Search BS HindiWeb         Follow us on 
Business Standard
Friday, April 28, 2017 03:59 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

जलवायु के अनुकूल विकास की तलाश खतरे से करेगी दूर

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  March 21, 2017

एक बड़ा और खूंखार भेडिय़ा आएगा। वैश्विक जलवायु परिवर्तन को लेकर चल रही चर्चाओं को यह धारणा प्रभावित करती रही है। उत्सर्जन में कटौती के लिए उठाए जाने वाले कदमों को लेकर सारी दुनिया लुका-छिपी का रवैया अपनाए हुए है। उत्सर्जन स्तर में कटौती संबंधी वैश्विक समझौतों को इस तरह तैयार किया गया है कि वे जलवायु परिवर्तन को नकारने वाले तत्त्वों को ही संतुष्ट कर रहे हैं। पेरिस में जुटे देशों ने एक ऐसे कमजोर और महत्त्वाकांक्षा-रहित समझौते पर रजामंदी जताई थी कि जलवायु परिवर्तन पर काबू पाना मुश्किल है। दरअसल पेरिस सम्मेलन को लगा था कि ज्यादा सख्त कदम उठाने से अमेरिका नाराज हो सकता है।
नतीजा यह हुआ कि अमेरिका ने विश्व को जलवायु परिवर्तन से संबंधित नियमों एवं समझौतों में बदलाव के लिए बाध्य कर दिया। जब दुनिया ने एक कमजोर और महत्त्वहीन सौदे को अंतिम रूप दिया तो अमेरिका ऐन वक्त पर उससे अलग हो गया। अमेरिकी सरकार ने घरेलू स्तर पर नागरिक समाज और मीडिया की सशक्त आवाज को अनसुना करते हुए यह कदम उठाया। इसके पीछे ऐसे बहाने बनाए गए थे कि अमेरिकी संसद इसे स्वीकृति नहीं देगी।
रियो डि जनेरियो में वर्ष 1992 में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक नि:शक्त समझौते पर सहमति बनी थी तो उसमें कोई लक्ष्य नहीं रखा गया था और कोई कार्य योजना भी नहीं बनी थी। ऐसा अमेरिका को इस समझौते की जद में लाने के लिए किया गया था लेकिन वह उससे बाहर निकल गया। उसके बाद क्योटो प्रोटोकॉल आया जो उत्सर्जन मानकों को कम करने का पहला और इकलौता प्रारूप था। दिसंबर 1997 में एक बार फिर बिल क्लिंटन और अल गोर के दौर में समझौते को पूरी तरह निकम्मा बना दिया गया। उस समय समझौता अनुपालन प्रावधानों को हटा दिया गया और उसके स्थान पर सस्ते उत्सर्जन मानक जोड़े गए। एक बार फिर मकसद अमेरिका को इस समझौते के दायरे में लाने का था लेकिन इस बार भी अमेरिका ने उसे नकार दिया।
उसके बाद अमेरिका में बराक ओबामा का दौर आया जिन्होंने शुरू में जलवायु परिवर्तन की दिशा में ठोस कदम उठाने का भरोसा दिलाया था। लेकिन अमेरिका ने क्या किया? अमेरिका ने जलवायु परिवर्तन समझौते को इस तरह लिखने के लिए बाध्य कर दिया कि उसमें लक्ष्य वैज्ञानिक मानकों पर न होकर स्वैच्छिक कदमों पर आधारित थे। हरेक देश को अपने हिसाब से लक्ष्य तय करने की छूट दी गई। इससे आवश्यक कदम उठाने में कमजोरी आई है। ऐसा नहीं लगता है कि धरती के तापमान में बढ़ोतरी को 2 डिग्री सेल्सियस के भीतर भी सीमित रखा जा सकेगा, 1.5 डिग्री सेल्सियस तो बहुत दूर की बात है। एक बार फिर यह उन अमेरिकी नागरिकों के लिए किया गया जिनका कहना है कि वह कोई भी ऐसा समझौता स्वीकार नहीं करेंगे जिसमें बाध्यकारी प्रावधान हों। पेरिस समझौते ने बुनियादी तौर पर देशों की जवाबदेही को बहुत कम कर दिया है और स्वाभाविक न्याय को भी तिलांजलि दे दी गई है।
