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दक्षिणपंथ के उभार से संजीवनी की कोशिश में 'उदार' मीडिया

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  March 29, 2017

क्या डॉनल्ड ट्रंप और उनकी दक्षिणपंथी सोच ने दुनिया भर में उस नुकसान की भरपाई कर दी है जो इंटरनेट के चलते समाचार मीडिया को उठाना पड़ा था? रिपोर्ट के मुताबिक सीएनएन को वर्ष 2016 में एक सामान्य चुनाव वर्ष की तुलना में 10 करोड़ डॉलर अधिक कमाई होने का अनुमान है। गत वर्ष की अंतिम तिमाही में न्यूयॉर्क टाइम्स के डिजिटल उपभोक्ताओं की संख्या भी 276,000 की बढ़ोतरी के साथ 18.5 लाख तक पहुंच गई। यह 2013 और 2014 के संयुक्त आंकड़ों से भी अधिक है। न्यूयॉर्क टाइम्स के 2011 में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जाने के बाद से यह उसकी सबसे अच्छी तिमाही रही है। अमेरिका के अलावा ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों में भी ऐसा ही रुझान दिख रहा है। दर्शकों-पाठकों की घटती संख्या और राजस्व में कमी से परेशान समाचारपत्रों, पत्रिकाओं और केबल नेटवर्क के लिए दक्षिणपंथी भावनाओं का उभार किसी अच्छी खबर की तरह सामने आया है।
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के जॉन नॉटन इंटरनेट के विकास और समाज पर उसके प्रभाव के बारे में गहरा अध्ययन करते रहे हैं। उन्होंने इस पर कई किताबें और शोधपत्र भी लिखे हैं। नॉटन कहते हैं, 'मैं उदार शब्द के इस्तेमाल को लेकर थोड़ा सशंकित हूं। अमेरिका में आज उदार कहे जा रहे अधिकांश समाचार संगठनों ने इराक युद्ध का समर्थन किया था। मेरा मानना है कि दक्षिणपंथी लोकप्रियतावाद के उभार से कुछ समय मुख्यधारा मीडिया को अस्थायी लाभ मिलेगा लेकिन दीर्घकालिक तौर पर इसकी गिरावट शायद जारी रहेगी।'
लंदन की सिटी यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता के प्रोफेसर जॉर्ज ब्रॉक भी इस राय से सहमत हैं। वह कहते हैं, 'अमेरिका और यूरोप में राजनीतिक झंझावातों से भरे साल ने कुछ स्थानों पर न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे कुछ उदार मीडिया संगठनों को लाभ पहुंचाया है। लेकिन इस प्रवृत्ति का सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता है। मेरा मानना है कि यह एक अस्थायी दौर है। दरअसल जब भी कुछ ऐसा घटित होता है जिसके बारे में कभी सोचा न गया हो तो लोग उसके बारे में अधिक जानकारी के लिए उदार दिखने वाले प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों की ओर रुख करते हैं।'
पिछले साल नॉटन ने द गॉर्डियन में प्रकाशित एक लेख में लोकतांत्रिक राजनीति पर इंटरनेट के प्रभाव की पड़ताल की थी। उसमें नॉटन ने कहा था कि इंटरनेट का लोकतांत्रिक राजनीति पर शुरुआती असर बराक ओबामा के चुनाव अभियान में लाखों लोगों से चंदा जुटाने और मतदाताओं को लामबंद करने के दौरान देखा गया था। अरब देशों में तानाशाही सरकारों के खिलाफ लोगों के गुस्से को आवाज देने में भी इंटरनेट की अहम भूमिका रही। नॉटन अपनी किताब 'पॉलिटिकल टब्र्युलेंस: हाऊ सोशल मीडिया शेप कलेक्टिव ऐक्शन' की सह-लेखिका और ऑक्सफर्ड इंटरनेट इंस्टीट्यूट की प्रोफेसर हेलेन मार्गेट्स के विचारों का भी हवाला देते हैं। मार्गेट्स का कहना है कि इंटरनेट के आने से राजनीतिक गतिविधियों से जुडऩे की लागत काफी कम हो गई है जिससे एक नई तरह की हुड़दंगी और अप्रत्याशित राजनीति का आविर्भाव हुआ है। ट्रंप ने इस हुड़दंग का फायदा उठाने के लिए इंटरनेट को 'उत्तर-सत्य राजनीति' का सशक्त माध्यम बना दिया है।
