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वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र में व्याप्त अस्थिरता

अरुणाभ घोष /  03 23, 2017

वैश्विक स्तर पर प्राकृतिक गैस की खपत तेजी से बढ़ रही है। इसकी दर अन्य जीवाश्म ईंधन से बहुत अधिक है। विस्तार से बता रहे हैं अरुणाभ घोष
वैश्विक ऊर्जा जगत में उथलपुथल का माहौल है। तेल की कीमतें पिछले कई महीनों से लगातार उतार-चढ़ाव की शिकार हैं। वर्ष 2017 के आरंभ से ही कीमतें एक सीमित दायरे में काम कर रही हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि पेट्रोलियम उत्पादक देशों के समूह (ओपेक) तथा रूस जैसे अन्य प्रमुख तेल उत्पादक देशों ने उत्पादन में 12 लाख बैरल प्रतिदिन की कटौती की है। ओपेक देशों खासतौर पर सऊदी अरब ने इसका कमोबेश पूरा अनुपालन किया है जबकि गैर ओपेक देशों ने वादे के केवल 38 फीसदी के बराबर ही कटौती की है। इसके अलावा अमेरिका में शेल गैस के उत्पादन में जबरदस्त इजाफे के चलते भी गैर ओपेक तेल उत्पादन फरवरी माह में 90,000 बैरल प्रतिदिन तक बढ़ा। मार्च के मध्य तक कीमतों में एक बार फिर 10 फीसदी की गिरावट देखने को मिली।
तेल की कम कीमतों ने उत्पादन कार्य में लंबी अवधि के निवेश को प्रभावित किया। लेकिन अगर कीमतें बहुत अधिक बढ़ती हैं तो उपभोक्ताओं के लिए अन्य वैकल्पिक ऊर्जा माध्यमों की ओर जाने का प्रोत्साहन कम हो जाएगा। बड़ी तेल कंपनियों के लिए यह एक बड़ी दुविधा है। खासतौर पर इसलिए क्योंकि जो कीमत लंबे समय तक मांग बरकरार रखने में मददगार होगी उस पर निरंतर मुनाफे का दबाव भी बरकरार रहेगा। प्रतिक्रियास्वरूप कुछ फर्म ने अधिक महंगे तेल भंडारों मसलन कनाडाई ऑयल सैंड आदि से अपना निवेश खत्म कर लिया। जबकि अन्य ने कम लागत वाली शेल गैस के उत्खनन में निवेश बढ़ा दिया। इसके अलावा भी कई अन्य लोगों ने नई परियोजनाओं के लिए किफायत बढ़ाने, लागत कम करने और नुकसान-मुनाफे के संतुलन वाली कीमत का निर्धारण चाहा है।
इस बीच वैश्विक स्तर पर प्राकृतिक गैस की खपत बहुत तेजी से बढ़ रही है। इसकी रफ्तार तमाम अन्य जीवाश्म ईंधनों से बहुत अधिक है। इस सदी के अंत तक ऊर्जा क्षेत्र को कार्बन मुक्त बनाने की कोशिश में इसे बदलाव का दौर माना जा रहा है। लेकिन लंबी अवधि के लक्ष्य आसानी से अल्पावधि के निवेश निर्णय में नहीं बदलते। कुछ तेजी से बढ़ते ऊर्जा बाजारों मसलन चीन और भारत में इसकी ढुलाई, पाइपिंग का बुनियादी ढांचा अभी तक अच्छी तरह विकसित नहीं हुआ है। इसलिए अन्य वैकल्पिक माध्यमों की तुलना में भी यह सस्ता नहीं हो सका है। ऐसे बाजारों में जहां गैस का व्यापक इस्तेमाल होता है, वहां भी ऐसी तकनीक में निवेश की आवश्यकता है जो गैस को कार्बन रहित ऊर्जा में बदल सके।
एक तरीका यह है कि प्राकृतिक गैस से हाइड्रोजन मिश्रित ईंधन का रुख कर लिया जाए और फिर वहां से सौर या जल आधारित कार्बन रहित ऊर्जा का। लेकिन इसके लिए पाइपलाइन और गैस क्षेत्र के बुनियादी ढांचे में काफी बदलाव करने होंगे। एक अन्य विकल्प है बायोमीथेन का अधिक इस्तेमाल करना जो बहत कम उत्सर्जन करता है। इसके लिए ढेर सारी जमीन, पानी और अन्य संसाधनों का इस्तेमाल करना होगा। एक तीसरा विकल्प है कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन ऐंड स्टोरेज (सीसीयूएस)। परंतु गैस सीसीयूएस के लिए अपनाई गई तकनीक कोयला कॉर्बन कैप्चर से अलग होती है। इसे अधिक जांच-परख की आवश्यकता है और यह निवेशकों के लिए अब तक आकर्षक नहीं है।
