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बिहार पर्चा लीक, हालत नहीं ठीक

सत्यव्रत मिश्रा /  03 23, 2017

बीएसएससी का पर्चा लीक होने से बिहार में गहराई तक पैठ बना चुका भ्रष्टाचार एक बार फिर राजनीति के केंद्र में आ गया है। पूरे मामले पर विस्तार से रोशनी डाल रहे हैं सत्यव्रत मिश्रा

बिहार कर्मचारी चयन आयोग का पर्चा लीक होने के मामले की सीबीआई जांच की मांग को लेकर बिहार विधानसभा के बाहर प्रदर्शन कर रहे भाजपा विधायक


बीते साल 8 जून की उमस भरी दोपहर को जनता दल (यूनाइटेड) के बिहार प्रदेश कार्यालय में संवाददाता सम्मेलन का आयोजन किया गया था। सम्मेलन में खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मौजूद थे। उसके ठीक 24 घंटे पहले गड़बड़ी के आरोप में राज्य सरकार ने 12वीं कक्षा के कला और विज्ञान संकाय के टॉपरों के नतीजों को रद्द कर दिया था। पत्रकारों से बातचीत में इसका जिक्र आते ही कुमार की आवाज में गुस्से और दुख को साफ महसूस किया जा सकता था। उन्होंने गुस्से से लगभग कांपते हुए कहा था, 'भरोसा रखिए, इस मामले की गहराई से जांच होगी और दोषी लोगों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई होगी। भविष्य में लोग ऐसा करने से डरेंगे।' ठीक आठ महीने बाद पिछले महीने कुमार उसी शैली में अपने उसी वादे को दोहरा रहे थे, बस मामला बदल चुका था। इस बार कुमार यह बात बिहार कर्मचारी चयन आयोग (बीएसएससी) के सचिवालय सहायक की नियुक्ति में तथाकथित गड़बड़ी के संदर्भ में कह रहे थे।

बीएसएससी के पूर्व अध्यक्ष सुधीर कुमार और पूर्व सचिव परमेश्वर राम पर नियुक्ति के लिए आयोजित परीक्षा का पर्चा लीक करने का आरोप है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने इसकी जांच की जिम्मेदारी एक विशेष जांच दल (एसआईटी) को सौंपी है, यह काम पटना के वरीय पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) मनु महराज को दिया गया है। एसआईटी ने इस मामले में अब तक कुमार और राम के अलावा देश के विभिन्न हिस्सों से करीब तीन दर्जन लोगों को गिरफ्तार किया है।

बीएसएससी का गठन 2002 में निचले दर्जे के कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं के आयोजन के वास्ते किया था। हालांकि, आयोग अपने गठन के वक्त से ही विवादों में रहा है। आयोग की कार्यशैली लगातार संदेह के घेरे में रही है। आयोग ने अब तक 15 परीक्षाएं आयोजित की हैं जिनमें से 12 को गड़बड़ी के आरोप में एक या एक से ज्यादा बार रद्द किया जा चुका है और परीक्षार्थियों को फिर से इम्तिहान देना पड़ा है। हालांकि, इस मामले में बड़े-बड़े लोगों के फंसने की वजह से इसने बीएसएससी की चूलें हिला दी हैं।

इस मामले की शुरुआत 2014 से होती है, जब आयोग ने करीब 10,000 नौकरियों का विज्ञापन छापा था। इसके एवज में 20 लाख आवेदन आयोग को मिले थे। आयोग इतनी बड़ी तादाद में आवेदनों को संभालने के लिए कतई तैयार नहीं था। खास्ता माली हालत की वजह से आयोग ने परीक्षा आयोजित करने से अपने हाथ खड़े कर लिए थे। अधिकारियों के मुताबिक आयोग ने छह बार परीक्षा आयोजित करने का फैसला लिया, लेकिन अंत समय में पैसे की दिक्कत का हवाला देकर इसे स्थगित कर दिया। वैसे, पुलिस अधिकारियों की मानें तो बार-बार परीक्षा की तारीख टालने की पीछे एक बड़ी वजह 'सौदा नहीं निपटना' भी था। यहां तक कि एक बार तो आयोग ने प्रतिभागियों से अतिरिक्त रकम की गुहर लगाने का भी प्रस्ताव रखा था।

