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बुनियादी ढांचा क्षेत्र के समक्ष दोहरी समस्या

विनायक चटर्जी /  March 29, 2017

बुनियादी ढांचा क्षेत्र अभी भी दोहरी बैलेंस शीट की समस्या का शिकार है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं विनायक चटर्जी

देश में फंसे हुए कर्ज की समस्या ने लगातार नीति निर्माताओं की रातों की नींद उड़ा रखी है। आर्थिक समीक्षा में इस पर एक व्यापक दृष्टिï डाली गई और एक हल का प्रस्ताव भी रखा गया। आर्थिक समीक्षा में दोहरी बैलेंस शीट के मुद्दे को हल करने के लिए एक पूरा खंड समर्पित है। दोहरी बैलेंस शीट की समस्या से तात्पर्य भारी भरकम फंसे हुए कर्ज और घाटे में चल रही बैलेंस शीट के चलते कारोबारियों की खस्ताहाल बैलेंस शीट से है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि यह देश के वित्तीय क्षेत्र के समक्ष मौजूद सबसे गहरी समस्याओं में से एक है। फंसे हुए कर्ज के बारे में अनुमान है कि अब यह करीब 191 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। यानी सकल घरेलू उत्पाद के 8 फीसदी से अधिक। वर्ष 2013 के बाद से यह आंकड़ा दोगुना हो चुका है।
फंसे हुए कर्ज का 13 फीसदी बुनियादी ढांचा क्षेत्र से ताल्लुक रखता है। इसका अर्थ यह हुआ कि बैंक अब बुनियादी ढांचा क्षेत्र की परियोजनाओं और कंपनियों को नया ऋण देने की कतई मंशा नहीं रखते। हाल की ऐसी घटनाएं जिनमें आईडीबीआई के पूर्व चेयरमैन की गिरफ्तारी भी शामिल है, ने इस अनिच्छा को और अधिक बढ़ाया है। ऐसे में निजी क्षेत्र की सहभागिता और परिणामस्वरूप निवेश आधारित वृद्घि और रोजगार निर्माण, दोनों की गति धीमी बनी हुई है। इस बीच बैंक जहां समस्या को हल करने की कोशिश में लगे हैं, वहीं परियोजना परिसंपत्तियां लगातार जोखिम की शिकार बनी हुई हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक ने इस समस्या से निपटने के लिए जो पहल की हैं उनको भी बहुत सीमित सफलता ही मिल सकी है। ऋण की अवधि को 25 साल तक बढ़ाने और हर पांच वर्ष में बदलने, स्ट्रैटजिक डेट रिकंस्ट्रक्शन (एसडीआर) और तनावग्रस्त परिसंपत्तियों के स्थायित्व भरे पुनर्गठन (एस4ए) जैसी योजनाएं कोई बड़ा असर नहीं छोड़ सकी हैं।
निजी क्षेत्र की परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनियों (एआरसी) की ओर से भी कोई अपेक्षित मदद नहीं मिली है। निजी क्षेत्र की ऐसी कंपनियों को फंसे हुए कर्ज से निपटने का विशेषज्ञ माना जाता था। जिन जगहों पर बैंक नाकाम हो जाते थे वहां भी ये सफल हो सकती थीं। लेकिन बैंक ऐसी एआरसी को बिक्री करने के इच्छुक नहीं रहे हैं। वर्ष 2014 में इन एआरसी को बिक्री में काफी धीमापन आया क्योंकि नए नियमों के तहत उनको परिसंपत्तियों की खरीद मूल्य का कहीं अधिक बड़ा हिस्सा अब नकद रूप में चुकाना पड़ रहा था। इसके अलावा निजी क्षेत्र की एआरसी अक्सर पर्याप्त पूंजी वाली नहीं होतीं। इससे उनकी जोखिम लेने की क्षमता प्रभावित होती है। इसके अलावा उनके पास अपने स्तर पर इन मामलों की बहुआयामीय जटिलताओं से निपटने का अनुभव नहीं होता और न ही क्षमता होती है।
