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जवाबदेही से दूरी

संपादकीय /  March 26, 2017

गत सप्ताह लोक सभा ने वित्त विधेयक 2017 को मंजूरी दे दी। अब यह राज्य सभा के समक्ष जाएगा। लेकिन चूंकि यह एक धन विधेयक है इसलिए उच्च सदन इसे न तो ठुकरा सकता है और न ही कोई संशोधन करने का दबाव डाल सकता है। सरकार ने इसमें कुछ अतिरिक्त सुझावों का प्रस्ताव रखा है जो कुल 40 से अधिक मौजूदा कानूनों में हो रहे बदलाव के सिलसिले की एक कड़ी है। इनमें से कई संशोधन ऐसे कानून पारित करने से संबंधित हैं जहां मसले की प्रकृति वित्तीय नहीं है। ऐसे कानूनों के लिए राज्य सभा की मंजूरी ली जानी चाहिए। यह देश की संवैधानिक व्यवस्था का आधार है। लेकिन उनके लिए धन विधेयक की राह चुनकर सरकार ने इस आवश्यकता को दरकिनार कर दिया है। यह सरकार द्वारा धन विधेयक का दुरुपयोग कर राज्य सभा से बचने का एक और उदाहरण है। राज्य सभा में भाजपा और उसके सहयोगी दलों को बहुमत नहीं हासिल है। अतीत में सरकार ने इस प्रावधान का इस्तेमाल कर आधार अधिनियम पारित किया था। ऐसा लगता है कि अब उसका इरादा इसका अक्सर प्रयोग करने का है। ऐसा करने से संवैधानिक व्यवस्था पर बुरा असर ही नहीं होगा बल्कि इन नए कानूनों की वैधता पर भी सवाल खड़े होंगे।
वित्त विधेयक 2017 में जो संशोधन सुझाए गए हैं उनमें कई अत्यंत बहसतलब मुद्दों से जुड़े हैं। उदाहरण के लिए राजनीतिक दलों को कारोबारी चंदे से संबंधित कई प्रावधानों में अहम बदलाव किए गए हैं। इसका सरकारी वित्त से क्या लेनादेना है यह स्पष्टï नहीं है लेकिन चुनाव सुधार से यह जरूर जुड़ा है। धन विधेयक का चुनाव सुधार से भला क्या संबंध? इससे पहले राजनीतिक दलों को कंपनियों का चंदा उनके शुद्घ लाभ के 7.5 फीसदी तक सीमित किया गया था। यह पिछले तीन साल के औसत के समान था। इससे भी बुरी बात यह है कि यह चंदा आखिर कहां जा रहा है, यह जानने की जरूरत तक समाप्त कर दी गई है। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत में अब ऐसी व्यवस्था है जहां असीमित, अपारदर्शी राजनीतिक चंदा दिया जा सकता है। संसद में इस पर व्यापक बहस होनी चाहिए थी और विपक्ष को संशोधनों पर चर्चा करने और बदलाव की कोशिश का मौका मिलना चाहिए था जो नहीं मिला। अपील पंचाट की व्यवस्था में बदलाव भी दिक्कतदेह है। वित्त विधेयक 2017 ने कई पंचाटों को बदल दिया है और उनका विलय कर दिया है। उदाहरण के लिए प्रतिस्पर्धा अपील पंचाट जो प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 के उल्लंघन के मामलों पर निर्णय देता था अब राष्टï्रीय कंपनी कानून अपील पंचाट ने उसका अधिग्रहण कर लिया। यह पंचाट कंपनी अधिनियम से जुड़े विवादों की सुनवाई करता आया है।
जाहिर सी बात है कि इन दोनों अधिनियमों का काम और उनका उद्देश्य दोनों अलग हैं। इनके लिए जरूरी विशेषज्ञता भी अलग है। सबसे बुरी बात यह है कि नये संशोधन के तहत सरकार को पंचाट सदस्यों के रोजगार और नियुक्ति की शर्तें निर्धारित करने का अधिकार रहेगा। ऐसा तब है जबकि अक्सर सरकार इन पंचाटों के समक्ष आने वाले मामलों में पक्षकार रहती है। इस व्यवस्था में स्वाभाविक तौर पर दिक्कतें हैं। अद्र्घ न्यायिक संस्थाओं पर सरकारी अधिकारियों का नियंत्रण मूलभूत संवैधानिक सिद्घांतों का उल्लंघन है। इसके बावजूद सरकार ने इसे धन विधेयक के रूप में भेजा। इससे न केवल राज्य सभा की भूमिका को सीमित किया जा रहा है बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही को भी कमतर किया जा रहा है। लोक सभा अध्यक्ष का यह तय करने का अधिकार अंतिम मान लिया गया है कि धन विधेयक किसे माना जाएगा? अगर यह रवैया लोक  सभा अध्यक्ष को अदालती मामलों में घसीटता है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा।

Keyword: Parliament, finance bill, money bill,
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