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ट्रंप की नई पहल के कुछ बेहतर पहलू!

अजय शाह /  March 21, 2017

अगर बॉडी शॉपिंग का स्थान वास्तविक ऑफशोर गतिविधियां लेती हैं तो यह सबके लिए बेहतर होगा। विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं अजय शाह
भारत में कई लोग अमेरिका के नए ट्रंप प्रशासन द्वारा कामकाजी वीजा पर लगाए जा रहे नए प्रतिबंधों को लेकर निराश हैं। बहरहाल सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के अनुबंधित श्रमिकों (बॉडी शॉपिंग) की नियुक्ति की बात करें तो वह काफी हद तक इन कामकाजी वीजा पर निर्भर करता है, लेकिन वह भारत के लिए बहुत बेहतर नहीं है। जब यह आसान विकल्प खत्म हो जाएगा तो इस कारोबार के दोनों सिरे अमेरिका और भारत सही मायनों में विदेशी कारोबार का मेल होगा। यह बात भारत के हित में भी है।
बॉडी शॉपिंग कारोबार कुछ इस तरह चलता है। अमेरिका में एक कंपनी 10,000 डॉलर प्रति माह पाने वाले स्थानीय इंजीनियरों की जगह 5,000 डॉलर प्रति माह पर भारतीय इंजीनियरों को नियुक्त कर लेती है। यह काम कामकाजी वीजा के जरिये होता है जो उन भारतीय कंपनियों को दिया जाता है जो मानव संसाधन कारोबार की विशेषज्ञ होती हैं।
माना जा रहा है कि ट्रंप प्रशासन इस कारोबार पर रोक लगाने की दिशा में काम कर रहा है। देश में कई लोग इस बारे में सोचकर ही निराश हैं। इस क्षेत्र में सक्रिय कुछ सॉफ्टवेयर कंपनियों की बात करें तो उनकी इस वीजा तक पहुंच कम होना उनके अस्तित्व के लिए ही चुनौती है। ऐसे में जब यह धूल छंटेगी तो यह भारत के हित में होगी।
भारत में काम करना बॉडी शॉपिंग की तुलना में कहीं अधिक मूल्यवर्धित काम है। क्योंकि इसमें वीजा अधिवक्ताओं की नियुक्ति नहीं करनी होती, साक्षात्कार नहीं करने होते, लोगों को काम के लिए अमेरिका नहीं ले जाना होता और उनको सीधे क्लाइंट के अधीन पदस्थापित नहीं करना होता। क्लाइंट यानी ग्राहक की जरूरत को समझना अधिक आवश्यक है। इसके लिए अच्छी क्षमता चाहिए। उसके पश्चात जटिल अनुबंध करने होते हैं और भारत में ऐसी टीम का प्रबंधन करना होता है जो काम कर सके। अब जरा किसी अमेरिकी निगम की दृष्टिï से पूरे मामले को देखते हैं। अगर यह आसान विकल्प उपलब्ध नहीं हो तो अमेरिकी निगम बहुत उत्साहित नहीं होंगे। प्रश्न यह है कि ये निगम कैसे प्रतिक्रिया देंगे? अमेरिकी निगमों को पता है कि भारतीय कंपनियां और कर्मचारी लागत के लिहाज से सस्ते हैं, ऐसे में वह स्वदेशी की आर्थिक कीमत चुकाने के मिजाज में नहीं होंगे। भारत से काम कराने के लिए वास्तविक ऑफशोरिंग के लिए जटिल प्रबंधन और अनुबंध ढांचे की आवश्यकता होगी। यह दो तरह से हो सकता है: या तो अमेरिकी निगम सीधे भारत में अपना काम शुरू कर दें या फिर वे किसी भारतीय कंपनी के साथ अनुबंध कर सकते हैं।
कुछ भारतीय सॉफ्टवेयर कंपनियां बॉडी शॉपिंग से आसानी से हासिल होने वाली धनराशि पर बहुत अधिक निर्भर हैं। यह कारोबार कमजोर पड़ेगा। बाजार हिस्सेदारी उन कंपनियों के पक्ष में चली जााएगी जिनको पता है कि भारत में टीम का प्रबंधन कैसे करना है और जो प्रबंधन की जटिलताओं और दूर बैठे उपभोक्ताओं के साथ अनुंबध के मुद्दों को संभाल सकेंगी।
सामान्य तरीका यही है कि अधिक उत्पादक फर्म निर्यात करें और वे विदेशों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करें। वर्ष 2012 में रुद्राणी भट्टïाचार्य, इला पटनायक और मैंने मिलकर सॉफ्टवेयर से जुड़े एक रोचक रुझान का पता लगाया था। हमें इसका उलटा रुझान देखने को मिला: जो सॉफ्टवेयर कंपनियां बाहर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करती थीं उनकी उत्पादकता कम होती थी। सबसे अधिक उत्पादक सॉफ्टवेयर कंपनियां वो थीं जो भारत में रहकर निर्यात करती थीं।