आर्थिक समीक्षा एक अलग रुख अपनाती नजर आती है। इसमें सरकार की भूमि के विस्तार का प्रस्ताव रखा गया है। साथ ही एक केंद्रीकृत सरकारी परिसंपत्ति पुनर्वास एजेंसी (पीएआरए) की आवश्यकता भी जताई गई है जो भारी भरकम फंसी हुई परिसंपत्तियों को खरीदेगी। ऐसा एक सरकारी संस्थान संबंधित समस्याओं को हल करने में मददगार साबित हो सकता है। उदाहरण के लिए एक खास तरह की परिसंपत्ति के कारण जोखिम वाली संपत्ति में निवेश कर चुके विभिन्न बैंकों से संपर्क करना एक अलग तरह की समस्या है। जबकि ऋण का पुनर्गठन करने के लिए ऐसा करना आवश्यक है। ऐसा करने से से ऋण एक एजेंसी के पास केंद्रीकृत हो जाता है। इसके अतिरिक्त सरकारी क्षेत्र की कंपनियों से यह भी कहा जा सकता है कि वे अस्थायी तौर पर ऐसी परिसंपत्तियां सामने लाएं। ऐसा करने से संस्थागत विदेशी निवेशकों की विनिर्मित परिसंपत्तियां खरीदने की मांग को पूरा किया जा सकता है। इस दौरान राष्टï्रीय निवेश एवं बुनियादी कोष (एनआईआईएफ) को इस प्रक्रिया को सुसंगत बनाने वाली एजेंसी के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है।
पीएआरए के लिए पूरी पूंजी सरकार से आएगी ऐसी भी उम्मीद नहीं है। सुझाव दिया गया है कि इसे निजी क्षेत्र की बहुसंख्यक हिस्सेदारी के साथ 49:51 के अनुपात में तैयार किया जा सकता है। अहम बात है यह सुनिश्चित करना कि इस संस्था को एनआईआईएफ की तरह सरकार का अहम समर्थन हासिल हो।
राजनैतिक प्रतिष्ठïान बहुत अधिक मेलजोल से बचना चाह रहा है और इसे समझा जा सकता है क्योंकि सांठगांठ और सूटबूट की सरकार जैसे आरोप झट लग जाते हैं। लेकिन 80 फीसदी से अधिक लंबी अवधि से अटके फंड सरकारी ऋण या इक्विटी मार्केट से संबंधित हैं यानी सरकारी है। ऐसी बुनियादी परिसंपत्तियां सरकारी आर्थिक परिसंपत्तियां हैं। यही वजह है कि किसी भी सरकार का यह दायित्व होता है कि वह उनके लिए अच्छी कार्य परिस्थितियां सुनिश्चित करे। आरबीआई के मानकों के अधीन ऋण पर विलंबित भुगतान से भी इसी तरह निपटा जाता है।
इतना ही नहीं जिस प्रक्रिया से पीएआरए एक संकटग्रस्त बुनियादी परिसंपत्ति को अधिग्रहीत कर सकती है उसे पारदर्शी बनाया जा सकता है। इसके अलावा उसे सुस्पष्टï करते हुए उसकी निगरानी का काम एक स्वतंत्र समिति को सौंपा जा सकता है। ऐसी परिसंपत्तियां जिस मूल्य पर अधिग्रहीत की जाती हैं उसका निर्धारण करने का काम ऐसी ही समिति को दिया जाना चाहिए। इससे सरकार के ऊपर जानबूझकर बेलआउट करने का आरोप भी नहीं लगेगा। इसके अलावा अगर प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हुई तो कोई भी परिसंपत्ति और कोई भी मूल्य जिस पर उनको पीएआरए को बेचा जाएगा वह किसी भी तरह की जांच या सतर्कता एजेंसियों की निगाह से भी बची रहेगी।  अंतरराष्टï्रीय स्तर पर देखें तो सरकार का आम रुख यही होता है कि वह बड़े पैमाने पर काम कर रहे निजी उद्यमों को सफलतापूर्वक उबार लेती है। अमेरिका में ऋण संकट के बाद सरकार ने खुद बड़े पैमाने पर फंड देकर ऐसी कंपनियों को बचाया। एआईजी का उदाहरण हमारे सामने है जहां अमेरिकी सरकार ने अपनी हिस्सेदारी कम की और शेयर हिस्सेदारी बेचकर मुनाफा कमाया। पूरे विश्लेषण का लब्बोलुआब यह है कि भारत के फंसे हुए कर्ज की समस्या पूरी तरह वित्तीय समस्या नहीं है। यह राष्टï्रीय आर्थिक समस्या है और इसके लिए राजनीतिक हल के साथ-साथ सरकार की प्रतिबद्घता की भी आवश्यकता है कि वह राष्टï्रीय परिसंपत्तियों के हित में खड़ी रहे।

Keyword: infrastructure, balance sheet, Loan,
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