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खाली खजाना और वादों का फसाना : 1.3 लाख करोड़ रुपये के कर्ज में डूबा पंजाब

साहिल मक्कड़ /  03 22, 2017

पंजाब का हिसाब
कभी देश का सबसे अमीर राज्य रहा पंजाब 1.3 लाख करोड़ रुपये के कर्ज में डूबा हुआ है। ऐसे में राज्य की नई सरकार के लिए अपने चुनावी वादों को पूरा कर पाना नहीं होगा आसान

पंजाब में अपने चुनावी घोषणा पत्र में पंजाब ने चार प्रमुख वादे किए थे। इनमें किसानों की कर्ज माफी, हर घर में एक रोजगार, कर्ज के दुष्चक्र से मुक्ति और सत्ता में आने के चार सप्ताह के भीतर राज्य को नशे से मुक्ति दिलाना शामिल था। राज्य सरकार की मौजूदा वित्तीय स्थिति बताती है कि प्रदेश के नए मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और उनके वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल के लिए यह काम कर पाना बहुत मुश्किल साबित होने वाला है। बादल पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के भांजे हैं और काफी वक्त से उनसे दूरी बना चुके हैं। वर्ष 2016-17 का बजट अनुमान बताता है कि पंजाब सरकार 7,983 करोड़ रुपये के राजस्व घाटे की शिकार है। वर्ष 2014-15 में यह घाटा 6,500 करोड़ रुपये था। यह घाटा मोटे तौर पर कम राजस्व प्राप्तियों, उच्च व्यय और बिजली सब्सिडी के कारण हुआ।

पिछली बादल सरकार ने वर्ष 2016-17 के 86,387 करोड़ रुपये के बजट में से 5,600 करोड़ रुपये का आवंटन किसानों को बिजली सब्सिडी देने के लिए किया था। किसानों को मुफ्त बिजली तथा अन्य सुविधाओं के चलते राज्य सरकार पर 1.24 लाख करोड़ रुपये का कर्ज हो चुका है। वर्ष 2016-17 के बजट अनुमान के मुताबिक इसके बढ़कर 1.31 लाख करोड़ रुपये होने की बात कही गई। नई कांग्रेस सरकार ने वादा किया है कि वह किसानों को मुफ्त बिजली देना जारी रखेगी मतलब बिजली सब्सिडी आगे और बढ़ेगी।

क्रेडिट रेटिंग एजेंसी इक्रा ने अपनी एक हालिया रिपोर्ट में कहा, 'पंजाब सरकार ने बहुत अधिक बिजली सब्सिडी दे रखी है और उसका राजस्व व्यय भी अधिक है। उदाहरण के लिए वित्त वर्ष 2016 में उसकी बिजली सब्सिडी राजस्व प्राप्तियों के 20 फीसदी तक रही। यह राशि तमाम अन्य राज्यों से बहुत अधिक रही। इसके अलावा ब्याज भुगतान भी सरकार की राजस्व प्राप्तियों के 22 फीसदी के बराबर रहा। जो चौथे वित्त आयोग द्वारा निर्धारित 10 फीसदी के स्तर से खासा अधिक था। ध्यान देने वाली बात यह है कि वर्ष 2017 के अनुमान में वर्ष 2016 में सरकार द्वारा जारी उदय बॉन्ड को शमिल नहीं किया गया है।'

रिपोर्ट में कहा गया है कि पंजाब राज्य सरकार उन कुछ सरकारों में शामिल है जो भारतीय रिजर्व बैंक से समय-समय पर अग्रिम हासिल करते रहे हैं। इसका अर्थ यही है कि राज्य की वित्तीय स्थिति ठीक नहीं। पंजाब में बीते पांच साल से राजकोषीय घाटा और राजस्व घाटा दोनों लगातार बढ़ रहे हैं। वर्ष 2016-17 में इन दोनों घाटों के क्रमश: 13,087 करोड़ रुपये और 7,982 करोड़ रुपये रहने का अनुमान जताया गया था। यानी नई सरकार को अपने खर्च में काफी कटौती करनी होगी।

राज्य के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने खर्च कटौती के उपायों की घोषणा की है। इसमें मंत्रियों और विधायकों की विदेश यात्राओं पर रोक भी शामिल है। लेकिन केवल इतना करना पर्याप्त नहीं है। राज्य सरकार को कर संग्रह में सुधार की कोशिश करनी होगी, नया निवेश जुटाना होगा और कुछ कड़े राजनीतिक निर्णय लेने होंगे ताकि सब्सिडी खत्म की जा सके।

ऐसी कठिन राजकोषीय परिस्थितियों में सरकार के लिए किसानों का कर्ज माफ करना आसान नहीं होगा। पंजाब विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के मुताबिक राज्य के किसानों पर वर्ष 2014-15 में करीब 69,355 करोड़ रुपये का कर्ज था। इसमें 56,481 करोड़ रुपये का संस्थागत ऋण शामिल था। वहीं सहकारी समितियों से लिया गया कर्ज इसका करीब 15.74 फीसदी यानी 8,890 करोड़ रुपये था।