सौर ऊर्जा की बात करें तो कीमतों में तेजी से कमी आई है। इसके लिए कुछ हद तक चीन में पैनलों और मॉड्यूल के अत्यधिक उत्पादन को वजह माना जा सकता है। लेकिन शुल्क दरों में भारी गिरावट की एक बड़ी वजह कुछ देशों में इसके लिए सस्ते वित्त की उपलब्धता है। भारत को भी तकनीक और नए निवेश का लाभ मिला है। गत माह हमारे यहां शुल्क दर बहुत कम रही लेकिन फिर भी कुछ देश बेहतर स्थिति में हैं।
यानी डेवलपर और निवेशक इस बात को लेकर चकित हैं कि तकनीकी लागत में आगे और कितनी गिरावट आएगी और इन सुधारों से लागत में कितनी बचत होगी। यह भी कि उनको ऋण की लागत कम करने पर कितना ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
ऊर्जा स्रोतों के अलावा विभिन्न देशों में जो कुछ हो रहा है उससे नीतियों और निवेश को लेकर अनिश्चितता का माहौल है। अमेरिका में ट्रंप प्रशासन ने पर्यावरण संरक्षण एजेंसी के बजट में 31 फीसदी की कमी करने की बात कही है। इसके अलावा उसने जलवायु परिवर्तन को लेकर पेरिस समझौते को बरकरार रखने या उससे दूरी बनाने को लेकर भी कुछ स्पष्टï नहीं किया है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक है। वह भी मिलेजुले संकेत ही दे रहा है। वर्ष 2014 और 2015 में जहां कोयले का इस्तेमाल लगातार कम हुआ वहीं इस वर्ष जनवरी में राष्टï्रीय विकास एवं सुधार आयोग ने कहा कि वर्ष 2020 में कोयले की खपत बढ़कर 4.1 अरब टन हो जाएगी। ऐसा तब होगा जबकि चीन अपनी गैर किफायती हो चुकी खदानों से उत्पादन बंद कर देगा।
यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश जर्मनी में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन 2016 में 0.7 फीसदी बढ़ गया। इसके लिए मोटे तौर पर परिवहन क्षेत्र की उत्सर्जन जिम्मेदार रहा। हालांकि  वहां 30 फीसदी बिजली नवीकरणीय ऊर्जा से आती है लेकिन आज भी कोयला और लिग्नाइट 40 फीसदी के लिए उत्तरदायी हैं। गत सप्ताह यूरोपीय आयोग के रूस-जर्मनी गैस पाइपलाइन के नियमन के प्रयासों को झटका लगा जब एक जर्मन नियामक ने कहा कि यूरोपीय संघ के ऊर्जा कानून विदेशी पाइपलाइन परियोजनाओं पर लागू नहीं होंगे।
असल मुद्दा यह है कि क्या ऐसी बुनियादी परियोजनाएं रूसी गैस पर यूरोप की निर्भरता बढ़ाएंगी और इस तरह मध्य और पूर्वी यूरोपीय देशों की भूराजनैतिक चिंताएं बढ़ाएंगी। ऊर्जा उत्पादन की बात हो या खपत की, लंबी अवधि की योजना बनाना आवश्यक है। भारत इन देशों और इलाकों के साथ ऊर्जा सहयोग को गहरा कर रहा है तो उसे भी अपना एजेंडा तैयार करना ही होगा। ऊर्जा बाजार, ऊर्जा के लेनदेन और ऊर्जा की कूटनीति का मसला भारत के लिए बरकरार रहेगा क्योंकि उसकी ऊर्जा की मांग जी 20 के किसी भी अन्य सदस्य देश की तुलना में अधिक तेजी से विकसित होगी। कम से कम 2030 तक तो यही हालात रहेंगे।
ऐसे में भारत को तीन बातों पर ध्यान केंद्रित रखना चाहिए: लाखों वंचितों के लिए ऊर्जा सुनिश्चित करना, स्वच्छ और किफायती ऊर्जा की ओर पहलकदमी और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना। यह आवश्यक है क्योंकि हम वैश्विक ऊर्जा बाजार पर काफी हद तक निर्भर हैं और हमारा तेजी से शहरीकरण हो रहा है। इन उपायों को अपनाने के क्रम में हमें तकनीक, व्यापार, वित्त, सरकारों के साथ साझेदारी, निजी क्षेत्र और सिविल सोसाइटी के सहयोग और प्रभावी संस्थानों की आवश्यकता होगी। यह लंबी प्रक्रिया है और हमें आसान नतीजों की अपेक्षा नहीं पालनी चाहिए।

Keyword: Natural Gas, Energy, Fuel,
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