ब्रिटेन सरकार के ताजा दस्तावेजों से भी यही प्रतीत होता है कि अगर ब्रेक्सिट कामयाब होता है तो वह यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार की ओर अग्रसर होने का प्रयास होगा। अगर ऐसा नहीं हो सका तो वह यूरोपीय संघ के अधीन शेष विश्व के साथ मौजूदा विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अधीन कारोबार करेगा।
लेकिन ट्रंप प्रशासन का क्या? मैं अपने करियर के अधिकांश वक्त मुक्त व्यापार का हिमायती रहा हूं। इसलिए मुक्त व्यापार पर ट्रंप के हमले मुझे गहरे तक परेशान करते हैं। इसलिए क्योंकि वे आधुनिक व्यापार सिद्घांतों के खिलाफ जाते हैं। ऐसे में उनकी यह उम्मीद कि संरक्षण देने से गिरती अमेरिकी अर्थव्यवस्था को सहारा मिलेगा, सही नहीं है। बल्कि उनका यह सोचना ठीक वैसा ही है जैसे विकासशील देशों के छोटे-मोटे उद्यमों के संरक्षण की कवायद की गई थी। दोनों ही मामलों में संरक्षणवाद का विचार घरेलू मूल्य व्यवस्था की विसंगति पर आधारित था जिससे निपटने के लिए उचित घरेलू कर और सब्सिडी ही सबसे बेहतर उपाय हैं। संरक्षण तो विसंगति से निपटने का सबसे खराब तरीका है क्योंकि इसकी वजह से कई तरह की अन्य विसंगतियां भी सामने आती हैं। ये आगे चलकर और कमजोर आर्थिक कल्याण की ओर ले जा सकती हैं। अगर उत्पाद ठीक नहीं हों तो मूल घरेलू विसंगति से निपटने के लिए घरेलू सब्सिडी की व्यवस्था भी काम नहीं आएगी क्योंकि वे सब्सिडी हासिल करने के लिए तमाम ऐसी घरेलू सब्सिडी को सामने ला सकते हैं जिनका अस्तित्व ही नहीं हो। इसकी वजह से नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। यही वजह है कि 19वीं सदी में मुक्त व्यापार का संयुक्त अंगीकरण जरूरी बताने वाली मेरी दलील आज भी मौजूं है।
इसी प्रकार राष्ट्रपति और उनके व्यापार सलाहकार पीटर नवारो द्वारा अमेरिकी व्यापार घाटे को आर्थिक रूप से नुकसानदेह बताने वाले वक्तव्य और उनकी व्यापार नीति से उसे खत्म करना आर्थिक दृष्टि से बुद्घिमतापूर्ण कदम नहीं होगा। राष्ट्रीय आय लेखा के हिसाब से किसी कंपनी का घाटा पारिभाषिक रूप से उसकी घरेलू बचत और निवेश के बीच के असंतुलन से स्पष्टï होता है और इसे व्यापार नीति से हल नहीं किया जा सकता। सिक्के का दूसरा पहलू पूंजी खाता है जो पूंजी की आवक को दर्ज करता है जो समान अधिशेष होगी। पूंजी की यह आवक आर्थिक दृष्टिï से लाभदायक है। नवारो इस बात को स्वीकार करते हैं लेकिन उनकी दलील है कि पूंजी की आवक अमेरिकी सरकार को अवांछित राजकोषीय घाटे से निपटने में मदद करती है।
इतना ही नहीं यह विदेशियों को अमेरिकी परिसंपत्तियों में बढिय़ा हिस्सेदारी की इजाजत भी देता है। उनकी चिंता है कि अगर उक्त खरीदार कोई रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी निकला तो वह बहुत तेजी से अमेरिकी कंपनियों, तकनीक, खेत, खाद्य आपूर्ति शृंखला आदि को खरीद सकता है और देश के रक्षा-औद्योगिक क्षेत्र पर भी नियंत्रण कायम कर सकता है। वह इसे खरीद के जरिए जीत का नाम देते हैं। संरक्षणवाद के पक्ष में यही  उनकी सबसे बड़ी दलील है। ऐसा रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी कौन हो सकता है? जाहिर है चीन। क्या वाकई ऐसा कोई खतरा है या फिर यह कपोल कल्पना है?
