बिजनेस स्टैंडर्ड - विकास और राजनीतिक कथनों की हकीकत
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विकास और राजनीतिक कथनों की हकीकत

नितिन देसाई /  March 27, 2017

सही मायनों में आधुनिकीकरण करने के लिए यह आवश्यक है कि जाति और धर्म से परे जाकर वर्ग हित को ध्यान रखकर राजनीति की जाए। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं नितिन देसाई

राजनेता अतीत, वर्तमान और भविष्य को लेकर जो बातें कहते हैं उनका विकास के दायरे पर खासा प्रभाव होता है। ऐसी बातें तब राजनीतिक सफलता में तब्दील हो जाती हैं जब लोग खुद को उनसे जोडऩे लगते हैं। खासतौर पर वे युवा जिनके सामने अभी पूरा भविष्य होता है। संसदीय लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, असहयोग, नियोजित विकास, आधुनिक उद्योग धंधों और विज्ञान एवं तकनीक आदि को लेकर जो भी बातें कहीं वे सभी मेरी पीढ़ी को बहुत भायीं। यह वह पीढ़ी थी जो पूर्व औपनिवेशिक शासकों से भी बेहतर होना चाहती थी। इंदिरा गांधी ने वर्ष 1971 में गरीबी हटाओ का नारा दिया जिसमें देश के तत्कालीन 30 करोड़ लोगों की भावनाएं निहित थीं। इन लोगों ने उन्हें वोट भी दिया हालांकि वे इसके बाद भी लगातार गरीबी के भंवर में घिरे रहे।
डॉ. मनमोहन सिंह ने उदारीकरण को हमारे सामने रखा और इसके साथ तमाम युवाओं ने तकनीक से जुड़ी उम्मीदें पाल लीं। उन्हें अपनी वैश्विक तुलनाओं के नियंत्रण से निजात जो चाहिए थी। आज राजनीतिक परिदृश्य में एक बार फिर युवाओं की आकांक्षाओं पर बात होनी चाहिए। ये वे युवा हैं जो आधुनिक अर्थव्यवस्था में सकारात्मक काम चाहते हैं।
उत्तर प्रदेश में हुए हालिया विधानसभा चुनाव में भाजपा को निर्णायक जीत मिली है। वहां एक बार फिर नए राजनीतिक बयान की उम्मीद पैदा हुई है। सवाल यह है कि यह नया राजनीतिक कथन किन लोगों की उम्मीदों और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करेगा। कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनको लगता है कि इन चुनावों के नतीजे इस बात का प्रमाण हैं कि राजनीति जाति और समुदाय से ऊपर निकल रही है। लेकिन अगर करीबी विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि यह जातीय समीकरण और सांप्रदायिक भावनाओं के समझदारी भरे प्रबंधन का नतीजा है। भाजपा ने मुख्यमंत्री पद के लिए जो चयन किया है उससे यह व्याख्या सही साबित होती है। इससे यही पता चलता है कि विकास की तमाम बातों के बीच भी हिंदी प्रदेश में आधुनिकीकरण की आकांक्षाओं पर अभी जातीय और सांप्रदायिक वफादारियां भारी हैं।
क्या इसे राष्टï्रीय स्तर पर बरकरार रखा जा सकता है? भाजपा ने उत्तर प्रदेश में जो विशाल जीत हासिल की है उससे कुछ लोगों को यह लग सकता है कि उनको जीत का ऐसा फॉर्मूला हाथ लग गया है जो उन्हें 2018 में हिमाचल प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में भी जीत दिलाएगा। लोग एक बार फिर एक दल के दबदबे की बात कर रहे हैं। ठीक आजादी के बाद कांग्रेस की तरह जिसने उस वक्त एक बड़े नेता के नेतृत्व में लगभग सभी जगह अपना शासन कायम किया। लेकिन ऐसी तुलना सही नहीं है। अगर आगामी चुनावों में भाजपा अपने सभी प्रतिद्वंद्वियों को परास्त करने में सफल रहती है तो एक खास विचारधारा का वर्चस्व बढऩे और अधिनायकवाद का खतरा बढ़ जाएगा। जबकि नेहरू के दौर में सांप्रदायिक और सामाजिक शांति तथा राजनीतिक परिदृश्य में शांति व्यवस्था राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा थी।