आखिरकार, राज्य सरकार को बीते साल नवंबर में इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा और परीक्षा आयोजित करने के लिए अतिरिक्त आर्थिक सहायता दी। इसके बाद आयोग ने चार चरणों में परीक्षा आयोजित करने का फैसला लिया। इसके लिए चार अलग-अलग सेट में प्रश्न पत्र और उत्तर कुंजी तैयार की गई थी। परीक्षा की शुरुआत 29 जनवरी को हुई और अंत 28 फरवरी को होना था।

हालांकि, 27 जनवरी को पटना पुलिस की एक टीम से सेना में भर्ती की परीक्षा का पर्चा  लीक करने का दावा करने वाले अपराधियों के एक गिरोह के ठिकाने पर छापा मारा था। पुलिस अधिकारी उस वक्त भौचक्के रह गए, जब उन्हें अपराधियों के पास कई दस्तावेजों के साथ-साथ बीएसएससी की इंटर स्तरीय परीक्षा का प्रश्न पत्र भी मिला। आयोग को तुंरत इस बारे में आगाह किया गया, लेकिन बीएसएससी के अधिकारियों ने इसे खारिज कर दिया। स्थानीय अखबारों और टेलीविजन चैनलों ने सोशल मीडिया पर प्रश्न पत्र के वायरल होने की खबर प्रमुखता से चलाई थी। हालांकि, परमेश्वर राम ने इन खबरों को सिरे से खारिज कर दिया। 

परीक्षा के दूसरे चरण यानी 5 फरवरी से एक दिन पहले पुलिस को सोशल मीडिया पर हाथ से लिखा हुआ एक नोट वायरल होने की जनकारी मिली। वहीं, परीक्षा के दिन नवादा जिले में पुलिस ने करीब दो दर्जन अपराधियों को नकल करने और कराने के आरोप गिरफ्तार किया। उनके पास भी वही नोट पुलिस को बरामद हुआ। उस नोट में उस दिन के प्रश्न पत्र के 150 में से 135 सवालों के सही जबाव थे। अधिकारी सकते में थे क्योंकि इस बार पर्चा नहीं, पूरी उत्तर कुंजी ही लीक हो गई थी।

पटना एसएसपी मनु महराज के मुताबिक यह इस मामले में बड़े अधिकारियों के शामिल होने का पहला संकेत था। उन्होंने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया, 'यह बेहद चौंकाने वाली बात थी। दरअसल, उत्तर कुंजी आयोग में एक सुरक्षित लॉकर में बंद होनी चाहिए थी। अगर यह लीक हुआ है, तो इसमें बड़े अधिकारियों की संलिप्तता को नकारा नहीं जा सकता है।' जैसे ही उत्तर कुंजी के लीक होने की खबर आई, परीक्षार्थी भड़क उठे। उनकी मांग थी कि परीक्षा को रद्द किया जाए और मामले की गहराई से जांच हो।

हालांकि, बीएसएससी 'निष्पक्ष परीक्षा' की अपनी बात अड़ा रहा। उसने एक विज्ञप्ति जारी करके इन आरोपों को 'विद्वेषपूर्ण और झूठा' करार दिया। आयोग के अडिय़ल रवैये को देखते हुए परीक्षार्थियों ने आयोग के दफ्तर के सामने ही धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया। 7 फरवरी को बीएसएससी के पूर्व सचिव राम ने अपने दफ्तर जाने की कोशिश कर रहे थे, तो प्रदर्शन कर रहे परीक्षार्थियों ने उन पर हमला कर दिया। यह सब कुछ खबरिया चैनलों और अखबारों के कैमरे के सामने हुआ।

