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जोखिम बरकरार

संपादकीय /  March 30, 2017

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की अगली दोमाही मौद्रिक नीति समीक्षा आगामी 5-6 अप्रैल को होगी। गत 8 फरवरी को पिछली समीक्षा बैठक के बाद एमपीसी ने नीतिगत ब्याज दरों को 6.25 फीसदी पर स्थिर रखकर बाजार को चौंका दिया था। समिति ने कहा था कि वह देश की विकास दर पर नोटबंदी के प्रभाव और मुद्रास्फीति के गुणागणित के स्पष्टï होने की प्रतीक्षा कर रही है। सरकार के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने के बाद आरबीआई ने औपचारिक तौर पर मुद्रास्फीति को निशाना बनाने वाले केंद्रीय बैंक का रूप अख्तियार कर लिया है। एमपीसी 2 फीसदी के विचलन को मान्य करते हुए 4 फीसदी मुद्रास्फीति दर को लक्षित कर मौद्रिक नीति तैयार करती है। फरवरी महीने की खुदरा महंगाई की दर 3.65 फीसदी थी, जबकि जनवरी में यह 3.17 फीसदी रही थी। इन आंकड़ों से भी यही पता लगता है कि एमपीसी का पिछली समीक्षा में यह सोचना सही था कि मुद्रास्फीति में थोड़ा बहुत इजाफा संभव है।
सवाल यह है कि क्या मुद्रास्फीति को लेकर जिस जोखिम का अनुमान लगाया गया था वह फरवरी से अब तक कुछ कम हुआ है। पहली बात तो यह मानने की कोई वजह ही नहीं है कि यह सही है। हकीकत में इसका उलटा सच है। नोटबंदी के कारण मांग में आई कमी ने नवंबर से फरवरी के दौरान मुद्रास्फीति पर असर डाला।
अर्थव्यवस्था में नकदी बहाल करने की धीमी गति जाहिर तौर पर मांग पर सकारात्मक असर डालेगी। इसका असर कीमतों में भी नजर आएगा।
इतना ही नहीं मूल उपभोक्ता महंगाई जिसमें खाद्य और ईंधन क्षेत्र को आकलन से बाहर रखा जाता है, वह फरवरी में 5 फीसदी के करीब रही। इसका इस्तेमाल मूल्य परिवर्तन के स्तर और अनुमान का आकलन करने के लिए किया जाता है। इस बीच मौसम का अनुमान लगाने वाले स्काईनेट ने वर्ष 2017 के मॉनसून का अपना पहला अनुमान इस सप्ताह जारी कर दिया। उसने कहा कि इस वर्ष बारिश का स्तर सामान्य से कम रह सकता है। इसके अलावा उसने यह सुझाव भी दिया कि अधिकांश बारिश पूर्वाद्र्घ में होगी। उसके बाद काफी लंबी अवधि तक सूखा रह सकता है। ऐसे में खाद्य मुद्रास्फीति में इजाफा देखने को मिल सकता है। यह बात फरवरी की तुलना में कहीं अधिक चिंतित करने वाली है।
इस बीच वैश्विक अर्थव्यवस्था में हो रहा धीमा सुधार कच्चे तेल और अन्य जिंसों की कीमतों में नजर आने लगा है। भारत कच्चे तेल और जिंसों का शुद्घ आयातक है। ऐसे में वह वैश्विक स्तर पर मूल्य में होने वाले उतार-चढ़ाव को लेकर संवेदनशील है। कच्चे तेल की कीमतों में जहां जनवरी से अब तक 6 फीसदी की कमी आई है वहीं पेट्रोलियम उत्पादक देश उत्पादन में कटौती का अपना समझौता आगे बढ़ा सकते हैं। नाइजीरिया और लीबिया जैसे देश जो इस समझौते से बंधे नहीं हैं उन्होंने भी उत्पादन में कमी करना शुरू कर दिया है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों का भविष्य अनिश्चित है।
घरेलू स्तर पर देखें तो नोटबंदी के बाद मांग में सुधार आने पर उत्पादक कुछ लागत ग्राहकों पर डाल सकते हैं। इस बीच वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी का खुदरा महंगाई पर क्या असर होगा यह अभी स्पष्टï नहीं है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो हालात में बहुत अधिक सुधार होने की बात नहीं कही जा सकती है। कुछ ऐसे संकेतक हैं जो बताते हैं कि मुद्रास्फीति का जोखिम बढ़ा है। इन कारकों के आधार पर नतीजे निकाल के देखें तो कहा जा सकता है एमपीसी शायद ही फरवरी की मौद्रिक नीति के रुख में कोई बदलाव करे।

Keyword: RBI, monetary policy, interest rates,
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