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खाली है खजाना, आसान नहीं वादे पूरे कर पाना

ईशान बख्शी /  03 20, 2017

चुनावी वादों की हकीकत

उत्तर प्रदेश में भाजपा ने कई लुभावने वादे किए थे लेकिन सरकार बन जाने के बाद उन वादों को हकीकत में तब्दील करने के लिए जुटाने होंगे संसाधन

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को इतने बड़े अंतर से जीतना कहीं से भी छोटी उपलब्धि नहीं है। लेकिन अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सामने असली चुनौती शुरू हो रही है। अगले आम चुनावों में दो साल से थोड़ा ही अधिक समय बचे होने से देश के सबसे अहम सियासी राज्य पर अपना रुतबा कायम रखना भाजपा के लिए यह जरूरी होगा कि वह उत्तर प्रदेश के मतदाताओं से किए गए अपने चुनावी वादों को तेजी से पूरा करे।

हरेक राजनीतिक दल की तरह भाजपा के घोषणापत्र में भी चुनावी वादों की भरमार है। किसानों का कर्ज माफ करने से लेकर कॉलेजों में मुफ्त वाई-फाई सुविधा देने और मुफ्त शिक्षा के वादे किए गए हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश की संकटग्रस्त वित्तीय स्थिति को देखते हुए इन वादों को पूरा कर पाना थोड़ा मुश्किल लग रहा है। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने भाजपा के कुछ अहम चुनावी वादों की जमीनी हकीकत का विश्लेषण कर यह जानने की कोशिश की है कि नई सरकार के समक्ष किस तरह की चुनौतियां होंगी?

निस्संदेह लघु एवं सीमांत किसानों का कर्ज माफ करना भाजपा के घोषणापत्र का सबसे प्रमुख मुद्दा है। हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि माफी के दायरे में कर्ज की मूल रकम ही आएगी या केवल ब्याज ही माफ किया जाएगा या फिर दोनों ही उसके दायरे में आएंगे। बहरहाल बुनियादी सवाल यह है कि इस कर्ज माफी से पड़ने वाले भारी वित्तीय बोझ को केंद्र वहन करेगा या राज्य सरकार को ही इसका बोझ उठाना होगा?

प्राप्त जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश के किसानों पर करीब 75,000 करोड़ रुपये का कर्ज बकाया है और उसमें से केवल 8,000 करोड़ रुपये का ही कर्ज राज्य के सहकारी बैंकों और प्राथमिक कृषि ऋण सोसाइटी (पीएसी) ने दिया हुआ है। अगर राज्य सरकार केवल सहकारी बैंकों और पीएसी की तरफ से आवंटित कृषि ऋण को ही माफ करती है तब भी उसकी राजकोषीय हालत खराब हो सकती है।

इसकी वजह यह है कि उत्तर प्रदेश में वर्ष 2016-17 के लिए राजकोषीय घाटे के 49,960 करोड़ रुपये रहने का लक्ष्य रखा गया है जो राज्य सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का 4.04 फीसदी होगा। लेकिन इसके 55,020 करोड़ रुपये तक पहुंच जाने का अनुमान है जो कि जीएसडीपी का 4.45 फीसदी होगा। राज्य सरकार ने हाल ही में सातवें वेतन आयोग की अनुशंसाओं के अनुरूप अपने कर्मचारियों को वेतन और पेंशन देना शुरू किया है। ऐसे में सरकारी खजाने पर अधिक बोझ डालने से स्थिति और भी खराब हो सकती है।

अगले वित्त वर्ष के लिए पेश बजट में राजकोषीय घाटे को घटाकर तीन फीसदी तक लाने का लक्ष्य रखा गया है लेकिन अतीत के अनुभवों के आधार पर इसको हासिल कर पाने की संभावनाएं काफी धूमिल लग रही हैं। वर्ष 2015-16 में राजकोषीय घाटे को जीएसडीपी के 2.87 फीसदी रखने की बात कही गई थी लेकिन यह अनुमान से करीब दोगुना यानी 5.3 फीसदी रही थी। भाजपा के चुनावी घोषणापत्र ने कृषि आय को वर्ष 2022 तक बढ़ाकर दोहरे अंकों में ले जाने का भी वादा किया हुआ है। वैसे तो राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कृषि आय को बढ़ाने की बात कही है लेकिन इस लक्ष्य को हासिल कर पाना खासा चुनौतीपूर्ण होगा।