इस पूरे घटनाक्रम से सकते में आई राज्य सरकार तुरंत हरकत में आ गई। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य के पुलिस महानिदेशक पी के ठाकुर से इस मामले की आपराधिक जांच का आदेश दिया। अगले 24 घंटे में ही पर्चा और उत्तर कुंजी लीक होने का पुष्टि हो गई और राज्य सरकार ने तुरंत ही परीक्षा रद्द कर दिया। राम को 10 फरवरी को आधे दर्जन दूसरे अभियुक्तों के साथ-साथ पर्चा लीक करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। साथ ही, उनके मोबाइल में से दो मंत्रियों, कई पूर्व मंत्रियों, दर्जन भर विधायकों और कई अधिकारियों के सिफारिशी संदेश भी मिले हैं।

अब तक पुलिस ने इस मामले में देश के अलग-अलग हिस्सों से तीन दर्जन अभियुक्तों को हिरासत में लिया है, जबकि करीब हजारों की तादाद में लोगों के फोन रिकॉर्ड को खंगाला गया है। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक इस पूरे नेटवर्क के काम करने का तरीका बेहद सामान्य था। उनके मुताबिक इस पूरे मामले की परतें 27 जनवरी से ही खुलने लगी थीं, जब उन्होंने एक निचले दर्जे के अपराधी को हिरासत में लिया था।

पटना एसएसपी और एसआईटी के मुखिया मनु महराज ने बताया, 'इस पूरे घोटाले में सबसे अहम कड़ी पटना के पास बिहटा में एक छोटे से कोचिंग संस्थान का मालिक था। उससे मिली जानकारी के आधार पर पूरा मामला और लोगों की भूमिका साफ हो गई। अब तक हम जो जानते हैं, उसके मुताबिक बीएसएससी के अधिकारियों और दलालों ने मिलकर इस घटना को अंजाम दिया।'

पुलिसिया जांच के मुताबिक बीएसएससी का पर्चा पटना के एक निजी स्कूल से लीक हुआ ता। महराज ने बताया, 'यहीं इस बारे में बीएसएससी के अधिकारियों और दलालों के बीच सौदा हुआ था। हमारी जांच के मुताबिक बीते वर्षों की आपत्तियों के बावजूद इस स्कूल में परीक्षा केंद्र बनाया गया था। हमारी जानकारी के मुताबिक पर्चा 6 लाख रुपये प्रति अभ्यर्थी के भाव पर बेचा गया। इसके बाद परीक्षार्थियों के मोबाइल फोन पर परीक्षा से एक दिन पहले पर्चा भेज दिया गया।'

महराज के मुताबिक उत्तर कुंजी तो उससे भी पहले लीक कर दी गई थी। उन्होंने कहा, 'हमारी जानकारी के मुताबिक बीएसएससी अध्यक्ष सुधीर कुमार के परिवार के पांच सदस्य भी इस परीक्षा में शामिल होने वाले थे। उन्हें कुमार ने 23 जनवरी को ही उत्तर कुंजी मुहैया करा दी थी।'

पुलिस ने भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी सुधीर कुमार को 24 फरवरी को गिरफ्तार किया था, जबकि उन्हें 3 मार्च को राज्य सरकार ने निलंबित किया। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने उनका पक्ष जानने के लिए 19 फरवरी को उसने संपर्क साधा था, लेकिन उन्होंने बात करने से साफ इनकार कर दिया था। एसआईटी के सूत्रों के मुताबिक इस मामले में एक और आईएएस अधिकारी उनके रडार पर है। उनके मुताबिक उस अधिकारी इस मामले में षडयंत्र रचा और मामले के सामने आने पर सबूत नष्ट करने की भी कोशिश की थी। वह अधिकारी पिछले एक महीने से बिना किसी जानकारी के गायब है। पुलिस भी उसका पता नहीं लगा पा रही है।

