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बढ़ता प्रतिफल और बाजार की हलचल

आकाश प्रकाश /  March 30, 2017

चीन का तेजी से बढ़ता कॉर्पोरेट ऋण अनुपात वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए लगातार चिंता का विषय बना हुआ है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं आकाश प्रकाश
बाजार के मौजूदा परिदृश्य में कमोबेश हर निवेशक को लग रहा है कि वैश्विक वृद्धि में तेजी आ रही है, मुद्रास्फीति की दर बढऩी शुरू हो रही है और डॉलर मजबूत होने जा रहा है। डॉनल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के साथ ही निवेशकों ने यह मानना शुरू कर दिया कि वह कर दरों में कटौती करेंगे, बुनियादी खर्च को बढ़ाएंगे और लालफीताशाही पर लगाम लगाएंगे। माना यह गया कि अमेरिका सरकार का एजेंडा कारोबार समर्थक होगा और अमेरिका की वृद्धि दर में इसके चलते इजाफा देखने को मिलेगा।
इसका एक स्वाभाविक परिणाम बॉन्ड प्रतिफल में हो रही बढ़ोतरी के रूप में देखा जा सकता है। अगर वृद्धि दर और मुद्रास्फीति दोनों में तेजी आती है तो बॉन्ड प्रतिफल बढ़ेगा। ऐसा बीते कुछ वर्ष के दौरान अपनाए गए अप्रत्याशित मौद्रिक समायोजन और अपारंपरिक ब्याज दर नीति के कारण अधिक है। अमेरिका में 10 वर्ष की अवधि का प्रतिफल बढ़कर 2.6 फीसदी हो चुका है। कुछ टीकाकारों का अनुमान है कि नॉमिनल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के झुकाव के चलते दरों में तेजी से इजाफा हो सकता है और वे 3 से 5 फीसदी तक पहुंच सकती हैं। वहीं 35 वर्ष की अवधि वाले बाजार में तेजी समाप्त नजर आ रही है।
इन सब बातों से इतर बढ़ते प्रतिफल का आर्थिक वृद्धि पर भी निश्चित असर पडऩा तय है। ऋण अनुपात और शुद्ध ऋण का स्तर दुनिया भर में बढ़ा हुआ है। ऐसे में बढ़ते बॉन्ड प्रतिफल को लेकर आर्थिक वृद्धि की संवेदनशीलता भी चरम पर रहेगी। बढ़े हुए ऋण का यह गणित उच्च दरों के साथ मेल नहीं खाएगा क्योंकि सर्विसिंग की लागत ऐसे स्तर पर पहुंच सकती है जहां वह मंदी को जन्म दे सकती है। क्या बॉन्ड प्रतिफल में मौजूदा 100 आधार अंकों का इजाफा आर्थिक वृद्धि में पलीता लगाने के लिए पर्याप्त है? हमें किस स्तर पर चिंता करनी आरंभ कर देनी चाहिए? अगर बढ़ते प्रतिफल और बढ़ती वृद्धि तथा मुद्रास्फीति के संबंधों के चलते वृद्धि में ठहराव आ जाता है तो तेज वृद्धि और मुद्रास्फीति के चक्र का अंत हो जाएगा। बीसीए ने इस क्षेत्र में कुछ रोचक काम किया है और इस नतीजे पर पहुंची है कि बढ़ता प्रतिफल अल्पावधि में कोई मुद्दा नहीं है।
वे यह स्वीकार करते हैं कि वैश्विक स्तर पर ऋण का स्तर अपने उच्चतम शिखर पर है। वर्ष 2007 से वैश्विक ऋण में 40 फीसदी का इजाफा हुआ है और वह जीडीपी के 250 फीसदी से ऊपर निकल गया। कर्ज के स्तर को देखते हुए आकलन किया जा सकता है कि ऋण चुकाने की लागत में 100-200 की आधार अंकों की बढ़ोतरी से बहुत चिंतित करने वाली परिस्थितियां निर्मित हो सकती हैं। ऋण चुकाने की लागत पर नकदी की आवक का असर खपत और निवेश दोनों को नुकसान पहुंचा सकता है। अमेरिका में मंदी की बात कहने वाले तमाम लोग यह अनुमान लगा रहे हैं कि बाजार अभी संभावित वृद्घि को लेकर जरूरत से अधिक अनुमान लगा रहे हैं। जबकि तेजी के हिमायती यह समझ पाने में नाकाम हैं कि नकदी की आवक बढ़ती ब्याज दर को प्रभावित करेगी। बीसीए के मुताबिक ये आकलन अत्यधिक सामान्यीकृत हैं और इसका असर कहीं अधिक गहरा होने वाला है। बीसीए ने अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ और जापान के आंकड़ों का अध्ययन करके यह बात कही है।
