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नारद स्टिंग से ममता की छवि पर उठने लगे सवाल

ईशिता आयान दत्त /  03 30, 2017

पश्चिम बंगाल की राजनीति में तहलका मचा देने वाले नारद स्टिंग ऑपरेशन से सवालों के घेरे में आ गई ममता की भूमिका
तृणमूल के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप
तृणमूल के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप

शारदा (2003): 2500 करोड़ रुपये के वित्तीय घोटाले के सिलसिले में तृणमूल के कई सांसदों और विधायकों के साथ पूछताछ हुई और कुछ को गिरफ्तार किया गया
रोज वैली (2014): 15,000 करोड़ रुपये के वित्तीय घोटाले मेंं तृणमूल के 2 सांसद सीबीआई हिरासत में
नारद (2016): एक वीडियो फुटेज में तृणमूल के कई सांसदों और विधायकों को कथित रूप से धन लेते दिखाया गया है। फिलहाल सीबीआई इसकी जांच में जुटी

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी अपने बयानों और फैसलों से हमेशा दूसरों को चौंका देती हैं। हाल ही में जब कलकत्ता उच्च न्यायालय ने नारद स्टिंग मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को शुरुआती जांच का आदेश दिया। नारद स्टिंग ऑपरेशन में तृणमूल के मंत्रियों और सांसदों को पैसे लेते हुए दिखाया गया है। न्यायालय के आदेश से गुस्साई ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि न्यायपालिका और केंद्र सरकार आपस में मिले हैं।

कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले के तुरंत बाद ममता ने कहा, 'मैं न्यायपालिका का पूरा सम्मान करती हूं लेकिन तथ्य यह है कि न्यायालय का आदेश वही है जिसका भाजपा के एक नेता ने अनुमान लगाया था। भाजपा का एक प्रदेश अध्यक्ष कैसे यह घोषणा कर सकता है कि उत्तर प्रदेश चुनावों के बाद सीबीआई मामले की जांच करेगी। इस स्टिंग ऑपरेशन को सबसे पहले भाजपा कार्यालय में दिखाया गया था।'

उच्चतम न्यायालय ने  भी सीबीआई जांच पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। ममता ने इसका स्वागत किया और इसे सकारात्मक फैसला बताया। कहीं कुछ गलत है? दोनों अदालतों के फैसलों में बुनियादी फर्क सीबीआई को प्राथमिक रिपोर्ट दाखिल करने में दिया गया समय है। उच्च न्यायालय ने जहां 72 घंटे का समय दिया था वहीं उच्चतम न्यायालय ने एक महीने का समय दिया है।

राजनीतिक विश्लेषक सव्यसाची बसु रायचौधरी का कहना है कि एक महीना लंबी अवधि है और इससे तुलनात्मक लाभ भी हो सकता है। उनका कहना है कि इससे तृणमूल को केंद्र में भाजपा के साथ मोलभाव का समय मिल सकता है। इनमें राष्टï्रपति चुनाव, तीस्ता जल बंटवारा और राज्य सभा में मुद्दों पर आधारित समर्थन शामिल है। मणिपुर में तृणमूल के एकमात्र विधायक ने अचानक भाजपा को सरकार बनाने के लिए समर्थन दिया है। तृणमूल की भाजपा के साथ बढ़ रही नजदीकी उसके लिए परेशानी खड़ी कर सकती है। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने तृणमूल पर निशाना साधना शुरू कर दिया है और पार्टी मोदी भाई दीदी भाई के नारे बुलंद कर रही है।

ममता को पश्चिम बंगाल में मुसलमानों का निर्बाध समर्थन हासिल है। राज्य की कुल आबादी में मुसलमानों की संख्या 27 फीसदी है। रायचौधरी ने कहा, 'इस बात की संभावना नहीं है कि भाजपा पश्चिम बंगाल में अपने पैर नहीं पसारेगी। हो सकता है कि तत्काल ऐसा न हो लेकिन वह राज्य में एक ताकत है। तृणमूल कांग्रेस की लोकप्रियता को होने वाले किसी भी नुकसान का फायदा भाजपा को ही होगा।' तो फिर अगर तृणमूल के कुछ नेताओं की गिरफ्तारी होती है तो क्या इससे पार्टी के भविष्य पर असर होगा? अगले साल होने वाले पंचायत चुनावों में पार्टी की असली परीक्षा होगी।

ग्रामीण बंगाल में भय का माहौल है। वाममोर्चा सरकार के दौर में भी ऐसा ही था और तृणमूल के समय में भी स्थिति बदली नहीं है। फर्क केवल इतना है कि ग्रामीण बंगाल में अक्सर लोगों का गुस्सा स्थानीय तृणमूल नेता के खिलाफ होता है और ममता की ईमानदार छवि बरकरार है। यही तृणमूल की ताकत है।

इसके साथ ही ममता हमेशा खुद को पीडि़त के तौर पर पेश करती हैं। उन्होंने नोटबंदी के खिलाफ देशव्यापी अभियान की अगुआई की थी। इसके लिए उन्होंने अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल से भी हाथ मिलाया। नारद स्टिंग मामले में उच्च न्यायालय के फैसले के बाद ममता ने कहा कि अगर भाजपा पश्चिम बंगाल को लक्ष्य बनाती है तो उनकी पार्टी पूरे देश को लक्ष्य बनाएगी। संभवत: नोटबंदी ही एकमात्र मुद्दा था जिसमें वह जनता के मिजाज को भांपने में नाकाम रहीं। बाकी सभी मुद्दों पर उन्हें जनता का समर्थन मिला है। वर्ष 2011 के बाद से तृणमूल ने हर चुनाव में बेहतर प्रदर्शन किया है।

नारद वीडियो फुटेज पिछले साल मार्च के मध्य में आया था। उसी महीने उत्तरी कोलकाता में विवेकानंद फ्लाईओवर के ढहने से 26 लोगों की मौत हुई। इनसे राज्य में वसूली रैकेट की कलई खोलकर रख दी जो तृणमूल के दौर में चरम पर पहुंच गया है। लेकिन इसके एक महीने बाद हुए विधानसभा चुनावों में तृणमूल की धमाकेदार जीत हुई। तब तक लोग शारदा घोटाले को लोग भूल चुके थे जिसमें तृणमूल के कई सांसदों से पूछताछ हुई और कई गिरफ्तार हुए।

रायचौधरी ने कहा, 'मतदाताओं के साथ ऐसा होता है वे भ्रष्ट और ईमानदार में अंतर नहीं कर पाते। मतदाता सक्षम भ्रष्टï और अक्षम भ्रष्टï के फर्क को समझता है।' अफसरशाहों का कहना है कि इस प्रकरण से ममता की छवि पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उनका कहना है कि ममता फीनिक्स पक्षी की तरह है जो राख से फिर उठ खड़ा होता है। वर्ष 2006 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को केवल 33 सीटें मिली थीं और पांच साल बाद वह सत्ता पर काबिज होने में कामयाब रहीं। इस मामले से भी वह पार पा जाएंगी।

Keyword: west bengal, mamta banerjee, narada sting,
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