अगर भाजपा इसी तरह विपक्षी दलों पर जीत हासिल करती गई तो विकास की क्या संभावनाएं शेष रहेंगी? कुछ टीकाकारों और विदेशी निवेशकों को यह नतीजा मजबूत सरकार, तेज नीतिगत सुधारों और बेहतर वृद्घि संभावनाओं की ओर ले जाता दिखता है। लेकिन कुछ लोगों के मुताबिक यह डर भी है कि सत्ताधारी दल इस परिणाम को अपनी लोकलुभावन नीतियों का परिणाम मानकर कल्याण योजनाओं पर खर्च बढ़ाता जाएगा ताकि अपने मतदाता आधार को बढ़ा सके। राजनीति एक मंच है और नोटबंदी एक ऐसी नाटकीय भंगिमा रही जिसने अमीरों को खासी चोट पहुंचाई। आम लोगों को असुविधा और गरीबों से अधिक वास्ता इस बात से था कि इसने अमीरों के लिए दिक्कत पैदा की। क्या यह अमीर विरोधी छवि सरकार को निजीकरण जैसे कदम उठाने से रोकेगी जो अमीरों के मददगार प्रतीत होते हैं? चुनावी दृष्टिï से देखा जाए तो भाजपा अगर मौजूदा अभियान में कामयाबी दिलाने वाले मुद्दों का फायदा उठाने में चूक जाती है तो आगे उसे नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।
जो चुनावी गणित उत्तर प्रदेश में भाजपा के पक्ष में साबित हुआ हो सकता है वह कहीं और काम न करे। खासतौर पर उत्तर प्रदेश की बात करें तो वहां अच्छी खासी तादाद में स्वतंत्र दलों का अस्तित्व है जो वोटों की प्रतिस्पर्धा में शामिल रहते हैं। कुछ आकलन बताते हैं कि अगर सपा-बसपा और कांग्रेस के वोट एक होते तो भाजपा को बमुश्किल 90-100 सीटें मिल पातीं। जिन राज्यों में 2018 में विधानसभा चुनाव होने हैं वहां भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई है। ऐसे में वहां उत्तर प्रदेश की तरह गैर भाजपा वोट बंटेंगे नहीं।
अगल काले धन और भ्रष्टïाचार के मुद्दे पर अनुकूल नतीजे सामने नहीं आए तो मतदाताओं का मोह भंग हो सकता है। संप्रग सरकार के कार्यकाल के आखिरी वक्त में नीतिगत घोटालों को सार्वजनिक बहस में लाना और नोटबंदी जैसा कदम उठाना यह सुझाता है कि इन मुद्दों पर भाजपा की प्रतिबद्घता अन्य दलों से अधिक है। हालांकि नोटबंदी ने काले धन और रोजमर्रा के भ्रष्टïाचार पर क्या असर डाला यह अभी भी अनिश्चित है। ट्रांसपैरेंसी इंटरनैशनल द्वारा 2015-16 में कराए गए एक सर्वेक्षण में 69 फीसदी भारतीय प्रतिभागियों ने कहा कि उन्होंने पुलिस या अदालती अधिकारियों को रिश्वत या तोहफा दिया है ताकि उनकी मदद हासिल की जा सके। इन लोगों ने यह भी माना कि सरकारी स्कूल, सरकारी स्वास्थ्य केंद्र पर, कोई आधिकारिक दस्तावेज हासिल करने के लिए या अन्य सेवाएं हासिल करने के लिए भी उन्होंने रिश्वत दी। अगर यह सिलसिला जारी रहा तो भाजपा कोई नई छवि नहीं बना पाएगी।
सबसे अहम चुनौती है युवा श्रमिकों की आकांक्षाओं पर खरा उतर पाना। ये युवा देश के उत्तरी राज्यों में अहम राजनीतिक घटक हैं। जननांकीय लाभांश वहीं घटित हो रहा है। वृद्घि दर बढऩे से रोजगार की वृद्घि नहीं दिख रही है। ऐसे में अगर हताशा पैदा होती है तो मुश्किल होगी। सांप्रदायिक तनाव और पार्टी समर्थकों की सांस्कृतिक आक्रामकता भी उसके लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है। याद रखना होगा कि भाजपा ने देश के सबसे अहम राज्य के मुख्यमंत्री पद पर ऐसी ही छवि वाले व्यक्ति को बिठाया है। ऐसे में सामूहिक हिंसा की वारदात बढ़ सकती हैं और सत्ताधारी दल को इसके चलते विरोध का सामना करना पड़ेगा।
जो विभाजनकारी राजनीति आकार ले रही है वह विकास की आकांक्षाओं को क्षति पहुंचाएगी। जबकि सत्ताधारी दल को मिलने वाले मतों की एक वजह यह भी है। वास्तविक आधुनिकीकरण के लिए राजनीतिक बहस को जाति और धर्म के पुराने चंगुल से बाहर निकालना होगा। फिलहाल तो इसकी संभावना काफी दूर नजर आ रही है।

Keyword: Politics, modermodernization, Democracy,
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