Search BS HindiWeb         Follow us on 
Business Standard
Thursday, June 29, 2017 05:55 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

पेशेवर कोर्स वाले कॉलेजों की सफाई आज के वक्त की जरूरत

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  March 26, 2017

प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं को हमारी सलाह है कि अच्छे से तैयारी करें और खुद को शांत बनाए रखें। उनके माता-पिता से हम यह कहना चाहेंगे कि किसी अच्छे वकील का बंदोबस्त कर लें। इसकी वजह यह है कि पेशेवर पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए हर साल हजारों युवा उच्च न्यायालयों व उच्चतम न्यायालय की दौड़ लगाने के लिए मजबूर हो जाते हैं। पिछले दो दशकों में प्रवेश से जुड़े मसलों पर अदालत की शरण लेने की प्रवृत्ति बढ़ी है।
परीक्षाओं के आयोजन और काउंसलिंग में बरती जाने वाली अनियमितताओं के अलावा कॉलेजों की संबद्धता, मेरिट सीट और प्रबंधन कोटा वाली सीटों को लेकर होने वाली जंग, कैपिटेशन फीस, आरक्षण और परीक्षा नियामकों की तरफ से समय-समय पर जारी होने वाले निर्देश जैसे मुद्दे इन विवादों की वजह बनते हैं। राज्यों और केंद्र में परीक्षाएं संचालित करने वाले बोर्ड हालात को और भी जटिल बना देते हैं। ये खुद ही लापरवाही बरतने या भ्रष्टाचार जैसे आरोपों से घिरे हुए हैं। भारतीय चिकित्सा परिषद इसकी एक बानगी है। परीक्षाएं देने वाले छात्रों को स्व-वित्तपोषित और अल्पसंख्यक संस्थानों, आईआईटी, आईआईएम और स्वायत्त कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों का सामना करना पड़ता है। संस्थानों की संख्या बढऩे से छात्रों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।
छात्रों को सबसे ज्यादा परेशानी असंबद्ध कॉलेजों की वजह से होती है। मनचाहे पाठ्यक्रम में प्रवेश पाने की लालसा का फायदा उठाते हुए ऐसे संस्थान छात्रों को मुश्किल में डाल देते हैं। उच्चतम न्यायालय ने पिछले साल अनुरागी देवी बनाम उत्तर प्रदेश मामले में इस पर गहरी चिंता जताते हुए कहा था कि बिना मान्यता वाले संस्थानों में हो रहे गैरकानूनी प्रवेश एक बीमारी का रूप ले चुके हैं। न्यायालय ने इससे निपटने के लिए कॉलेजों को एक समयबद्ध प्रक्रिया के तहत संबद्धता देने को कहा था। लेकिन अधिकारी या कॉलेज इस आदेश का हमेशा पालन नहीं करते हैं। जब मुश्किल में फंसे छात्र अदालत जाते हैं तो वे अंतरिम आदेश दे देते हैं लेकिन अंत में यह मामला उच्चतम न्यायालय तक जा पहुंचता है। ऐसे ही एक मामले में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने छात्रों को अपना कोर्स पूरा करने की इजाजत दे दी थी लेकिन शीर्ष अदालत ने उस आदेश को पलट दिया। इसी तरह सरकारी अधिसूचना के उलट छात्रों को प्रवेश देने वाले असंबद्ध कॉलेज पर पांच करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया था।
कॉलेजों में निर्धारित संख्या से अधिक छात्रों को प्रवेश देने से भी  बड़ी समस्या खड़ी होती है। ये कॉलेज छात्रों को यह कहते हुए  बरगलाते हैं कि सीटों की संख्या बढऩे की मंजूरी जल्द ही ले ली जाएगी। प्रवेश हो जाने के बाद ये छात्र भी बाकी छात्रों की तरह पढ़ाई में जुट जाते हैं लेकिन सरकार और नियामक संस्थाओं को इसकी भनक तब लगती है जब कई महीने बीत चुके होते हैं। उसके बाद मामला अदालतों में जाता है लेकिन इस कवायद में पीडि़त छात्र का करियर दांव पर लग जाता है।