सशक्त और समृद्ध देशों की तरफ से उठाए जाने वाले असरदार और गंभीर कदमों की जरूरत का अहसास कर पाने में भी हम चूक कर गए। इसी तरह उत्सर्जन स्तर को भी इस तरह कम किया जाए कि जीवनशैली बदलने पर बढऩे वाले उपभोग से उत्सर्जन बढ़ न पाए। इन उपायों को आजमाने को लेकर दुनिया ने अपनी जबान पर इस वजह से काबू रखा है कि अनिच्छुक लोगों को भी इसके दायरे में लाया जा सके। ऐसे लोगों की तुलना कहावतों में मशहूर भेडिय़े से होती रही है। लेकिन अब तो यह खूंखार भेडिय़ा
सत्ता में आ चुका है तब यह दुनिया क्या करेगी?
निस्संदेह डॉनल्ड ट्रंप का व्यक्तित्व काफी स्याह पक्षों को भी समेटे हुए है। वह तो जलवायु परिवर्तन की असलियत को ही नकारते रहते हैं। वह इस बात को भी लेकर आश्वस्त हैं कि अमेरिका को अधिक कोयला खनन करने, अधिक बिजली संयंत्र बनाने की जरूरत है ताकि उत्पादन बढ़ाया जा सके। लेकिन इन सभी कदमों से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ेगा।
लाख टके का सवाल यह है कि अब हमें क्या करना है? लगातार बदलते मौसम से साबित होता है कि जलवायु परिवर्तन घटित हो रहा है। इसका सर्वाधिक असर दुनिया भर के सबसे गरीब लोगों पर पड़ रहा है जबकि उत्सर्जन बढ़ाने में उनका सबसे कम योगदान है। ऐसी स्थिति में दुनिया क्या गलत को गलत कहने का साहस दिखाएगी? या फिर निरर्थक निषेध में लग जाएगी ताकि अपरिवर्तनीय देशों को भी लुभाया जा सके?
भारत में हमारी प्राथमिकता विकास की ऐसी राह तलाशनी है जो प्रदूषण से मुक्त हो। हमें शहरीकरण का ऐसा ढांचा तलाशना होगा जिसमें निजी परिवहन को बढ़ावा देने के बजाय स्वच्छ हवा पर ध्यान हो। इसके साथ ही हमें ऊर्जा संसाधनों से वंचित लोगों को स्वच्छ ऊर्जा प्रदान करने के तरीके भी निकालने होंगे। भारत जैसे देशों के पास यह मौका है कि वे विकास के रास्ते पर अलग तरीके से आगे बढ़ सकते हैं और उन्हें यह मौका जरूर भुनाना चाहिए।
लेकिन अमेरिका में ट्रंप के आने से विकासशील देशों में सक्रिय पर्यावरणवादियों के लिए मुश्किलें बढ़ जाएंगी। भूमंडलीकरण के खिलाफ संरक्षणवादी एजेंडा अपनाया जाएगा और सभी को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा कि कोयले के आखिरी टुकड़े तक को खोद कर जला दिया जाए। लोगों को यह समझाने की कोशिश की जाएगी कि जलवायु परिवर्तन भविष्य की समस्या है और उसे अधिक तवज्जो नहीं दी जानी चाहिए। ट्रंप के आगमन से यह साफ हो चुका है कि वह बड़ा और खूंखार भेडिय़ा दस्तक दे चुका है। अब हमारे सामने इस सच्चाई का सामना करने की चुनौती है कि दुनिया पहले से अधिक गर्म हो चुकी है और भविष्य अधिक असुरक्षित है। उसी सूरत में हम परिवर्तन की उम्मीद कर सकते हैं।

Keyword: climate change, Emission, pollution,
Advertisements
  Impact of Network performance on loyalty of smartphone users
   Impact of connected mobile devices on consumer video needs
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
Advertisements 
E-DINAR: The startup of the year 2016. Click to know more
E-DINAR - a new generation of P2P exchange
  आपका मत
 क्या छोटी कार बाजार में पैठ बना पाएगी किया मोटर्स?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.