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उत्तराखंड में कैसे पूरे होंगे चुनावी वादे

ईशान बख्शी और साहिल मक्कड़ /  03 26, 2017

वादों की मुश्किल डगर

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने उत्तराखंड विधानसभा चुनावों के लिए अपने घोषणापत्र में कई वादे किए थे। इनमें 2019 तक सभी गांवों को सड़कों से जोड़ना, 24 घंटे बिजली आपूर्ति और सत्ता संभालने के छह महीने के भीतर खाली पड़े सभी सरकारी पदों पर नियुक्ति शामिल है। चुनावों में पार्टी को प्रचंड बहुमत मिलने के बाद अब अगर घोषणापत्र में किए गए वादों को देखा जाए तो इनमें से कुछ पूरे किए जा सकते हैं लेकिन बाकी को पूरा करना मुश्किल है।

भाजपा ने 2019 तक राज्य के हर गांव को सड़क से जोड़ने का वादा किया है। यह एक मुश्किल लक्ष्य लगता है। 2016-17 में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के तरह राज्य में 1,664 किलोमीटर सड़कों को मंजूरी दी गई थी लेकिन केवल 47 किमी ही बन पाई है। वर्ष 2001 के बाद से राज्य में 8,096 किमी सड़क को मंजूरी मिली थी जिसमें से केवल 5,838 किमी सड़क का ही निर्माण हो पाया है। राज्य के ग्रामीण निर्माण विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल 2015 में 91.9 किमी सड़कों को मंजूरी दी गई थी जिसमें से केवल 4.1 किमी ही पूरी हो पाई जबकि 19.3 किमी निर्माणाधीन है।

ग्रामीण सड़कों का कामकाज देख रहे अधिकारी शैलेश बगोली कहते हैं, 'पर्वतीय इलाकों में सड़क बनाना मुश्किल है। वन विभाग से अनुमति लेनी पड़ती है और फिर चट्टानों को काटा जाता है। दूसरी चुनौती मॉनसून और सर्दियों का मौसम है। इसलिए काम करने के लिए केवल चार महीने का समय मिलता है।' शैलेश ने कहा कि पीएमजीएसवाई अगर कोई गांव सड़क से 1.5 किमी दूर है तो उसे सड़क से जुड़ा हुआ माना जाता है। दो साल पहले राज्य सरकार ने इस 1.5 किमी को भी बनाने का फैसला किया। इस योजना के तहत दो साल में करीब 150 किमी बननी थी लेकिन इसकी प्रगति बहुत धीमी है।
बिजली

इसकी तुलना में चौबीसों घंटे बिजली देने का वादा आसान लगता है। इस दिशा में पहला कदम सभी घरों को पावर ग्रिड से जोड़ना है। केंद्रीय बिजली मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक राज्य के 17.2 लाख ग्रामीण परिवारों में से 15 लाख परिवारों का विद्युतीकरण हो चुका है। इस तरह देखा जाए तो उत्तराखंड अधिकांश दूसरे राज्यों से बेहतर स्थिति में है। बिजली वितरण के क्षेत्र में भी उत्तराखंड चौबीसों घंटे बिजली देने के केंद्र के वादे को पूरा करने में बाकी राज्यों की तुलना में बेहतर स्थिति में है। वितरण कंपनियों में वित्तीय सुधार के लिए केंद्र की उदय योजना में उत्तराखंड शामिल हो चुका है। केयर रेटिंग्स के मुताबिक उत्तराखंड ने दूसरे राज्यों की तरह वितरण कंपनियों का कर्ज अपने ऊपर नहीं लिया है क्योंकि वे बेहतर वित्तीय स्थिति में है। बिजली की कीमतों के विवादित मुद्दे पर भी उत्तराखंड अधिकांश राज्यों से बेहतर स्थिति में है।

केयर के आंकड़ों के मुताबिक उत्तराखंड में प्रति यूनिट बिजली आपूर्ति की औसत लागत और औसत राजस्व के बीच 27 पैसे का अंतर है। राष्ट्रीय औसत 59 पैसे प्रति यूनिट है। केयर के अध्ययन में इस पैमाने पर उत्तराखंड 16 राज्यों में पांचवें स्थान पर है। अलबत्ता नई सरकार को बिजली वितरण और पारेषण के दौरान होने वाले नुकसान को कम करने के लिए काफी काम करने की जरूरत है। उत्तराखंड में यह नुकसान 29.3 फीसदी है औ वह सर्वाधिक नुकसान वाले राज्यों में शामिल है। उदय योजना के तहत इस नुकसान को 2019 तक 15 फीसदी तक लाने का लक्ष्य है। दो साल में इसमें 14 फीसदी कमी करना दुष्कर काम होगा।
शिक्षा और वेतन

भाजपा का एक और चुनावी वादा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों को स्नातकोत्तर के स्तर तक मुफ्त शिक्षा देना है। शिक्षा पर राज्य का खर्च पिछले सात सालों में लगातार गिरा है। 2010-11 में यह 23.5 फीसदी था जबकि 2016-17 में 17.1 फीसदी (बजट अनुमान) रह गया। इस तरह शिक्षा पर खर्च बढ़ाने की गुंजाइश है लेकिन इसे खाली पड़े सभी सरकारी पदों को छह महीने में भरने के वादे के साथ देखें तो इसमें वित्तीय पेच है। वर्ष 2015-16 में उत्तराखंड ने वेतन पर 9,900 करोड़ रुपये खर्च किए जो राज्य के कुल खर्च का 30 फीसदी है और राज्य के कुल पूंजीगत खर्च 6,954 करोड़ रुपये से अधिक है। वेतन में किसी तरह की बढ़ोतरी से राजकोषीय दबाव बढ़ेगा। राज्य का राजकोषीय घाटा 14वें वित्त आयोग द्वारा तय 3 फीसदी की सीमा को पार कर गया है। वर्ष 2016-17 में राज्य के सकल घरेलू उत्पाद का 3.4 फीसदी था जबकि 2015-16 में यह 3 फीसदी (संशोधित अनुमान) था। अगर नई सरकार खाली पड़े सभी पदों को पूरा करती है तो वे संसाधन कर्मचारियों के वेतन में चले जाएंगे जिनका शिक्षा के लिए इस्तेमाल हो सकता था।

Keyword: uttrakhand, election, BJP,
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