पंजाब विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ज्ञान सिंह कहते हैं, 'पंजाब की मौजूदा सरकार केवल सहकारी समितियों का कर्ज माफ कर सकती है। इस बात की संभावना नहीं है कि केंद्र सरकार राष्ट्रीयकृत और वाणिज्यिक बैंकों से लिया गया कर्ज माफ कराएगी। हालांकि उत्तर प्रदेश में उसके ऐसा कराने की खबरें हैं।' उन्होंने आगे कहा कि पंजाब सरकार सकारात्मक मूल्य नीति लाकर भविष्य की दिक्कतों को कम कर सकती है। इसके अलावा वह शोध पर व्यय बढ़ा सकती है, भूमि श्रम सुधार कर सकती है और फसल के हर्जाने का समय पर भुगतान कर सकती है।

सिंह का मानना है कि वर्ष 2014-15 से अब तक कुल कृषि कर्ज बढ़कर 80,000 करोड़ रुपये से ऊपर निकल गया होगा। मौजूदा सरकार कृषि और उससे जुड़ी सेवाओं की सालाना वृद्धि में गिरावट थामकर शुरुआत कर सकती है। यह दर वर्ष 2007-08 के 3.82 फीसदी से घटकर 2013-14 में एक फीसदी से नीचे आ गई। किसान ऋण माफी और मुफ्त बिजली के अलावा कांग्रेस सरकार ने प्रति एकड़ नुकसान का हरजाना बढ़ाकर 20,000 रुपये करने की बात कही है। वहीं किसान पेंशन योजना, आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवार के लिए 10 लाख रुपये तक की राशि सुनिश्चित करना और कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए कच्चे माल पर लगने वाले कर पर पूरी राहत आदि शामिल हैं। हालांकि कांग्रेस ने कृषि क्षेत्र के अपने वादे पूरे करने के बारे में कुछ खुलासा नहीं किया है।

कांग्रेस को हर परिवार को एक रोजगार देने और हर बेरोजगार को मासिक 2,500 रुपये का भत्ता देने के अपने वादे को पूरा करने में भी कड़ी मशक्कत का सामना करना पड़ेगा। दरअसल इस समय राज्य की बेरोजगारी दर काफी अधिक है। श्रम ब्यूरो के अनुमान के मुताबिक राज्य में 18 से 29 की उम्र के करीब 17.1 फीसदी लोग इस समय बेरोजगार हैं। वर्ष 2014-15 में यह आंकड़ा 13.2 फीसदी था।

कांग्रेस का सोचना है कि वह पारंपरिक मझोले और छोटे उद्यमों में नई जान फूंककर पर्याप्त रोजगार तैयार कर लेगी। इसमें होजरी, टेक्सटाइल, खेल का सामान, लकड़ी का सामान, हाथ के उपकरण और हल्की मशीनरी शामिल है। पार्टी का विचार नए कारोबारी क्षेत्र तैयार करने का भी है। पार्टी घरेलू और विदेशी निवेशकों को प्रदेश में नई फैक्टरियां लगाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहती है। वह उद्योग जगत को पांच रुपये प्रति यूनिट की दर पर बिजली देना चाहती है। पानी पर सब्सिडी और बेहतर सीवेज व्यवस्था का भी वादा है।

बीते कुछ सालों के दौरान पंजाब का रिकॉर्ड देखते हुए यह काफी मुश्किल लगता है। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में फैक्टरियों की तादाद वर्ष 2010-11 के 12,770 से घटकर 2013-14 में 12,278 रह गई। औद्योगिक विकास की सालाना दर वर्ष 2007-08 के 16.61 फीसदी के उच्चतम स्तर से घटकर वर्ष 2013-14 में 2.55 फीसदी रह गई। औद्योगिक  नीति एवं संवद्र्घन विभाग की वेबसाइट पर जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक औद्योगिक उद्यमिता ज्ञापन के मोर्चे पर राज्य का प्रदर्शन पड़ोसी राज्यों हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश से पीछे है।

पंजाब में वर्ष 2011,2012, 2013, 2014 और 2015 में आईईएम के क्रियान्वयन का स्तर क्रमश: 2, 6,1,2 रहा। वहीं इन वर्षों में इसके लिए प्रस्तावित निवेश क्रमश: शून्य, 1042, 38, 162 और 340 करोड़ रुपये रहा। कई आलोचकों ने प्रदेश की बेरोजगारी और नशे की लत में संबंध स्थापित किया है। राज्य सरकार नशे की समस्या के निदान के लिए विशेष कार्यबल स्थापित कर नशे के कारोबारियों के खिलाफ कार्रवाई करना चाहती है। उसका मानना है कि आपूर्ति को रोकने से राज्य में नशे की समस्या का निदान हो जाएगा।

राज्य सरकार को इससे निपटने के लिए एक समग्र दृष्टिï अपनाने की आवश्यकता है। वर्ष 2015 का एक सर्वेक्षण बताता है कि प्रदेश में 230,000 लोग ऐसे हैं जो नशे की लत के शिकार हैं जबकि 860,000 लोग यह नशा लगातार ले रहे हैं। ऐसे लोग रोज करीब 1,400 रुपये अपने नशे पर खर्च करते हैं। सरकार को कोई ऐसा तरीका निकालना चाहिए कि नशे के आदी नशामुक्ति केंद्र तक पहुंचें। एक वरिष्ठï मनोवैज्ञानिक, जो सरकारी नशामुक्ति केंद्र के साथ काम कर रहे हैं, कहते हैं कि नशे के आदी दूसरे राज्यों से दवाएं खरीद लेंगे। ऐसे में अगर आपूर्ति को सख्त किया जा सके तो अच्छा होगा।

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