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मांस पर पाबंदी पशुपालकों के लिए नोटबंदी से कम नहीं

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  March 27, 2017

हाल ही में आई हमारी किताब फस्र्ट फूड: कल्चर ऑफ टेस्ट में हमने जैव विविधता, पोषण और आजीविका पर चर्चा की है। इसे लेकर मुझसे एक प्रश्न पूछा गया कि बतौर एक पर्यावरणविद मैं आखिर पारंपरिक और स्थानीय खाने का समर्थन और मांसाहार की निंदा क्यों नहीं करती हूं? इसके पक्ष में यह दलील दी जाती है कि मांस का उत्पादन जलवायु के लिए खराब है। कृषि क्षेत्र ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 15 फीसदी के लिए जिम्मेदार है और इसका आधा हिस्सा मांस उत्पादन से आता है। जमीन पर और पानी की खपत के मामले में भी इसकी गहरी छाप है। दुनिया की करीब 30 फीसदी धरती जो बर्फ से नहीं ढकी है, वहां जो अनाज उगाया जाता है वह मनुष्यों के नहीं बल्कि जानवरों के खाने के लिए होता है। वर्ष 2014 में ब्रिटिश भोजन पर ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय द्वार कराए गए एक सर्वेक्षण से पता चला कि मांसाहार वाले भोजन की बात करें तो हर रोज प्रति व्यक्ति 100 ग्राम से अधिक मांस खाने वाले लोगों ने हर रोज 7.2 किलोग्राम कार्बन डाइ ऑक्साइड का उत्सर्जन किया जबकि शाकाहारी भोजन करने वालों ने केवल 2.9 किग्रा कार्बन डाइ ऑक्साइड निकाली। मुझसे कहा गया कि ऐसे में स्थायित्व भरे भोजन की तलाश करना कोई सही बात नहीं।
इस बात से मेरी सहमति नहीं है। बतौर एक भारतीय पर्यावरणविद मैं कई वजहों से शाकाहार की हिमायत नहीं करूंगी। पहली बात, भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और यहां खानेपाने की संस्कृति समुदायों, क्षेत्र और धर्म के साथ बदलती रहती है। मैं भारत के इस स्वरूप से कोई समझौता नहीं चाहती क्योंकि यह हमारी समृद्घि को दिखाता है और यही हमारी हकीकत है।
दूसरी बात, मांस एक बड़ी आबादी के लिए प्रोटीन का स्रोत है। इसलिए पोषण सुरक्षा की दृष्टि से भी वह अहम है।
तीसरी बात ऐसी है जो मेरे रुख को वैश्विक रुख से अलग करती है। मांस खाना मसला नहीं है बल्कि उसकी मात्रा और उसके उत्पादन का तरीका मायने रखता है। हाल में किए गए एक आकलन के मुताबिक अमेरिका में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष मांस की औसतन खपत 122 किग्रा है। जबकि भारत में यह 3 से 5 किग्रा है। मांस की इतनी अधिक खपत स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए नुकसानदेह है। औसत अमेरिकी मांस खपत औसत प्रोटीन आवश्यकता से डेढ़ गुना तक ज्यादा है। ऐसे में दुनिया में उत्पादित 9.5 करोड़ टन बीफ में से अधिकांश लैटिन अमेरिका, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के पशुओं से हासिल होता है। इन सबका पर्यावरण पर खासा असर है। वहीं अंतरराष्ट्रीय पालतू पशु शोध संस्थान, कॉमनवेल्थ साइंटिफिक ऐंड इंडस्ट्रियल रिसर्च ऑर्गनाइजेशन और इंटरनैशनल इंस्टीट्यूट फॉर एप्लाइड सिस्टम एनालिसिस के मुताबिक विकासशील देशों में मांस का उत्पादन अलग तरह से होता है। यहां पालतू पशु काफी हद तक घास और फसल के बचे खुचे हिस्से पर निर्भर करते हैं।