किसान जागृति मंच के अध्यक्ष और लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुधीर पवार का मानना है कि कृषि से होने वाली आय को या तो उत्पादन बढ़ाकर या फसल उत्पादों की कीमतें बढ़ाकर हासिल किया जा सकता है। अगर दुनिया के दूसरे प्रमुख अनाज उत्पादक देशों से तुलना करें तो भारत में अब भी प्रति हेक्टेयर उत्पादन काफी कम है लिहाजा कृषि उत्पादन को बढ़ाने की काफी संभावनाएं हैं। लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि उत्पादन बढऩे की सूरत में कृषि उत्पादों के निर्यात पर कई तरह की पाबंदियां होने से उत्पादों की कीमतों में गिरावट आ सकती है जो कृषि आय पर और भी दबाव डालेगी।

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि उत्पादों की सरकारी खरीद में बढ़ोतरी के जरिये भी कृषि आय बढ़ाने का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में प्रोफेसर संतोष मेहरोत्रा कहते हैं, 'पश्चिमी उत्तर प्रदेश को छोड़कर राज्य के अन्य सभी इलाकों में अनाज की खरीद काफी कम होती है। सरकारी खरीद को विकेंद्रीकृत करने से आधार मूल्य बढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा पशुपालन को बढ़ावा देने से भी छोटे एवं सीमांत किसानों की आय बढ़ाई जा सकती है।'

इससे भी बड़ा सवाल यह है कि कृषि कार्यों में लगे करोड़ों लोगों को किस तरह उद्योग जगत में अधिक उत्पादक कार्यों में लगाया जाए? युवाओं को बड़ी संख्या में रोजगार देने का भाजपा ने वादा किया हुआ है लेकिन उत्तर प्रदेश की हालत अन्य राज्यों से भी अधिक खराब है। गुजरात और महाराष्ट्र की तरह निवेश आकर्षित करने में यह राज्य काफी पीछे रहा है।

उत्तर प्रदेश में औद्योगिक विकास की दर पिछले कुछ वर्षों में औसतन 1.6 फीसदी ही रही है। वित्त वर्ष 2016-17 के पहले नौ महीनों में निवेश के केवल 121 प्रस्ताव ही आए जो कि राष्ट्रीय स्तर पर आए निवेश प्रस्तावों का केवल 5.32 फीसदी है। अगर मूल्य के हिसाब से देखें तो उत्तर प्रदेश में केवल 13,722 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव ही आए हैं।

एक माकूल निवेश स्थल के तौर पर उत्तर प्रदेश के खराब प्रदर्शन को कुछ और पैमानों से भी समझा जा सकता है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) आकर्षित करने वाले देश के 10 शीर्ष शहरों में एक भी उत्तर प्रदेश का नहीं है। कानपुर इस सूची में 13वें स्थान पर है। अगर छोटे एवं मझोले उद्योगों के विकास के भी हिसाब से देखें तो वर्ष 2007-08 से लेकर 2013-14 के दौरान इस राज्य की औसत वृद्धि दर नौ फीसदी रही जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह 13.7 फीसदी थी।

जानकारों का कहना है कि उत्तर प्रदेश में बहुत कम ऐसे उद्योग हैं जो कृषि क्षेत्र के अतिरिक्त श्रमिकों को समाहित कर सकते हैं। पवार कहते हैं कि निर्माण क्षेत्र इनमें सबसे आगे हो सकता है लेकिन नोटबंदी के बाद इस क्षेत्र में रोजगार बढऩे की संभावना कम ही दिख रही है। वैसे कुछ मोबाइल फोन निर्माता कंपनियों ने उत्तर प्रदेश में अपने संयंत्र लगाए हैं लेकिन उनकी संख्या सीमित ही है। ऑटो और वाहन उपकरण क्षेत्र की राज्य में ऐसी मौजूदगी नहीं है कि उससे रोजगार सृजन पर कोई खास फर्क पड़ सके।