कुमार की गिरफ्तारी ने राज्य में नौकरशाही को बुरी तरह से हिलाकर रख दिया है। राज्य में आईएएस ऑफिसर्स एसोसिएशन सबसे ताकतवर लॉबी समझी जाती है क्योंकि उसे कथित तौर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का समर्थन मिला हुआ है। हालांकि, कुमार की गिरफ्तार से बिहार में राजनैतिक नेतृत्व और नौकरशाही आमने-सामने खड़ी हो गई है। सुधीर कुमार की गिरफ्तार के तुरंत बाद एसोसिएशन के बिहार चैप्टर ने आनन-फानन में आपातकालीन बैठक बुलाई। इस बैठक में एसोसिएशन ने बिहार पुलिस पर 'प्रतिशोध की भावना' से ग्रसित होने काम करने का आरोप लगाया और मामले की सीबीआई जांच की मांग की।

विरोध का झंडा बुलंद करते हुए 26 फरवरी को पहली बार राज्य में आईएएस अधिकारियों ने सड़क पर मार्च किया। राज्य के कई जिलाधिकारी (डीएम), सचिव और प्रधान सचिवों ने राजभवन के सामने मानव शृंखला बनाकर अपने विरोध का प्रदर्शन किया। साथ ही, उन्होंने बीएसएससी या ऐसे किसी आयोग में किसी पद को स्वीकार करने से इनकार करने का भी फैसला लिया। यहां तक कि उन्होंने कुमार को रिहा नहीं किए जाने पर मुख्यमंत्री के भी मौखिक आदेशों को मानने से इनकार करने का ऐलान कर दिया। अधिकारियों के मुताबिक सुधीर कुमार को पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी का करीबी होने की कीमत चुकानी पड़ रही है। हालांकि, राज्य सरकार इस बात से साफ इनकार कर रही है।

आईएएस अधिकारियों के विरोध प्रदर्शन से राज्य सरकार सकते में आ गई। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 28 फरवरी को विधानसभा में कहा, 'सरकार इस बारे में सख्ती से निपटेगी। भ्रष्टाचार के मामलों में नरमी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। साथ ही, मेरे रहते किसी निर्र्दोष को सजा नहीं हो सकती है। हम इस बारे में जो कार्रवाई करेंगे, उसे दुनिया याद रखेगी।'

16 मार्च को आखिरकार राज्य सरकार विरोध प्रदर्शन में शामिल अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया। राज्य सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग ने करीब डेढ़ दर्जन डीएम से पूछा कि वे किसकी इजाजत से जिला मुख्यालय को छोड़ पटना आए थे और उन्होंने अति-सुरक्षित इलाके में मानव शृंखला क्यों बनाई? हालांकि, अधिकारियों ने अपने जवाब में कहा कि उन्होंने मानव शृंखला नहीं बनाई थी, बल्कि वे राजभवन के सामने अपने साथियों का इंतजार कर रहे थे।

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के कई नेताओं ने इस मौके का इस्तेमाल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर जबानी हमला करने में भी किया। हालांकि, जब कुमार ने इस बारे में खुले तौर पर अपनी नाराजगी जताई तो राजद प्रमुख लालू प्रसाद और उनके बेटे और उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने नेताओं को बेवजह की बयानबाजी नहीं करने का आदेश दिया। वहीं, इस मामले में विपक्षी दलों में भी एकता नहीं है। भाजपा नेता इस मामले में सुधीर कुमार को सीधे तौर पर दोषी बता रहे हैं, तो वहीं हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) अध्यक्ष जीतन राम मांझी के मुताबिक उन्हें फंसाया गया है।

इस मामले ने विपक्षी दलों को सरकार पर हमले करने का उपयुक्त मौका दे दिया है। भाजपा इसे राज्य सरकार की विफलता करार देकर सीबीआई जांच की मांग कर रही है, जबकि सरकार इसके लिए कतई तैयार नहीं है। भाजपा नेता सुशील मोदी ने कहा, 'इस मामले का आकार इतना बड़ा है कि पुलिस इसकी जांच नहीं कर सकती है। इसे ढकने की कोशिश की जा रही है। राज्य सरकार को इस मामले में सीबीआई जांच का आदेश देना ही होगा।'

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