परंतु भारतीय पर्यावरणविद होने के नाते मेरे मांस के खिलाफ न होने की सबसे अहम वजह यह है कि हमारे देश में पालतू पशु ही किसानों की आर्थिक सुरक्षा का सबसे बड़ा जरिया हैं। हमारे देश के किसान जमीन का इस्तेमाल फसल और वृक्षों के साथ-साथ पशुओं के लिए भी करते हैं। यही उनका असली बीमा है। हमारे देश में इन पशुओं को पालने का काम भी बड़े मांस कारोबारी नहीं बल्कि बड़े, छोटे, सीमांत और भूमिहीन किसान ही करते हैं। यह इसलिए सफल है क्योंकि पालतू पशुओं का एक उत्पादक उद्देश्य होता है: पहला, वे दूध और गोबर देते हैं, उनसे मांस मिलता है और चमड़ा बनता है। अगर यह सब छीन लिया जाए तो देश के लाखों लोगों की आर्थिक सुरक्षा ही छिन जाएगी।
अब जरा चीजों को सीधे परिप्रेक्ष्य में देखते हैं। अतीत में पालतू पशुओं को सूखे को ध्यान में रखते हुए भी पाला जाता था। सन 1980 के दशक में देश के इकलौते पशु ऊर्जा विशेषज्ञ स्वर्गीय एन एस रामास्वामी ने एक आकलन में कहा था 9 करोड़ पालतू पशुओं से मिलने वाली ऊर्जा देश में मौजूद बिजली क्षमता के बराबर थी। लेकिन मशीनीकरण ने हालात बदल दिए। सन 2000 तक पालतू पशुओं को प्रमुख तौर पर दूध के लिए पाला जाता था। यही वजह है कि सांड, बैल और भैंसों की तादाद लगातार कम होने लगी। फिलहाल कुल पालतू पशुओं में बमुश्किल 28 फीसदी नर हैं। उनका काम बस नस्ल बढ़ाना रह गया है।
लेकिन गाय और भैंस अपने 15-20 साल के जीवन में 7-8 वर्ष ही दूध देती हैं। किसान इस दौरान दूध बेचते हैं और उनसे संतति उपजाते हैं। पशुओं का रखरखाव सस्ता नहीं है। मेरे सहयोगियों का आकलन है कि अगर इन पशुओं को उचित खानपान और रखरखाव दिया जाए तो इसकी लागत तकरीबन 70,000 रुपये प्रति पशु प्रति वर्ष होगी। यही वजह है कि किसानों को गैर उत्पादक पशुओं से निपटने का विकल्प चाहिए। अगर विकल्प नहीं हुआ तो वे जानवरों को यूं ही खुला छोड़ देंगे। इससे दिक्कत बढ़ेगी।
यही वजह है कि मैं मांस या चमड़े पर प्रतिबंध के खिलाफ हूं। ऐसा करके हम पशुपालकों की आय का लगभग आधा हिस्सा छीन लेंगे। यह गरीबों के घर चोरी करने जैसा है। अगर सरकार हमारे घर में घुसकर आधा सामान उठा ले जाए तो हम क्या कहेंगे? मांस पर प्रतिबंध नोटबंदी जैसा ही क्रूर है।
लेकिन मैं यह भी समझती हूं कि धार्मिक भावनाएं मजबूत हैं। गायों को न मारने की वकालत करने वालों से यही कहना है कि वे किसानों से एक-एक गाय खरीदें, बड़ी गौशाला बनवाएं और उनका ध्यान रखें। ऐसा तरीका तलाशें कि इन गायों के मरने के बाद उनके शव को भी निपटाया जाए ताकि उसका कोई हिस्सा बाजारू इस्तेमाल में न आए। ऐसे में इन सवालों का उत्तर शाकाहार को लेकर आक्रामक होने में निहित नहीं है, न ही हिंसा और बर्बरता में है।

Keyword: environmentalist, Meat, farmers,
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