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आइडिया-वोडाफोन विलय के पीछे का मूल विचार

कारोबारी मंत्र
भूपेश भन्डारी /  March 28, 2017

वोडाफोन और आइडिया सेल्युलर के विलय पर दुनिया भर के प्रबंधन गुरुओं की नजर होगी। ऐसा कम ही देखने को मिला है जब कोई भारतीय कंपनी और किसी बहुराष्टï्रीय कंपनी की अनुषंगी एक साथ आई हों। दोनों ही बड़े संस्थान हैं और दोनों की कार्य संस्कृति भिन्न है। ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि विलय के बाद बनी कंपनी दोनों में कैसे तालमेल कायम करती है। यह एक चुनौती भी है। अध्ययन से पता चलता है कि इस मोर्चे पर अधिकांश विलय विफल रहते हैं।
कंपनी के नियंत्रण पर भी उनकी नजर रहेगी। मसलन, शुरुआत में आदित्य बिड़ला समूह के पास 26 फीसदी हिस्सेदारी रहेगी और वोडाफोन को 45.1 फीसदी शेयर मिलेंगे। तीन साल बाद भारतीय साझेदार के पास यह विकल्प होगा कि अंशधारिता का स्तर बराबर करने के लिए चाहे तो वह वोडाफोन के शेयर खरीद ले। विलय के बाद बनी कंपनी के बोर्ड में दोनों कंपनियों को समान प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था है। सच तो यह है कि समान साझेदारी के दिन बीता जमाना हो चुका है। ऐसे में इस व्यवस्था को कायम रखने के लिए दोनों कंपनियों को जबरदस्त अंतरवैयक्तिक कौशल का प्रयोग करना होगा। यहां वोडाफोन और आइडिया के रूप में दो ब्रांड का सवाल है। एक अटकल यह भी है कि दोनों ब्रांड बरकरार रखे जाएंगे। शहरी इलाकों के लिए वोडाफोन और ग्रामीण क्षेत्र के लिए आइडिया। यह विचार गलत साबित हो सकता है। दो ब्रांड होने से खर्च बढ़ेग और स्पष्टï संदेश भी नहीं जाएगा। अगर विलय के पीछे का मूल विचार लागत कम करना और तालमेल स्थापित करना है तो दोनों ब्रांड बरकरार रखने का क्या औचित्य है? एक समय भारती एयरटेल के पास भी दो ब्रांड थे। लैंडलाइन फोन के लिए टचटेल और मोबाइल के लिए एयरटेल। उसे जल्द ही गलती का अहसास हो गया और उसने तमाम सेवाओं मसलन, लैंडलाइन, मोबाइल, डीटीएच, भुगतान बैंक आदि को एयरटेल ब्रांड के अधीन कर दिया। 
दूरसंचार क्षेत्र में ब्रांड के महत्त्व को कई बार बढ़ाचढ़ाकर बताया जाता है। अतीत में कई ब्रांड जिनमें हच जैसे राष्टï्रीय और स्पाइस तथा एस्कोटेल जैसे क्षेत्रीय ब्रांड शामिल हैं, बाजार में बिना कोई हलचल मचाए समाप्त हो चुके हैं। उनके उपभोक्ता बिना किसी शोरशराबे के अधिग्रहण करने वाले ब्रांड में चले गए।
निश्चित तौर पर जब कारोबार का विलय हो जाएगा तो आपसी सुसंगतता आएगी लेकिन इस घोषणा ने वाकई निराशा पैदा की है कि इस विलय का वास्तविक लाभ चौथे वर्ष से शुरू होगा। वोडाफोन और आइडिया सेल्युलर दोनों के पास वॉयस कॉल के लिए तकरीबन 300-300 मेगाहट्र्ज स्पेक्ट्रम है। इसमें से 400 मेगाहट्र्ज की मदद से विलय के बाद 40 करोड़ ग्राहकों की सेवा आसानी से की जा सकती है। शेष 200 मेगाहट्र्ज स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल डाटा के लिए किया जा सकता है। यह बात उपभोक्ताओं को रास आएगी। विलय के बाद बनी कंपनी पर करीब एक लाख करोड़ रुपये का कर्ज होगा लेकिन टावर परिसंपत्तियां बिकने के बाद इसमें कमी आएगी।
यह विलय रोचक वक्त पर हो रहा है। रिलायंस जियो का मुफ्त डेटा इस सप्ताह समाप्त हो जाएगा। ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि उसक 10 करोड़ ग्राहकों में से कितने कंपनी के नए टैरिफ के साथ आगे जाते हैं। जियो प्राइम नामक यह पेशकश वाकई आकर्षक है। इसके तहत हर माह 303 रुपये में 30 जीबी डाटा दिया जाएगा। इसके लिए सालाना 99 रुपये शुल्क लिया जाएगा। वॉयस कॉल सेवा नि:शुल्क रहेगी। बहरहाल, अधिकांश नेटवर्क ऐसी ही योजनाओं के साथ सामने आए हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो रिलायंस जियो के तमाम ग्राहक एक अन्य नेटवर्क का इस्तेमाल भी कर रहे हैं। अगर टैरिफ एक जैसा रहा तो बहुत संभव है वे प्राइम का रुख न करें। नेटवर्क के बीच की लड़ाई अत्यंत निर्णायक दौर में पहुंच गई है। आने वाली तिमाहियां सबके लिए मुश्किल होंगी।
दूरसंचार उद्योग का राजस्व लगातार गिर रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक यह गिरावट तिमाही दर तिमाही 5 फीसदी है। इसका असर आने वाले दिनों में सरकार के दूरसंचार राजस्व पर पडऩा लाजिमी है क्योंकि उसे तमाम नेटवर्क से विभिन्न प्रकार के शुल्क मिलते हैं। इसमें छह फीसदी स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क, 8 फीसदी लाइसेंस शुल्क और सार्वभौमिक सेवा दायित्व फंड में 5 फीसदी योगदान आदि शामिल हैं। आने वाले दिनों में स्पेक्ट्रम की भी बहुत अधिक मांग नहीं रह जाएगी। भारती एयरटेल के पास कुछ साल के लिए पर्याप्त स्पेक्ट्रम है। वोडाफोन-आइडिया के पास भी इसकी कोई कमी नहीं है। इसके अलावा इस उद्योग पर करीब 3 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है। बैंक इस जोखिम को लेकर चिंतित हैं। उनका राजस्व दबाव में है और यह समझ पाना मुश्किल है कि नेटवर्क स्पेक्ट्रम नीलामी में शामिल होने के लिए धन कहां से पाएंगे।
शायद सरकार इस क्षेत्र के संकट को लेकर तब जागे जब राजस्व की आंच उसे प्रभावित करना शुरू कर दे। प्रधानमंत्री चुनावी रुख अपना चुके हैं और सरकार को मतदाताओं पर अनुकूल असर डालने के लिए अगले कुछ वर्ष के दौरान पैसे की आवश्यकता होगी। दूरसंचार क्षेत्र से राजस्व आता रहे यह तय करने के लिए सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि यह क्षेत्र अच्छी सेहत वाला बना रहे। दूरसंचार नेटवर्क को राहत देने के लिए कई सुझाव अपनाये गये हैं लेकिन सरकार ने अब तक उनमें से किसी पर अमल नहीं  किया है।

Keyword: Idea, vodafone, merger,
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