उनका आकलन इस तथ्य पर आधारित है कि डेट सर्विसिंग का बोझ आज 2007 से भी कम है। दरों में कमी ने बढ़ते कर्ज को काफी हद तक काबू में रखा है। सर्विसिंग का शुरुआती बिंदु अत्यंत कम है। दूसरी बात ऋण की परिपक्वता के रुझान से पता चलता है कि दरों के बढ़कर हकीकत में सर्विसिंग की लागत को प्रभावित करने में अभी काफी वक्त लगेगा। कॉर्पोरेट ऋण की परिपक्वता अवधि 5 से 12 वर्ष होती है और अधिकांश सरकारों ने अपनी ऋण परिपक्वता अवधि को 10 वर्ष से अधिक कर रखा है। आम लोगों की बात करें तो उनका 90 फीसदी कर्ज तयशुदा दर पर है। यह उन्हें अल्पावधि में ब्याज दर के उतार-चढ़ाव से बचाता है।
वे यह भी कहते हैं कि आज भी तमाम जगह ऋण की औसत लागत मौजूदा ब्याज दर से कहीं अधिक है। इस लिहाज से देखा जाए तो जब इस ऋण का स्थान मौजूदा स्तर पर नया ऋण लेगा तो उसे चुकाने की लागत कम होगी।
उपरोक्त कारकों पर देखें तो पता लगता है कि अगर ब्याज दरें तत्काल 100 आधार अंक बढ़ जाएं तो भी वह ऋण लेने वालों को किसी भी तरह नुकसान नहीं पहुंचाएगा क्योंकि आने वाले दो-तीन साल तक नकदी आवक बेअसर रहेगी।
इस तरह देखा जाए तो ऋण चुकाने की लागत काफी हद तक पिछले चक्र के समान ही होगी और इसका बोझ पहले के मुकाबले कम होगा। नुकसान तभी होगा जबकि अचानक 300 आधार अंकों तक की बढ़ोतरी दरों में कर दी जाए।
हम इस बात पर सहमत हैं कि बॉन्ड बाजार में तेजी का दौर समाप्त होने को है लेकिन तत्काल प्रतिफल में 300 आधार अंकों की बढ़ोतरी दूर की कौड़ी है। तमाम बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अभी भी मुद्रास्फीति की दर बहुत अधिक नहीं है और बॉन्ड की आपूर्ति बैंक ऑफ जापान और यूरोपीयन सेंट्रल बैंक की बदौलत सीमित होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी बॉन्ड की निवेशकों के लिए उपलब्धता वर्ष 2017 में 750 अरब डॉलर कम हो जाएगी। वर्ष 2016 में इसमें 546 अरब डॉलर की कमी आ चुकी है। क्वांटिटेटिव ईजिंग जारी रखने और ब्याज दर के स्तर को लेकर दोनों बैंकों का निर्देशन भी दुनिया भर में बॉन्ड प्रतिफल को नियंत्रित रखने का काम करेगा।
वित्तीय संकट के बाद ऋण बढ़ा लेकिन ऐसा नहीं लगता कि उसे चुकाने की लागत वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगी। अगर ब्याज दरों में 100 आधार अंक का इजाफा हो जाए तो भी ऋण चुकाने की लाग में मामूली इजाफा ही होगा। ब्याज और जीडीपी का अनुपात भी वर्ष 2007 के स्तर के भीतर ही रहेगा।
कई स्तरों पर ट्रंप के विचार के अनुरूप रिफ्लेशन कारोबार (जहां कर कम हों, मुद्रा आपूर्ति का स्तर परिवर्तनशील हो और ब्याज दरें कम हों, ) की संभावना सीमित नजर आती है लेकिन कारोबारी व्यवस्था बढ़ती दरों के कारण प्रभावित नहीं होगी। ऐसा केवल तभी हो सकता है जब दरें उम्मीद से एकदम परे बहुत अधिक बढ़ जाएं।
इन सब के बीच में केवल चीन ही आड़े आ सकता है। वहां ऋण का आंकड़ा वाकई में भयभीत करने वाला है। खासतौर पर कॉर्पोरेट ऋण। वर्ष 2008 में जीडीपी के 100 फीसदी से बढ़कर फिलहाल वह 170 फीसदी हो चुका है। अभी चीन के बारे में विस्तृत विश्लेषण करने के लिए पर्याप्त आंकड़े हमारे पास मौजूद नहीं हैं लेकिन यह स्पष्टï है वह अन्य विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कहीं अधिक संवेदनशील है। चीन और उसका कारेाबारी ऋण विश्व अर्थव्यवस्था के लिए तकलीफ का विषय बना हुआ है। अगर वहां कुछ नकारात्मक हुआ तो उससे सारी दुनिया प्रभावित होगी।

Keyword: China, market, Corporate debt ratio, investors,
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