भाजपा ने निवेश संवद्र्धन बोर्ड बनाकर निवेश को तिगुना करने का भी वादा किया है। इसके लिए एकल-खिड़की मंजूरी देने की व्यवस्था लागू करनी होगी। लेकिन देश के मौजूदा निवेश माहौल को देखें तो निजी निवेश में सुधार के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं। ऐसी स्थिति में भाजपा सरकार के लिए इस लक्ष्य को हासिल करना काफी कठिन दिख रहा है। मेहरोत्रा कहते हैं, 'केवल सरकारी निवेश बढऩे से उत्तर प्रदेश का निवेश परिदृश्य नहीं सुधर सकता है। इसके अलावा इस राज्य में निवेश बढ़ाने के लिए कानून और व्यवस्था पर काबू पाना भी जरूरी होगा।' शायद यही वजह है कि घोषणापत्र में स्वरोजगार पर भी खासा जोर दिया गया है।

उत्तर प्रदेश के सभी घरों को 24 घंटे बिजली आपूर्ति देने की भी बात भाजपा ने कही है। लेकिन सच तो यह है कि ऊर्जा मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक राज्य के तीन करोड़ ग्रामीण घरों में से केवल आधे घरों तक ही बिजली पहुंच पाई है। इस महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने के लिए यह जरूरी होगा कि न केवल सभी घरों को बिजली कनेक्शन मिले बल्कि उन्हें दिन के 24 घंटे बिजली की निर्बाध आपूर्ति भी होती रहे।

इक्रा के उपाध्यक्ष गिरीश कदम कहते हैं, 'उत्तर प्रदेश में बिजली की 24 घंटे उपलब्धता राज्य बिजली इकाइयों की बिजली खरीद क्षमता पर निर्भर करेगी। इसके साथ ही वितरण और ग्रामीण विद्युतीकरण नेटवर्क को बेहतर करना भी जरूरी होगा।' केंद्र की तरफ से लाई गई उदय योजना से बिजली वितरण कंपनियों का अपना खाता दुरुस्त करने में मदद मिली है लेकिन इसे आगे भी साफ रखने के लिए सख्त उपायों की जरूरत पड़ेगी।

इसके लिए सकल तकनीकी एवं वाणिज्यिक हानि को नीचे लाना होगा जो कि इस समय देश के अन्य राज्यों की तुलना में काफी अधिक है। उदय योजना के तहत इसे 32 फीसदी से घटाकर 15 फीसदी तक लाना होगा। वैसे बिजली दरों को बढ़ाकर अतिरिक्त राजस्व जुटाने का भी एक तरीका है लेकिन राज्य सरकार शायद ही यह कठोर फैसला  लेना चाहेगी। घोषणापत्र में कहा गया है कि गरीब परिवारों को 100 यूनिट तक बिजली तीन रुपये प्रति यूनिट की दर पर दी जाएगी। लेकिन सवाल यह है कि इस आर्थिक बोझ को कौन वहन करेगा?

घोषणापत्र में 50 फीसदी से अधिक अंक पाने वाले सभी छात्रों को स्नातक तक की शिक्षा मुफ्त करने का वादा किया गया है। इसके अलावा हरेक घर तक पाइपलाइन के जरिये स्वच्छ पेयजल देने की भी बात कही गई है। इन योजनाओं को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर धन की जरूरत पड़ेगी।

इतना जरूर है कि सामाजिक क्षेत्र पर उत्तर प्रदेश की व्यय प्राथमिकताएं राष्ट्रीय औसत के अनुरूप ही हैं। वित्त वर्ष 2015-16 में सकल व्यय का 16.9 फीसदी हिस्सा शिक्षा पर खर्च हुआ था जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह 16.4 फीसदी रहा था। इसी तरह स्वास्थ्य, चिकित्सा एवं परिवार कल्याण पर व्यय राष्ट्रीय औसत से महज 4.9 फीसदी अधिक रहा था।

सभी बिंदुओं पर गौर करने के बाद सवाल यह खड़ा होता है कि उत्तर प्रदेश की नई सरकार अपने चुनावी वादों को किस तरह पूरा करेगी? राज्य के व्यय का एक बड़ा हिस्सा तो वेतन, पेंशन और सब्सिडी जैसे मदों में चला जाता है और इसमें कटौती कर पाना भी मुश्किल है। अगले वित्त वर्ष में राज्यों के राजस्व में 11.4 फीसदी वृद्धि का अनुमान है लिहाजा नई सरकार यह उम्मीद कर सकती है कि उसे केंद्र से अधिक आवंटन मिलेगा। लेकिन काफी हद तक केंद्र से मिलने वाले राजस्व पर ही निर्भर उत्तर प्रदेश की नई सरकार के लिए काफी चुनौतीपूर्ण स्थिति खड़ी होने रही है।

Keyword: UP, Assembly election, bJP,
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