दुर्भाग्यवश जैसा कि मैं पहले भी अपने स्तंभ में कह चुका हूं राष्ट्रपति शी चिनफिंग द्वारा अपने पूर्ववर्ती तंग श्याओ फिंग की शांतिपूर्ण उभार की नीति का त्याग कर देने और उनकी चीन का स्वप्न पूरा करने की आकांक्षा के बीच इसे केवल कल्पना नहीं माना जा सकता। अब वह अपना पुराना कद हासिल करना चाहता है जहां वह एक ताकतवर राष्टï्र हो और अन्य एशियाई मुल्क उसके अधीन। 19वीं सदी के अफीम युद्घ के पहले हालात वैसे ही थे। पश्चिमी ताकतों ने उस वक्त चीन को ध्वस्त कर दिया। पश्चिम को लगा था कि तंग द्वारा उदारवादी व्यवस्था को अपनाने और चीन का वैश्विक अर्थव्यवस्था में एकीकरण करने से अमेरिका की उदार अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था मजबूत होगी और चीन भी जापान और जर्मनी के तर्ज पर एक मजबूत कारोबारी सहयोगी राज्य के रूप में उभरेगा। उसका बढ़ता मध्यवर्ग लोकतांत्रिक बनेगा।
परंतु ऐसा नहीं हुआ। जैसा कि एडवर्ड लुटवक ने अपनी किताब द राइज ऑफ चाइना वर्सेज द लॉजिक ऑफ स्ट्रैटेजी में कहा है, चीन अपनी प्राचीन आक्रामक राजनीति की ओर लौट रहा है। इस दौरान विदेशियों से निपटने के लिए जिस उक्ति का इस्तेमाल किया जाता था वह थी आर्थिक निर्भरता। इसका विकास नोमाड शियॉग्नू योद्वाओं के साथ 140 साल तक चली लड़ाई के दौरान हान शासकों ने किया था। शियॉन्गू आत्मनिर्भर थे लेकिन उनको हान द्वारा उत्पादित वस्तुओं पर निर्भर बना दिया गया। पहले ये वस्तुएं नि:शुल्क दी गईं लेकिन बाद में उनको सेवा के बदले दिया जाने लगा। यह बात चीन की विदेशी आर्थिक नीति में अब तक महसूस की जा सकती है। पुराने रेशम मार्ग को नए सिरे से विकसित करने की कोशिश इसका नया उदाहरण है।
लुटवक ने यह भी ध्यान दिया कि हान वंश का इतिहास बताता है वे गैर हान की तुलना में कहीं अधिक चतुर भी थे। अमेरिका को ऐसी ही गैर हान श्रेणी में रखा जा सकता है। इसकी पुष्टिï इस बात से भी होती है कि चीन ने उसके उदय को अमेरिका द्वारा किसी भी तरह नहीं रोके जाने को गहरे विस्मय से देखा। बल्कि उसने तो चीन के तेज आर्थिक विकास में एक तरह से सहयोग ही किया। लेकिन डॉनल्ड ट्रंप ने अमेरिकी राष्टï्रपति पद संभालते ही जिस तरह ताइवान के राष्टï्रपति से फोन पर बात की उससे चीन के खिलाफ उनका रुख कमोबेश साफ हो गया। ऐसा लगा कि वह एक चीन नीति की अमेरिकी स्वीकार्यता पर प्रश्न उठा सकते हैं। इस दृष्टिï से देखें तो ट्रंप की व्यापार नीति को चीन का विरोध करने की नीति के रूप में देखा जा सकता है। पीटर नावारो ने ऐसी कई अनुशंसाएं की हैं जिनके आधार पर भविष्य में अमेरिका चीन को रोक सकता है। उनकी बदौलत बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था को तगड़ा झटका लगना तय है।

Keyword: America, donald trump, China, Trade policy,
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