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कामगारों में असंतोष की वजह पर आत्ममंथन की जरूरत

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  March 30, 2017

जुलाई 2012 की एक देर शाम को मारुति के मानेसर संयंत्र में 3,000 से अधिक कर्मचारियों ने प्रशासनिक खंड के भीतर जमकर उत्पात मचाया। ये कर्मचारी इस बात से खफा थे कि प्रबंधन ने उनके एक साथी को नौकरी पर बहाल करने से इनकार कर दिया था। इस कर्मचारी को एक सुपरवाइजर के साथ मारपीट करने के कारण निलंबित किया गया था। इस हंगामे के एक दिन बाद पुलिस को मुख्य इमारत की पहली मंजिल से एक शव मिला। शव इतनी बुरी तरह जला हुआ था कि दांत के रिकॉर्ड से ही इसकी पहचान हो पाई। वह मारुति के मानेसर संयंत्र के महाप्रबंधक (मानव संसाधन) अवनीश कुमार देव थे।
शव परीक्षण रिपोर्ट के मुताबिक देव को लोहे की छड़ों से पीटा गया था और संयंत्र के प्रशासनिक खंड में उन्हें जिंदा जलाने के लिए बेहोशी की हालत में छोड़ दिया गया था। अन्य 25 अधिकारियों के साथ भी मारपीट हुई थी लेकिन वे देव से ज्यादा भाग्यशाली थे। उन्हें समय रहते पास के एक अस्पताल में आपातकालीन वार्ड में भर्ती कराया गया। देव की जघन्य हत्या का अचानक भड़की हिंसा का परिणाम नहीं थी, जैसा कि श्रमिक संगठन के कुछ नेताओं द्वारा दावा किया जा रहा था। यह एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा थी। यह स्पष्टï था कि कुछ समय से मारुति प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच तनावपूर्ण स्थिति चल रही थी। दरअसल कर्मचारी घटना से करीब एक साल पहले हड़ताल पर चले गए थे। इसे खत्म करने के लिए एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ था। कई कर्मचारी इस समझौते की कई शर्तों को लागू करने में प्रबंधन की नाकामी से नाराज थे।
देव के हत्यारों को हाल ही में करीब पांच साल बाद सजा मिली। यह भारत में औद्योगिक हिंस्सा के सबसे बदतर मामलों में से एक था। लेकिन यह एकमात्र घटना नहीं थी। इससे पहले 22 सितंबर 2008 को वाहनों के कलपुर्जे बनाने वाली इटली की कंपनी ग्रेजिआनो ट्रांसमिशनी की भारतीय इकाई के मुख्य कार्याधिकारी को 200 कर्मचारियों ने मौत के घाट उतार दिया था। एक अन्य घटना में सितंबर 2009 में प्राइकोल के उपाध्यक्ष (मानव संसाधन) की गुस्साए कर्मचारियों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। एक साल बाद वाहनों के कलपुर्जे बनाने वाली कंपनी एलायड निप्पॉन के सहायक महाप्रबंधक की कर्मचारियों ने पत्थर मारकर हत्या कर दी। मार्च 2011 में ग्रेफाइट इंडिया की इकाई पाउमेक्स स्टील के उप महाप्रबंधक (संचालन) की गाड़ी को क्रोधित कर्मचारियों ने आग लगा दी जिससे उनकी मौत हो गई।
ये घटनाएं आपराधिक कृत्य हैं और कभी-कभार ही होती हैं लेकिन सच्चाई यह है कि भारतीय कंपनियों में श्रमिकों के बीच असंतोष और हिंसा की घटनाएं पिछले कुछ वर्षों में बढ़ी हैं। इनमें से ज्यादातर घटनाएं अनुबंध पर काम करने वाले श्रमिकों के रोष के कारण हुईं जिन्हें बहुत कम वेतन मिलता है। इस साल फरवरी में ओमेक्स ऑटो में 351 अस्थायी कर्मचारियों को नौकरी से हटा दिया गया था। इनमें से एक कर्मचारी ने आत्महत्या कर ली थी।
आखिरकार जब किसी कंपनी में बड़ी संख्या में ठेके पर काम करने वाले या अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी कर्मचारियों की तुलना में बहुत कम वेतन दिया जाता है तो कर्मचारियों के बीच मतभेद होना लाजिमी है। इन अस्थायी कर्मचारियों की स्थिति अक्सर बहुत दयनीय होती है।
भारत के कुल कामगारों में ठेके पर काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या करीब 30 फीसदी है। विनिर्माण क्षेत्र की कंपनियों में तो यह संख्या करीब 40 फीसदी है। इनमें ऊर्जा और यूटिलिटी, सीमेंट और ऑटोमोबाइल प्रमुख हैं। नवंबर, 2014 में सरकार ने प्रशिक्षु कानून में संशोधन कर नियोक्ताओं को काम के घंटे तय करने जैसे मामलों में ज्यादा आजादी दे दी। अलबत्ता मजदूर संगठनों का कहना है कि इन संशोधनों ने कंपनियों के लिए पूर्णकालिक कामगारों के बजाय प्रशिक्षुओं की सेवाएं लेना आसान बनाया है।
इसलिए जब फिक्की के एक सर्वेक्षण में हड़ताल, बंद और असंतोष को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा जोखिम बताया है तो इसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं थी। यह पिछले साल के सर्वेक्षण के परिणामों से पूरी तरह भिन्न था जिसमें भ्रष्टïाचार, रिश्वतखोरी और कॉर्पोरेट धोखाधड़ी को सबसे बड़ा जोखिम बताया गया था। हड़ताल और बंद में 95,297 मजदूर शामिल रहे जिससे काम के 445,986 दिनों का नुकसान हुआ।
निश्चित रूप से बड़ी समस्या देश में नौकरियों की कमी है। भारत में हर साल एक करोड़ लोग नौकरी के बाजार में उतरते हैं। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) ने फरवरी की अपनी रिपोर्ट में इस मुद्दे को उठाया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में बढ़ती कामगारों की फौज के लिए बहुत बहुत कम गुणवत्तापूर्ण नौकरियां पैदा हो रही हैं जिससे कई लोग बेरोजगार बैठे हैं, बहुत कम वेतन पा रहे हैं या फिर श्रम शक्ति से बाहर हैं। रोजगारी की दर घटी है और संगठित क्षेत्र में वर्ष 2010 के बाद नौकरियों की संख्या में कमी आई है।
इसका सबसे बड़ा कारण दक्षता की कमी है। सच्चाई यह है कि आधे से अधिक नियोक्ता कई बार इस बात को कह चुके हैं उन्हें प्रतिभाओं की कमी के कारण उन्हें कर्मचारियों की भर्ती करने में मुश्किल हो रही है। यह बात समझ में आती है क्योंकि कुल कामगारों में से केवल 4.7 फीसदी को ही औपचारिक दक्षता प्रशिक्षण मिला है। सरकार और भारतीय उद्योग जगत को इस मुद्दे पर कुछ कड़ा आत्ममंथन करने की जरूरत है।

Keyword: Maruti Suzuki, Superviser, workers,
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