यह रुझान क्या बता रहा था? सबसे अच्छी कंपनियां प्रबंधन टीम को लेकर जानकारी तैयार कर रही थीं ताकि जटिल समस्याओं को हल कर सकें और वे दूरदराज स्थित उपभोक्ताओं के साथ जटिल अनुबंध कर रही थीं। कमजोर कंपनियां दूसरे देशों में अपने कार्यालय स्थापित कर रही थीं और उपभोक्ताओं को कार्यालयीन सेवाएं प्रदान कर रही थीं।
हम इस दास्तान के शुरुआती चरण में हैं। इस दौरान काफी कुछ हो रहा है। शेयर बाजार में उन कंपनियों की शेयर कीमतों में कमी आ रही है जो बॉडी शॉपिंग पर अधिक निर्भर करती हैं। पूंजी अधिक उत्पादक कंपनियों की ओर जा रही है। ज्यादा से ज्यादा अमेरिकी कंपनियां भारत में एफडीआई करेंगी ताकि काम का सीधा परिचालन कर सकें। इससे भारतीय श्रम बाजार में प्रबंधन की जानकारी विस्तृत हो जाएगी। तब बॉडी शॉपिंग कंपनियां भी ऐसी प्रतिभा को अपने साथ जोड़ेंगी जो अगले स्तर पर जाने में मदद कर सकें।
हमारे लिए वास्तविक ऑफशोरिंग छह वजहों से बेहतर है। पहली वजह यह है कि इसमें कहीं अधिक जानकारी शामिल होती है और यह देश में संगठनात्मक क्षमताएं विकसित करने में मदद करता है।
बॉडी शॉपिंग की व्यवस्था में भारतीय कामगारों को 50,000 डॉलर मासिक मिलते हैं जबकि बॉडी शॉपिंग कंपनी को 500 डॉलर मिलते हैं। ऐसे में 500 डॉलर का राजस्व हर माह भारत आता है। जबकि वास्तविक ऑफशोरिंग से 2,000 डॉलर की राशि हर महीने भारत आएगी। यह भारतीय जीडीपी के लिए चार गुना का लाभ है। कम कौशल वाले भारतीयों के लिए अमेरिकी रोजगारों का स्थान भारत में उच्च कुशलता वाले कर्मियों के रोजगार ले लेंगे। भारत में व्यय में इजाफा होगा और देश को इसका दीर्घकालिक लाभ होगा।
बॉडी शॉपिंग के अनुबंध अक्सर समयबद्घ होते हैं। जब उत्पादकता से जुड़े लाभ श्रम की आवश्यकता कम करते हैं तो भारतीय कंपनी के राजस्व पर असर पड़ता है। सच्ची ऑफशोरिंग अक्सर तयशुदा मूल्य वाले अनुबंध के आधार पर किए जा सकते हैं। इससे भारतीय कंपनियों को उत्पादकता लाभ के लिए जूझने का प्रोत्साहन मिलता है। जिससे मुनाफे की दर प्रभावित होती है। यह भारतीय दृष्टिïकोण से बेहतर व्यवस्था है।
अमेरिका खुली कामकाजी वीजा व्यवस्था को लेकर सहज नहीं है। यही वजह है वहां बॉडी शॉपिंग कारोबार पर दबाव पड़ा। जब एक सॉफ्टवेयर कंपनी यह समझ जाती है कि कैसे प्रबंधन करना है और वह वास्तविक ऑफशोरिंग की ओर बढ़ जाती है तो उसकी संभावनाओं का विस्तार अमेरिका से बाहर होता है। तब हम जापान जैसे प्रतिबंधात्मक वीजा व्यवस्था वाले देशों को बिक्री कर सकते हैं। जब भारत में वास्तविक प्रबंधन क्षमता होगी तो भारत को सॉफ्टवेयर ऑफशोरिंग केवल मेहनताने और मूल्य का अंतर नहीं रह जाएगा। हम कम आय वाले देशों मसलन श्रीलंका आदि को सॉफ्टवेयर सेवाएं बेच सकते हैं। ऐसे देशों में श्रम भी सस्ता है और प्रबंधन क्षमताएं कमजोर हैं।
यह तो इसका मानव संबंधी पहलू है। भारत में रहते हुए हम यह मान बैठते हैं कि विदेशों में काम करने वाले बेहतर स्थिति में हैं। बहरहाल, अधिकांश भारतीयों को इसकी बड़ी मानसिक कीमत चुकानी पड़ती है। उनको स्थानीय लोगों से मेलजोल में दिक्कत आती है। वे मोटे तौर पर भारतीय ही बने रहते हैं। अनिवासी भारतीय होना हमेशा बेहतर नहीं होता। ऐसे में बॉडी शॉपिंग की जगह अगर वास्तविक ऑफ शोरिंग होती है और हम विदेशों में काम करने वाले भारतीयों की जगह भारत में काम करने वाले भारतीय तैयार कर पाते हैं तो यह सबकी बेहतरी में होगा।

Keyword: America, donald trump, body shopping,
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