परीक्षाओं में गड़बडिय़ां होना तो अब आम हो चुका है। व्यापम घोटाला इसका एक उदाहरण है। मुन्नाभाई एमबीबीएस जैसी फिल्मों में भी इस पहलू को उजागर किया जा चुका है। हाल ही में न्यायालय ने गलत तरीकों से प्रवेश पाने वाले 634 मेडिकल छात्रों पर सख्त रुख अपनाया है। खंडपीठ के दो न्यायाधीशों के बीच दोषी छात्रों पर की जाने वाली कार्रवाई को लेकर मतभेद खुलकर सामने आए। एक न्यायाधीश ने इन छात्रों को पांच साल बिना वेतन के सरकारी सेवा में लगाने या सैन्य सेवा में भेजने की संस्तुति की। वहीं दूसरे न्यायाधीश का कहना था कि ऐसा कदम गलत तरीके से प्रवेश पाने वाले छात्रों के लिए एक तरह का प्रीमियम ही होगा।
असल में अदालतें भी स्पष्ट नहीं हैं कि गलत तरीके से प्रवेश लेने वाले छात्रों के साथ कोर्स के बीच में या डिग्री हासिल कर लेने के बाद कैसा सलूक किया जाए? ऐसे में मामले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया गया है। अक्सर अदालतों के आदेश समस्या को हल करने के बजाय नए सवाल ही खड़े कर देते हैं। मसलन, उच्चतम न्यायालय ने मेडिकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए साझा प्रवेश परीक्षा एनईईटी के मसले पर 2013 के अपने ही फैसले को पिछले साल पलट दिया था।
कैपिटेशन फीस की मांग के चलते भी कॉलेज छात्र अदालत जाने के लिए मजबूर हो जाते हैं। करीब दो दशक पहले उच्चतम न्यायालय ने पेशेवर पाठ्यक्रमों वाले कॉलेजों में कैपिटेशन फीस की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए कहा था, 'समाज के समृद्ध तबके से ताल्लुक रखने वाले गैर-मेधावी छात्रों को प्रवेश देना और गरीब परिवार के प्रतिभावान छात्र को बाहर कर देना मनमानी है। इसकी कानूनी तौर पर इजाजत नहीं दी जा सकती है। किसी भी तरह से कैपिटेशन फीस लेना गलत माना जाएगा। प्रवेश का एकमात्र तरीका योग्यता ही है।'
लेकिन उच्चतम न्यायालय के इस फैसले के बाद भी कैपिटेशन फीस की रवायत जारी है। अभी तीन माह पहले संविधान पीठ ने कहा था कि आजकल शिक्षा एक पेशा बन चुकी है। संविधान के अनुच्छेद 19 में इसकी मंजूरी है लेकिन शिक्षा से लाभ कमाने या इसके व्यवसायीकरण की मंजूरी नहीं है और किसी भी तरह की कैपिटेशन फीस नहीं ली जा सकती है। शीर्ष अदालत के यह विचार सुनने में काफी अच्छे लगते हैं लेकिन असलियत तो यही है कि शिक्षा के व्यवसायीकरण और मुनाफाखोरी की बीमारी दोनों ही पिछले दशकों में बढ़ती गई हैं। अधिकांश कॉलेज किसी न किसी रूप में नेताओं, कारोबारी घरानों या रियल एस्टेट कंपनियों से जुड़े हुए हैं और वे मोटी रकम लेकर डिग्री बांटने का केंद्र बन चुके हैं। इसके जरिये काला धन भी खूब एकत्रित किया जा रहा है और डिजिटल भुगतान एवं बिटकॉइन तो इससे बहुत पीछे हैं।
हमारी अंतिम सलाह यह है कि शिक्षा को कमाई का जरिया बना चुके निजी पेशेवर कॉलेजों और संबद्धता प्रदान करने वाली संस्थाओं की आने वाले महीनों में सफाई की जाए और छापेमारी करने वाले वाहनों के इंजन लगातार चालू रहें।

Keyword: vocational courses, entrance, lawyer,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
Advertisements 
Cover from Natural Calamities. Buy Home Insurance
Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
  आपका मत
 क्या एयर इंडिया का निजीकरण उचित कदम होगा?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.