जहां तक भारत का सवाल है तो यहां पर इंटरनेट बिना किसी प्रस्तावना के अचानक ही हुड़दंगी राजनीति की तरफ बढ़ चला है। अब भारत में किसी व्यक्ति के बारे में झूठ प्रचारित-प्रसारित करने या किसी को बलात्कार और हिंसा की धमकी देने के पहले लोग ज्यादा विचार नहीं करते हैं। भारत के राजनीतिक दलों के लिए इंटरनेट कारगर और खतरनाक हथियार बन चुका है। अगर आपको यह पता करना हो कि सत्तारूढ़ दल किस तरह से सोशल मीडिया का इस्तेमाल कवच की तरह कर रहा है तो स्वाति चतुर्वेदी की किताब 'आई एम ए ट्रोल' पर एक नजर डाल लीजिए। लेकिन भारत के संदर्भ में एक रोचक पहलू यह है कि ऐसी राजनीति के उभार के बावजूद भारत में मीडिया कारोबार पर कोई खास असर नहीं पड़ा है। समाचारपत्र, टेलीविजन या इंटरनेट माध्यमों के विकास के आंकड़े पहले जैसे ही हैं। हालांकि इसने बहस को पहले से अधिक ध्रुवीकृत कर दिया है जिससे ड्राइंग रूम और टीवी स्टूडियो में एक तरह की विद्रूपता आ गई है।
लेकिन इस विद्रूपता के खिलाफ उदार मीडिया को सशक्त करने का काम केवल उन्हीं देशों में हुआ है जहां पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने वाले सशक्त संस्थागत आधार मौजूद हैं। अमेरिका के अलावा यूरोप के भी कुछ देशों के लिए यह बात कही जा सकती है। लिहाजा मुख्यधारा के मीडिया को 'विपक्ष' की तरह देखने वाला राष्ट्रपति होने के बावजूद अमेरिका का मीडिया काफी हद तक अपना काम बिना किसी भय के करता है। आप अमेरिकी चैनलों पर जॉन ओलिवर या स्टीफन कोल्बर्ट के शो देखेंगे तो वे ट्रंप का मजाक उड़ाते हुए नजर आ जाएंगे। वैसे एक भारतीय पत्रकार के तौर पर शायद आपको अचरज होगा कि इतना कुछ करने के बावजूद इनमें से किसी के खिलाफ आयकर विभाग का कोई छापा क्यों नहीं पड़ा या प्रवर्तन निदेशालय ने कोई नोटिस क्यों नहीं भेजा या फिर इन लोगों पर राष्ट्रवाद-विरोधी होने के आरोप क्यों नहीं लगे हैं? या तो आप उनकी तरह काम कीजिए या फिर सरकार के नजरिये के मुताबिक खुद को सेंसर कर लीजिए। भारतीय मीडिया का एक हिस्सा उसी रवैये पर चल रहा है।
पश्चिमी देशों के मीडिया के बारे में ब्रॉक कहते हैं, 'प्रसार में बढ़ोतरी उन्हीं देशों में देखने को मिल रही है जहां सरकार की तरफ से नकेल कसने का खतरा काफी कम है। लेकिन अगर यूरो धराशायी हो जाता है, शरणार्थी समस्या गंभीर होती जाती है और आतंकी हमले आगे भी जारी रहते हैं तो राजनीतिक परिदृश्य भी बदलेगा। उस समय तुर्की की तरह तानाशाही प्रवृत्ति वाली सरकारें नापसंदगी के आधार पर काम कर सकती हैं। दरअसल तानाशाही व्यवस्था उदार पत्रकारिता को पसंद नहीं करती है।' ऐसा लगता है कि पश्चिमी देशों के मीडिया के प्रसार में बढ़ोतरी केवल तात्कालिक ही है।

Keyword: Right wing, Media, TV, news,
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